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सजा औरतों को क्यों
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ब्रेस्ट आयरनिंग की कुप्रथा
अफ्रीका में कहीं-कहीं आज भी कुछ ऐसी कुप्रथाओं का पालन किया जाता है, जो वीभत्स हैं। उनमें लड़कियों का खतना किया जाना तो प्रमुख है ही, बालिकाओं को इस तरह की शारीरिक यातना भी दी जाती है, जिससे कि उनके स्तन का विकास न हो सके। लेकिन चौंकाने वाली जानकारी यह है कि बालिकाओं का शारीरिक विकास रोकने की यह अमानवीय कार्रवाई ब्रिटेन में धड़ल्ले से चल रही है।
लंदन, यॉर्कशायर, एसेक्स, वेस्ट मिडलैंड्स आदि से इस तरह की खबरें आ रही हैं कि वहां अफ्रीकी समुदाय में बालिकाओं के स्तनों को गर्म पत्थर से रगड़ने की यंत्रणादायी कवायदें चल रही हैं, ताकि स्तन की कोशिकाएं जल और टूट जाएं। इसे ब्रिटेन में ब्रेस्ट आयरनिंग कहा जा रहा है। हर सप्ताह या हर दूसरे सप्ताह अफ्रीकी बालिकाओं को इन तकलीफदेह अनुभवों से गुजरना पड़ रहा है। ब्रिटेन की एक नारीवादी संगठन का आकलन है कि वहां अफ्रीकी मूल की कम से कम 1,000 लड़कियों के साथ ऐसा अमानवीय सुलूक हुआ है।
लड़कियों पर पुरुष यौन अत्याचार न कर सकें, इसलिए लड़कियों को ही पंगु बना देना आखिर किस किस्म की व्यवस्था है! इससे शारीरिक नुकसान तो होता ही है, इसका मानसिक नुकसान भी कोई कम नहीं है। बालिकाओं पर इस तरह का अत्याचार उनकी मां-नानियां ही करती हैं। मां-नानियों की धारणा है कि इससे उनकी बच्चियां बलात्कारियों का शिकार होने से बच जाएंगी।
लेकिन सवाल यह है कि यौन अत्याचार पर अंकुश लगाने के लिए या महिलाओं के खिलाफ पुरुषों की बर्बरता को रोकने के लिए हमारा समाज पुरुषों के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई क्यों नहीं करता। पुरुषों को सबक सिखाने के बारे में कभी क्यों नहीं सोचा जाता? खुद को बचाने के लिए हमेशा लड़कियों के साथ ही अपमानजनक, अस्वाभाविक और अमानवीय सुलूक क्यों किया जाता है?
बहुत छोटी उम्र ही लड़कियों को पुरुषों की ताड़ती निगाहों से बचने-बचाने के नुस्खे सिखा-रटा दिए जाते हैं कि उन्हें कैसे बैठना है, कैसे चलना है, दुपट्टा कैसे रखना है, आदि-आदि। जिस समाज में महिलाएं हमेशा खुद पर हमले के अंदेशे से डरी रहें, क्या वह अच्छा और आदर्श समाज है? पुरुष कल्पना भी नहीं करना चाहते कि इसका महिलाओं की मानसिक स्थिति पर कितना विपरीत असर पड़ता है। अगर पुरुषों को हमेशा इस तरह खुद पर हमले का अंदेशा होता, तो क्या यह समाज उनके लिए आदर्श होता?
पुरुष वर्चस्ववादी यह समाज सोचना-समझना ही नहीं चाहता कि महिलाओं को असुरक्षा का माहौल देने के अलावा वह महिलाओं की मनःस्थिति को सहज और सामान्य बनाने के बारे में भी कभी नहीं सोचता। यह किस तरह का समाज है, जिसमें बच्चियों को ज्ञान होने के साथ ही लड़कों से डरने और उनसे बचकर रहने के बारे में बताया जाता है! इस आधुनिक दौर में महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं। आज वही समाज आगे है, जहां स्त्री-पुरुष का सहज-स्वाभाविक साहचर्य है।
जो समाज महिलाओं को पीछे धकेलने में विश्वास करता है, वह आगे नहीं बढ़ता। लेकिन हैरानी की बात यह है कि ब्रिटेन जैसे देश में अफ्रीकी मूल की लड़कियों के साथ इस तरह का मध्यकालीन सुलूक किया जा रहा है और इसके खिलाफ वैसा माहौल नहीं है, जैसा कि होना चाहिए।
मैंने मनुष्य योनि में जन्म लिया है। फिर मुझे अपने किसी अंग के लिए शर्मिंदा क्यों होना चाहिए? औरत होने का जुर्म लड़कियों को पैदा होने के साथ ही क्यों भुगतना चाहिए? वास्तविकता यह है कि वह पूरी उम्र इसका खामियाजा भुगतती है-बाल खुले क्यों हैं, चेहरा ढका क्यों नहीं है, चलते हुए सिर झुका हुआ क्यों नहीं है, किसी अजनबी पुरुष से सामने होने पर नजरें झुकी हुई क्यों नहीं हैं, आदि-आदि।
यह देखने वाली बात है कि नारी विद्वेष किस तेजी से एक प्रांत से दूसरे प्रांत में, एक देश से दूसरे देश में और एक महादेश से दूसरे महादेश में फैलता जा रहा है।
देखने और विचार करने वाली बात यह भी है कि सभ्य और विकसित कहे जाने वाले देशों में अविकसित और पिछड़े देशों की कुप्रथाएं जिस तरह पैर फैलाने लगी हैं, पिछड़े देशों में उस तरह विकसित देशों में व्याप्त मानवाधिकार, औरतों की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र की भावनाएं मजबूत नहीं हो रहीं।
यह विरोधाभास क्या सूचित करता है? इससे यह तो पता चलता ही है कि पश्चिम के जो देश नागरिकों को स्वतंत्रता देने और उनके मानवाधिकार की रक्षा के लिए जाने जाते हैं, वहां भी मध्यकालीन सोच अपनी जगह बना लेने में सक्षम हो रही है।
पश्चिम की महिलाओं के पिछड़े माने जाने वाले अफ्रीकी पुरुषों से ब्याह रचाने के अनेक उदाहरण हैं। बल्कि प्राच्य के समाज में शादी करने के बाद अनेक पश्चिमी महिलाओं द्वारा बुर्का और हिजाब का प्रयोग करने के उदाहरण भी सामने आए हैं। अगर किसी दिन परंपराओं के समर्थक लड़कियों का खतना कराए जाने का समर्थन करने लगें, तो आश्चर्य नहीं होगा। दुनिया भर के वामपंथी आखिर यह कहते ही आए हैं कि सभी संप्रदायों की संस्कृतियों को बचाए रखने की जरूरत है।
हमें क्या अब भी यह स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए कि सभी संस्कृतियों को, संस्कृति के नाम पर सभी प्रथाओं और कुप्रथाओं को स्वीकार नहीं किया जा सकता? कंधे से कंधा मिलाकर चलने की संस्कृति और योनि के खतने की कुप्रथा को भला एक कैसे माना जा सकता है?
नारी-विरोधी कुप्रथाओं को नारी-विरोधी कुछ समाज बरकरार रखना चाहते हैं, तो हम उसका समर्थन नहीं कर सकते। बल्कि ऐसी नारी-विरोधी, मानव-विरोधी कुप्रथा के खिलाफ आंदोलन करने की आवश्यकता है। हम यह भूल नहीं सकते कि दुनिया के ज्यादातर देशों में आज भी नारी-विरोधी अनेक प्रथाएं और सोच अस्तित्व में हैं।
सभ्य और आधुनिक होने के लिए औरतों को समान अधिकार देने की सोच पर हमें विश्वास करना ही होगा। वास्तव में आधुनिक होने के लिए नारी-विरोधी सोच और कुप्रथाओं को प्रतिबंधित किए बना चारा नहीं है।
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लंदन, यॉर्कशायर, एसेक्स, वेस्ट मिडलैंड्स आदि से इस तरह की खबरें आ रही हैं कि वहां अफ्रीकी समुदाय में बालिकाओं के स्तनों को गर्म पत्थर से रगड़ने की यंत्रणादायी कवायदें चल रही हैं, ताकि स्तन की कोशिकाएं जल और टूट जाएं। इसे ब्रिटेन में ब्रेस्ट आयरनिंग कहा जा रहा है। हर सप्ताह या हर दूसरे सप्ताह अफ्रीकी बालिकाओं को इन तकलीफदेह अनुभवों से गुजरना पड़ रहा है। ब्रिटेन की एक नारीवादी संगठन का आकलन है कि वहां अफ्रीकी मूल की कम से कम 1,000 लड़कियों के साथ ऐसा अमानवीय सुलूक हुआ है।
लड़कियों पर पुरुष यौन अत्याचार न कर सकें, इसलिए लड़कियों को ही पंगु बना देना आखिर किस किस्म की व्यवस्था है! इससे शारीरिक नुकसान तो होता ही है, इसका मानसिक नुकसान भी कोई कम नहीं है। बालिकाओं पर इस तरह का अत्याचार उनकी मां-नानियां ही करती हैं। मां-नानियों की धारणा है कि इससे उनकी बच्चियां बलात्कारियों का शिकार होने से बच जाएंगी।
लेकिन सवाल यह है कि यौन अत्याचार पर अंकुश लगाने के लिए या महिलाओं के खिलाफ पुरुषों की बर्बरता को रोकने के लिए हमारा समाज पुरुषों के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई क्यों नहीं करता। पुरुषों को सबक सिखाने के बारे में कभी क्यों नहीं सोचा जाता? खुद को बचाने के लिए हमेशा लड़कियों के साथ ही अपमानजनक, अस्वाभाविक और अमानवीय सुलूक क्यों किया जाता है?
बहुत छोटी उम्र ही लड़कियों को पुरुषों की ताड़ती निगाहों से बचने-बचाने के नुस्खे सिखा-रटा दिए जाते हैं कि उन्हें कैसे बैठना है, कैसे चलना है, दुपट्टा कैसे रखना है, आदि-आदि। जिस समाज में महिलाएं हमेशा खुद पर हमले के अंदेशे से डरी रहें, क्या वह अच्छा और आदर्श समाज है? पुरुष कल्पना भी नहीं करना चाहते कि इसका महिलाओं की मानसिक स्थिति पर कितना विपरीत असर पड़ता है। अगर पुरुषों को हमेशा इस तरह खुद पर हमले का अंदेशा होता, तो क्या यह समाज उनके लिए आदर्श होता?
पुरुष वर्चस्ववादी यह समाज सोचना-समझना ही नहीं चाहता कि महिलाओं को असुरक्षा का माहौल देने के अलावा वह महिलाओं की मनःस्थिति को सहज और सामान्य बनाने के बारे में भी कभी नहीं सोचता। यह किस तरह का समाज है, जिसमें बच्चियों को ज्ञान होने के साथ ही लड़कों से डरने और उनसे बचकर रहने के बारे में बताया जाता है! इस आधुनिक दौर में महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं। आज वही समाज आगे है, जहां स्त्री-पुरुष का सहज-स्वाभाविक साहचर्य है।
जो समाज महिलाओं को पीछे धकेलने में विश्वास करता है, वह आगे नहीं बढ़ता। लेकिन हैरानी की बात यह है कि ब्रिटेन जैसे देश में अफ्रीकी मूल की लड़कियों के साथ इस तरह का मध्यकालीन सुलूक किया जा रहा है और इसके खिलाफ वैसा माहौल नहीं है, जैसा कि होना चाहिए।
मैंने मनुष्य योनि में जन्म लिया है। फिर मुझे अपने किसी अंग के लिए शर्मिंदा क्यों होना चाहिए? औरत होने का जुर्म लड़कियों को पैदा होने के साथ ही क्यों भुगतना चाहिए? वास्तविकता यह है कि वह पूरी उम्र इसका खामियाजा भुगतती है-बाल खुले क्यों हैं, चेहरा ढका क्यों नहीं है, चलते हुए सिर झुका हुआ क्यों नहीं है, किसी अजनबी पुरुष से सामने होने पर नजरें झुकी हुई क्यों नहीं हैं, आदि-आदि।
यह देखने वाली बात है कि नारी विद्वेष किस तेजी से एक प्रांत से दूसरे प्रांत में, एक देश से दूसरे देश में और एक महादेश से दूसरे महादेश में फैलता जा रहा है।
देखने और विचार करने वाली बात यह भी है कि सभ्य और विकसित कहे जाने वाले देशों में अविकसित और पिछड़े देशों की कुप्रथाएं जिस तरह पैर फैलाने लगी हैं, पिछड़े देशों में उस तरह विकसित देशों में व्याप्त मानवाधिकार, औरतों की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र की भावनाएं मजबूत नहीं हो रहीं।
यह विरोधाभास क्या सूचित करता है? इससे यह तो पता चलता ही है कि पश्चिम के जो देश नागरिकों को स्वतंत्रता देने और उनके मानवाधिकार की रक्षा के लिए जाने जाते हैं, वहां भी मध्यकालीन सोच अपनी जगह बना लेने में सक्षम हो रही है।
पश्चिम की महिलाओं के पिछड़े माने जाने वाले अफ्रीकी पुरुषों से ब्याह रचाने के अनेक उदाहरण हैं। बल्कि प्राच्य के समाज में शादी करने के बाद अनेक पश्चिमी महिलाओं द्वारा बुर्का और हिजाब का प्रयोग करने के उदाहरण भी सामने आए हैं। अगर किसी दिन परंपराओं के समर्थक लड़कियों का खतना कराए जाने का समर्थन करने लगें, तो आश्चर्य नहीं होगा। दुनिया भर के वामपंथी आखिर यह कहते ही आए हैं कि सभी संप्रदायों की संस्कृतियों को बचाए रखने की जरूरत है।
हमें क्या अब भी यह स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए कि सभी संस्कृतियों को, संस्कृति के नाम पर सभी प्रथाओं और कुप्रथाओं को स्वीकार नहीं किया जा सकता? कंधे से कंधा मिलाकर चलने की संस्कृति और योनि के खतने की कुप्रथा को भला एक कैसे माना जा सकता है?
नारी-विरोधी कुप्रथाओं को नारी-विरोधी कुछ समाज बरकरार रखना चाहते हैं, तो हम उसका समर्थन नहीं कर सकते। बल्कि ऐसी नारी-विरोधी, मानव-विरोधी कुप्रथा के खिलाफ आंदोलन करने की आवश्यकता है। हम यह भूल नहीं सकते कि दुनिया के ज्यादातर देशों में आज भी नारी-विरोधी अनेक प्रथाएं और सोच अस्तित्व में हैं।
सभ्य और आधुनिक होने के लिए औरतों को समान अधिकार देने की सोच पर हमें विश्वास करना ही होगा। वास्तव में आधुनिक होने के लिए नारी-विरोधी सोच और कुप्रथाओं को प्रतिबंधित किए बना चारा नहीं है।