समाज के हाशिये पर विधवाएं
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एक और 'दिन' गुजर गया, जिस पर हमारे देश में ध्यान नहीं दिया गया। जिनके नाम 23 जून का दिन समर्पित किया गया है, उन्हें तो हममें से बहुत लोग देखना भी पसंद नहीं करते। यह विधवा दिवस है। विधवाओं की संख्या के आधार पर भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। चीन हमसे थोड़ा आगे है। पर हमारे यहां विधवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस समय उनकी संख्या लगभग साढ़े चार करोड़ है। विधवाओं के बारे में एक किताब छपी है-परछाइयों का जीवन : विधवा अवस्था पर लेख। इसका संपादन उमा चक्रवर्ती और प्रीति गिल ने किया है। इसके अनुसार, विधवाओं को अन्य महिलाओं को अच्छी लगने वाली तमाम वस्तुओं का इस्तेमाल मना है। इन्हें दिन में एक बार खाना चाहिए, जमीन पर सोना चाहिए, शुचिता का जीवन बिताना चाहिए और सिर घुटाना चाहिए। भले इन नियमों का अब पालन नहीं होता, पर उनका असर अब भी है।
अपने यहां विधवाओं पर शोध का पहला बड़ा काम 1995 में मार्टी चेन और ज्यां द्रेज ने किया। अपने शोध के परिणामों को बांटने के लिए उन्होंने एक बड़ी कार्यशाला का आयोजन किया था, जिसमें देश के विभिन्न इलाकों की विधवाओं ने हिस्सा लिया। कई विधवाओं ने बताया कि हालांकि कानून के आधार पर उन्हें अपने दिवंगत पतियों की और अपने मां-बाप द्वारा उन्हें दी गई जमीन का मालिक बनने का अधिकार है, पर इससे अक्सर उन्हें वंचित रखा जाता है। उस जमीन के लिए उन्हें मारा जाता है, 'चुड़ैल' घोषित कर दिया जाता है और कई बार उनकी जान भी ले ली जाती है। उन्हें 'अशुभ' समझा जाता है।
उस शोध और कार्यशाला को दो दशक हो चुके हैं। पर आज भी तीर्थस्थलों पर विधवाओं की संख्या और उनकी हालत इसकी गवाही देती हैं कि उनके प्रति सोच नहीं बदली है। वृंदावन में गोपियों की जगह विधवाओं ने ले ली है। वे कोठरियों, मंदिरों और धर्मशालाओं के बरामदे पर रहती हैं। कुछ रुपयों या मुट्ठी भर अनाज के बदले दिन भर भजन करती हैं, फूलों की मालाएं बनाती हैं और मंदिरों की सफाई करती हैं। वाराणसी हो या दक्षिणेश्वर-सब जगह यही कहानी है। पश्चिम बंगाल के तारापीठ में एक विधवा रहती है, पार्बती मल।
उसकी शादी 10 साल की उम्र में 40 वर्ष के विधुर से कर दी गई थी। 24 साल की उम्र में वह विधवा हो गई। बड़ी मेहनत से उसने अपने दो बेटों को पाला। बड़े होने के बाद बेटों ने उसे घर से निकाल दिया, तो वह अपने भाई के पास चली गई। भाई ने उसे तारापीठ पहुंचा दिया। वहां वह भीख मांगती है। इलाहाबाद के कुंभ में खोए हुए लोगों की मदद के लिए तिवारी जी का तंबू मशहूर है। वह कहते हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी समस्या उन विधवा माताओं की है, जिन्हें कुंभ लाकर छोड़ दिया जाता है।
उन्हें इस बात की उम्मीद रहती है कि उनके परिवार के लोग उन्हें कभी लेने आएंगे, लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है। सरकार ने विधवाओं की सहायता के लिए पेंशन नीति बनाई है। इसकी राशि अभी पांच सौ रुपये प्रति माह है। कुछ राज्य सरकारों ने अपनी तरफ से यह राशि बढ़ाई भी है।
लेकिन तमाम सुबूत पेश करने के बाद भी सभी विधवाओं को यह नहीं मिलता। मौजूदा सरकार ने इस राशि में भारी कटौती करके और भी तमाम विधवाओं को इसे पाने से वंचित कर दिया है। शायद इसीलिए उसने अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस को भुलाने का मन बना लिया।
-पूर्व सांसद और माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य