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मुस्लिमों को लुभा पाएंगे मोदी?

Tue, 04 Mar 2014 06:59 PM IST
गार्डनर हैरिस
गार्डनर हैरिस Updated Tue, 04 Mar 2014 06:59 PM IST
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will Modi appeal to Muslims?

बीते रविवार को जब लखनऊ के एक पार्क में देश के सबसे विवादास्पद राजनेता का हैलीकॉप्टर उतरा, उस वक्त नजदीक ही सलीम शाह अंडे और चिकन रोल बेच रहा था। वह यहां एक बड़ी रैली को संबोधित करने आए थे। इस वजह से वहां खासी भीड़ थी, सो सलीम भी काफी व्यस्त था। 1977 के आम चुनावों के बाद अब तक के सबसे अहम माने जा रहे चुनावों के बारे में जब शाह से पूछा जाता है कि वह किसे वोट देगा, तो वह अपने कंधे झटक देता है। यह हिंदू राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी हैं, जिन्हें सुनने के लिए लोग आए हैं। धार्मिक आधार पर लंबे समय से विभाजित भारत में मोदी के मुस्लिमों के साथ रिश्ते तल्ख रहे हैं। शाह कहता है, ऐसा लगता है कि मोदी जीत सकते हैं, ऐसे में किसी और को साथ देकर अपना वोट क्यों बर्बाद किया जाए?

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शाह के इस जवाबी सवाल में इस बात की थोड़ी थाह मिलती है कि भारत की अगली सरकार क्षेत्रीय नेताओं के जमावड़े से बनेगी या मोदी के नेतृत्व में उनकी दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी की। चुनावी सर्वेक्षण बताते हैं कि मोदी इस वक्त देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं, मगर चुनाव जीतने के लिए यही काफी नहीं है, क्योंकि भारत में राजनीतिक ताकत ढेरों क्षेत्रीय दलों के बीच बंटी हुई है। यदि मोदी की पार्टी देश के सर्वाधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन करती है, तो वह प्रधानमंत्री बनने लायक जनादेश प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा होने पर वह देश की बदहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सकते हैं और उसे चीन के बरक्स खड़ा कर सकते हैं। वह अब तक उत्तर प्रदेश का आठ बार दौरा कर चुके हैं और यहां उन्होंने अपने सबसे विश्वसनीय साथी को तैनात कर रखा है।
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भारत में अक्सर कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है। अमेरिकी नजरिये से देखें, तो उत्तर प्रदेश, कैलिफोर्निया-ओहियो-मिशिगन जैसा विशाल है, यहां फ्लोरिडा की तरह अनिश्चितता है, दक्षिण कारोलिना जैसी राजनीतिक तिकड़ हैं और मिसिसीपी जैसी जातिगत विविधताएं हैं। मौजूदा सरकार के प्रति बढ़ती बेरुखी और गांधी परिवार की वंशवादी राजनीति से उपजी हताशा ने मोदी के पक्ष में माहौल बनाया है। मगर उनकी सफलता इस पर निर्भर है कि वह अपनी दावेदारी के लिए मुस्लिमों का कितना समर्थन जुटा पाते हैं। देश की आबादी में मुस्लिम 14 फीसदी की हिस्सेदारी करते हैं और यह बरसों से सत्तारूढ़ दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बड़ा आधार है।
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मोदी के मुख्यमंत्री रहते गुजरात में 2002 में उस वक्त दंगे भड़क उठे थे, जब मुस्लिमों की भीड़ ने हिंदू श्रद्धालुओं को ले जा रही एक ट्रेन में आग लगा दी थी, जिसमें 58 लोग मारे गए। इसके बाद हिंदुओं की भीड़ ने अगले कई दिनों तक मुस्लिम बस्तियों में हमले किए। इन दंगों में एक हजार से अधिक लोग मारे गए, जिनमें अधिकांश मुस्लिम थे। इन दंगों को लेकर मोदी के खिलाफ आरोप साबित नहीं हुए, लेकिन उनके कुछ करीबियों को हिंसा भड़काने का दोषी पाया गया। अनेक मुस्लिम नेता कहते हैं कि वह मोदी को कभी माफ नहीं कर सकते। लखनऊ में मुस्लिमों से संबंधित एक वेबसाइट के संपादक सैयद हुसैन अफसर कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के बहुत थोड़े मुस्लिम ही मोदी को वोट देंगे। यह चुनावी रणनीति है। हर कोई जानता है कि वह सेक्यूलर नहीं हैं।

मगर मोदी ने गुजरात की आर्थिक नींव मजबूत की है, जो कि भारत में सबसे मजबूत मानी जाती है। वह पूरे देश को इसी आर्थिक तरक्की की राह पर ले जाने का वायदा कर रहे हैं। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि वह शायद ही मुस्लिमों का समर्थन हासिल कर पाएं। लेकिन वह अनेक क्षेत्रीय नेताओं को प्रभावित कर सकते हैं, जिनकी मुस्लिमों के बीच पैठ है। यानी वह एक स्वीकार्य सहयोगी हो सकते हैं।

ब्राउन यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय कहते हैं, मोदी के प्रचार में आश्चर्यजनक रूप से मुस्लिम विरोध नजर नहीं आ रहा है। हालांकि अभी यह स्पष्ट होना बाकी है कि क्या यह किसी तरह का सैद्धांतिक बदलाव है या फिर यह रणनीतिक रूप से लिए गए निर्णय का नतीजा है।

भारतीय जनता पार्टी के एक शीर्ष नेता ने तो यहां तक कहा है कि पार्टी अतीत में की गई भूलों की वजह से मुस्लिमों से माफी तक मांग सकती है। मोदी की रैली के बाद लखनऊ की एक मुस्लिम बस्ती में रहने वाले एक युवक मोहम्मद जाफर ने कहा, 'मोदी नेता के तौर पर ठीक लग रहे हैं। मगर मैं समझता हूं कि एक अच्छा नेता होने से पहले एक अच्छा इंसान होना चाहिए। मैं उन्हें वोट नहीं दूंगा।' वहीं एक अन्य युवक करीम जाफर ने कहा, 'मैं युवा हूं। अतीत के बारे में मुझे अधिक नहीं पता, लेकिन मैं अपने बेहतर भविष्य की कामना करता हूं और मुझे लगता है कि मोदी इसमें मदद कर सकते हैं। कोई भी नेता परफेक्ट नहीं होता।'


भारत की दो तिहाई आबादी की उम्र 35 वर्ष से कम है और इसमें आधे तो 25 वर्ष से कम के युवा हैं। अपनी पार्टी के कायाकल्प में लगे मोदी के मुस्लिमों को लुभाने के प्रयासों से युवा वोटरों के बीच पार्टी को कुछ लाभ मिल सकता है। ये युवा उस वक्त बहुत छोटे थे, जब भाजपा ने धार्मिक आधार पर अपनी कुछ विभाजनकारी कार्रवाइयों को अंजाम दिया था। मोदी के कारोबार के प्रति उदार सरकार के गठन के वायदे से युवा आकर्षित हो सकते हैं। आखिर भारत को अगले दस वर्षों में अपने युवाओं के लिए 11.5 करोड़ रोजगार पैदा करना होगा, जिससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। मगर एक 44 वर्षीय दुकानदार मोहम्मद शकील कहते हैं, मोदी को लेकर कुछ चिंता और भय है, कि यदि वह प्रधानमंत्री बन गए, तो मुस्लिमों के प्रति उनका व्यवहार कैसा होगा। हम अतीत को भूले नहीं हैं। शायद भूल सकते भी नहीं।

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