तो क्या बदलाव दुबई से आएगा
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अरब जागरण की शुरुआत 2010 के अंत में हुई, और उसके बाद से ही नीतिगत मोर्चों पर अमेरिका की लड़खड़ाहट जारी है। बगैर सीधे हस्तक्षेप के अमेरिका ने लीबिया के पर कतरने की कोशिश की, मगर वह नाकामयाब रहा। फिर चाहे सीरिया हो, या मुस्लिम ब्रदरहुड को समर्थन देकर मिस्र में लोकतंत्र बहाल करने की कोशिश, अमेरिका को नाकामयाबी ही मिली। ऐसे में, अगर अमेरिका फिर से इराक में हस्तक्षेप की नीति अपना रहा है, तो इससे कोई सकारात्मक उम्मीद रखना मूर्खता ही होगी। दरअसल, वर्तमान हालात में बुद्धिमानी का तकाजा है कि अमेरिका अपनी अज्ञानता को स्वीकार करे, साथ ही, वह यह भी माने कि इनमें से किसी भी देश की स्थिति में सुधार के लिए लंबे समय तक फौज की तैनाती की न तो उसमें शक्ति है, और न ही उसे यह पता है कि इसके नतीजे क्या होंगे।
यह तो तय है कि अमेरिका पश्चिम एशिया की अनदेखी नहीं कर सकता। ऐसे में, सवाल उठता है कि अमेरिका करे, तो क्या करे? निजी तौर पर मैं 'नियंत्रण' और 'विस्तार' की नीति के पक्ष्ा में हूं। कहने का आशय है कि इराक, सीरिया, यमन और लीबिया जैसे देशों में, जहां अव्यवस्था फैली हुई है, नियंत्रण स्थापित करने के लिए अमेरिका को क्षेत्रीय ताकतों के साथ हाथ मिलाना चाहिए। फिलहाल अमेरिका इसी नीति पर चल रहा है।
मुझे लगता है कि इन देशों में इससे ज्यादा हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। इसके अलावा मिस्र और अल्जीरिया जैसे देशों में, जो फिलहाल शांतिपूर्ण दिख रहे हैं, अमेरिका को धैर्यपूर्वक स्थानीय सरकार के साथ शांति बनाए रखने और व्यवस्था को और बेहतर, विधिक और समावेशी बनाने के लिए वहां की सरकारों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। इसके बाद मोरक्को, जॉर्डन, लेबनान, कुर्दिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में, जहां अपेक्षाकृत बेहतर व्यवस्था है, अपने नियंत्रण के विस्तार की कोशिश करनी चाहिए, ताकि व्यवस्था को ज्यादा स्वीकृति आधारित और टिकाऊ बनाया जा सके। इसके बाद ट्यूनीशिया का नंबर आता है, जहां की व्यवस्था दुरुस्त है, और लोकतंत्र भी सुदृढ़ दिख रहा है। जितनी इसे जरूरत है, उतना पैसा अमेरिका को इसे उपलब्ध कराना चाहिए, हालांकि फिलहाल वह ऐसा नहीं कर रहा।
साथ ही, अमेरिका को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसे अपने नियंत्रण का विस्तार वहीं तक करना है, जहां तक इन देशों के हित सुरक्षित रह सकें। यह भी समझना होगा कि अगर इन देशों में बदलाव का एकमात्र कारण अमेरिका की मौजूदगी हो, तो ये भीतर से प्रेरित बदलाव नहीं कहे जा सकते। जब इन देशों के भीतर से बदलाव की शुरुआत होगी, तभी उसका मतलब हो सकता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण संयुक्त अरब अमीरात और उसका गहना कहा जाने वाला दुबई है। दरअसल, अभी दुबई प्रवास के दौरान मैंने यह जानने की कोशिश की है कि क्या दुबई ही अरब जागरण की प्रमुख वजह था? लेकिन यह कैसे हो सकता है? संयुक्त अरब अमीरात और दुबई दोनों ही राजशाही हैं, और यहां न तो विपक्ष जैसी कोई चीज है, और न ही प्रेस की स्वतंत्रता। शायद यही वजह है कि दुबई 'अरब का मैनहट्टन' माना जाता है, जहां अरब देशों से युवा आते हैं और कला, व्यापार, मीडिया, शिक्षा और तकनीकी के क्षेत्र में अपने सपनों को साकार करने की कोशिश करते हैं।
यहां उन्हें विश्वस्तरीय कंपनियों के साथ काम करने का मौका मिलता है, और वह भी उनकी अपनी ही संस्कृति, भाषा, धर्म, भोजन, संगीत और वेशभूषा वाले माहौल में। जैसे-जैसे दुबई आने वाले अरब के युवाओं की तादाद बढ़ती है, वैसे-वैसे उनके जेहन में यह सवाल भी गूंजता है कि आखिर अरब के ही उनके देश में ऐसी सुख-सुविधाएं क्यों नहीं होतीं। फलस्तीन के पूर्व प्रधानमंत्री सलाम फैयद ने मुझसे कहा, 'चाहे कहीं के भी लोग हों, नागरिक होने का मतलब आज सभी समझने लगे हैं।' यही विचार मिस्र के उस युवा के मन में भी कौंधता था, जब वह सिंगापुर या ब्राजील की कामयाबी देखता था। मगर दुबई ने जब दिखाया कि अरब में भी सिंगापुर बन सकता है, तो वह राजनीतिक क्रांति का केंद्र बन गया। अब पूरे क्षेत्र में यह सवाल गूंजता दिखता है, 'हम लोकतंत्र नहीं बन सकते, मगर दुबई जैसे तो बन ही सकते हैं?'
दुबई में मीडिया पर नजर रखने वाली एक कंपनी न्यूज ग्रुप इंटरनेशनल के संस्थापक फलस्तीन के उन्तालीस वर्षीय माजेन नहावी कहते हैं, 'दुबई ही अरब जागरण का केंद्र है, और यहीं से असल क्रांति की शुरुआत हुई थी। ' दरअसल, अरब जागरण का आगाज आजादी और लोकतंत्र की चाहत के उद्देश्य से नहीं हुआ। इसकी शुरुआत अरब के आम नागरिकों के जेहन में आने वाले उस सवाल के साथ हुई कि जो दुबई में हो सकता है, वह उनके अपने देश में क्यों नहीं? साथ ही, अरब के सामान्य नागरिकों ने दुबई की विश्वस्तरीय बुनियादी सुविधाओं की तुलना अपने यहां के सैन्य शासन से की, जिसके अधीन उनका जीवन बदहाल हो रहा था। नहावी बताते हैं, टेलीविजन चैनल अल-जजीरा ने जहां अरब को वह दृष्टि दी, जिसकी बदौलत वह पूरी दुनिया को देख सके, वहीं दुबई ने साबित किया कि विश्वस्तरीय तंत्र यहां भी स्थापित किया जा सकता है।
दरअसल, जब आप देखते हैं कि आपके पड़ोस के समाज में वे सारी सुविधाएं मौजूद हैं, जो आपके समाज में नहीं, तो वहीं से राजनीति की शुरुआत होती है। इसलिए अमेरिका के लिए सीख यह है कि वह इन देशों में भीतर से बदलाव को प्रेरित करे। ऑस्ट्रेलिया के जवाबी कार्रवाई से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ डेविड किलकलेन का मानना वाजिब है कि स्थानीय नेतृत्व के अभाव में महज आक्रमण कर देने भर से चीजें सुधरने के बजाय बिगड़ती जाती हैं।