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आयुर्वेद का जादू चलेगा क्या

Wed, 10 May 2017 06:57 PM IST
मधुरेन्द्र सिन्हा
मधुरेन्द्र सिन्हा Updated Wed, 10 May 2017 06:57 PM IST
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Will Ayurveda's Magic Run?
मधुरेन्द्र सिन्हा

योग गुरु बाबा रामदेव ने अपना दायरा बढ़ाते हुए आयुर्वेदिक दवाओं और उत्पादों की दुनिया में जब कदम रखा था, तो किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन वह देश की तमाम एफएमसीजी कंपनियों के छक्के छुड़ा देंगे। बाबा ने अपनी लोकप्रियता का लाभ उठाते हुए अपने को एक सफल ब्रांड बना दिया है। इसी का नतीजा है कि उनकी कंपनी पतंजलि का सालाना कारोबार 10,000 करोड़ रुपये के आश्चर्यजनक आंकड़े को पार कर गया है। विदेशी कंपनी नेस्ले और भारतीय कंपनी गोदरेज को भी पतंजलि ने पीछे छोड़ दिया है। इतना ही नहीं कंपनी की योजना इसे एक से दो वर्षो में दोगुना करने की है, यानी 20 हजार करोड़ रुपये के पार! गौरतलब है कि देश में साठ दशकों से भी ज्यादा समय से काम कर रही बहुराष्ट्रीय कंपनी हिंदुस्तान लीवर का सालाना कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये का है।

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अगर हम अतीत में देखें, तो पाएंगे कि इसके पहले भी आयुर्वेदिक सामान बनाने वाली कई कंपनियों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के छक्के छुड़ाए थे। अस्सी-नब्बे के दशक में विक्को वज्रदंती ने कोलगेट जैसी विदेशी कंपनी के हौसले पस्त कर दिए थे और उसकी विक्को क्रीम की तो युवतियां और महिलाएं दीवानी हो गईं। इसी तरह से हिमालय के कई उत्पादों ने अपनी चमक दिखाई। डाबर और बैद्यनाथ ने अपने कई आयुर्वेदिक उत्पादों से बाजार में अपना हिस्सा बढ़ाया। लेकिन कोई भी उस मुकाम पर नहीं पहुंच पाया, जहां पतंजलि पहुंची। ऐसा नहीं है कि पहले कोई योगी आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण और व्यापार में नहीं आए थे। 1986 में महर्षि महेश योगी ने महर्षि ब्रांड से आयुर्वेदिक उत्पादों की दुनिया में कदम रखा, पर उन्हें सफलता नहीं मिली, क्योंकि उनका आधार अमेरिका में था।
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बाबा रामदेव के उत्पादों की सफलता के पीछे कई कारण रहे। एक तो उनका योग जागरण है। योग के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने जो किया, उससे उन्हें व्यापक लोकप्रियता मिली। पिछले कुछ वर्षों से देश में ऐलोपैथिक दवाओं और अन्य रसायनों के खिलाफ एक हवा चल रही है। अब लोग प्राकृतिक पदार्थों पर ज्यादा जोर देते दिख रहे हैं, साथ-साथ कृत्रिम दवाओं तथा केमिकल से बने क्रीम के वैकल्पिक उत्पादों की ओर देखने लगे हैं। इससे आयुर्वेदिक उत्पादों की देश में मांग बढ़ी है। बाबा रामदेव के अलावा आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने भी अपने आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के तत्वाधान में आयुर्वेदिक उत्पादों की शृंखला 2003 में ही पेश कर दी थी। पतंजलि की सफलता के बाद उन्होंने भी इस दिशा में ध्यान दिया। अब उनका भी कारोबार बढ़ता जा रहा है। बात यहीं तक समाप्त नहीं हो रही है, देश के एक और आध्यात्मिक गुरू जग्गी वासुदेव के ईश फाउंडेशन के आयुर्वेदिक उत्पाद भी बाजार में आ चुके हैं। जो काम स्वदेशी जागरण मंच नहीं कर पाया, उसे इन गुरुओं ने कर दिखाया, यानी विदेशी कंपनियों के उत्पादों की बजाय इन्होंने अपने देश में बनने वाले उत्पादों को लोकप्रिय किया।
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पूरे देश में आयुर्वेदिक उत्पादों की धूम मची हुई है। पंतजलि के अलावा भी कई कंपनियां मैदान में हैं। हालत यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है और वे भी आयुर्वेदिक उत्पाद मैदान में उतर रही हैं। बड़ा सवाल है कि भारत में बन रहे आयुर्वेदिक उत्पाद उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा उतरेंगे? आयुर्वेदिक उत्पादों को पश्चिम के देशों और अमेरिका में संदेह की निगाहों से देखा जाता है और इन्हें उन देशों में पैठ बनानी है, तो इसके लिए उनकी वैज्ञानिक उपयोगिता देखनी होगी।

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