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क्यों नाखुश होंगे 13 अर्थशास्त्री? मोदी 2.0 सरकार ने ऐसे समय कार्यभार संभाला है जब गिरावट और तेज हुई

Sun, 07 Jul 2019 02:23 AM IST
पी. चिदंबरम पी चिदंबरम
पी चिदंबरम Published by: पी. चिदंबरम Updated Sun, 07 Jul 2019 02:23 AM IST
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Why will be unhappy 13 economists ?
पी चिदंबरम - फोटो : Facebook
पांच साल पहले जब डॉ अरविंद सुब्रमण्यम ने अपनी पहली आर्थिक समीक्षा (2014-15) पेश की थी, तब उन्होंने कहा था, 'भारत बेहद प्रभावी स्थिति में पहुंच चुका है, राष्ट्रों के इतिहास में यह दुर्लभ क्षण होता है, जिसमें वह दो अंकों की मध्यम अवधि की विकास रणनीति को आगे बढ़ा सकता है।' मोदी 1.0 सरकार के दौरान वह यह देखने के लिए अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके कि सरकार अपने वादों पर अमल करने में नाकाम रही। उनके उत्तराधिकारी डॉ. कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम को यह जिम्मेदारी मिली कि वह यह स्वीकार कर सकें कि मोदी 1.0 सरकार पांच वर्ष की अवधि के दौरान जीडीपी की औसत वृद्धि दर केवल 7.5 फीसदी ही कायम रख सकी। 

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पांच साल पहले जब डॉ अरविंद सुब्रमण्यम ने अपनी पहली आर्थिक समीक्षा (2014-15) पेश की थी, तब उन्होंने कहा था, 'भारत बेहद प्रभावी स्थिति में पहुंच चुका है, राष्ट्रों के इतिहास में यह दुर्लभ क्षण होता है, जिसमें वह दो अंकों की मध्यम अवधि की विकास रणनीति को आगे बढ़ा सकता है।' मोदी 1.0 सरकार के दौरान वह यह देखने के लिए अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके कि सरकार अपने वादों पर अमल करने में नाकाम रही। उनके उत्तराधिकारी डॉ. कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम को यह जिम्मेदारी मिली कि वह यह स्वीकार कर सकें कि मोदी 1.0 सरकार पांच वर्ष की अवधि के दौरान जीडीपी की औसत वृद्धि दर केवल 7.5 फीसदी ही कायम रख सकी। 

7.5 फीसदी की विकास दर संतोषजनक है, लेकिन यह दो अंकों की विकास दर के कहीं आसपास भी नहीं है। इसके अलावा पिछले पांच वर्ष के दौरान विकास दर क्रमशः 7.4, 8.0, 8.2 और 6.8 फीसदी रही है। डॉ सुब्रमण्यम शुरू के तीन वर्षों के दौरान विकास दर के 7.4 फीसदी से 8.2 फीसदी पहुंचने पर खुश हुए होंगे, लेकिन मुझे संदेह है कि नवंबर, 2016 में जब देश पर नोटबंदी की मार पड़ी थी, तब वह परेशान हुए होंगे। उसके बाद से विकास दर 8,2 फीसदी से गिरकर 7.2 और 6.8 फीसदी हो गई।

मोदी 2.0 सरकार ने ऐसे समय कार्यभार संभाला है, जब यह गिरावट और तेज हुई है। वर्ष 2018-19 के दौरान विभिन्न तिमाहियों में विकास दर क्रमशः आठ, सात, 6.6 और 5.8 फीसदी रही। ऐसी खतरनाक परिस्थिति में नए मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) ने मोदी 2.0 सरकार के लिए लक्ष्य तय किए हैंः

'भारत का लक्ष्य 2024-25 तक पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का है, जिससे वह दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। सरकार द्वारा रिजर्व बैंक के लिए मौद्रिक नीति रूपरेखा के रूप मुद्रास्फीति की दर चार फीसदी निर्धारित की गई है, उसे देखते हुए इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वास्तविक विकास दर आठ फीसदी होने की आवश्यकता है।'

यह एक उचित लक्ष्य है। हमारे समक्ष प्रश्न यह है कि निर्मला सीतारमण का पहला बजट आर्थिक समीक्षा में तय लक्ष्य की ओर कितना आगे बढ़ा? हममें से हर कोई ऐसे बक्सों की सूची बनाकर बजट विवरणों के आधार पर खुद से पूछ सकता है कि वित्त मंत्री ने कितने बक्सों में टिक लगाया।

अक्तूबर, 2018 में अंतरराष्ट्रीय ख्याति के तेरह अर्थशास्त्रियों ने 14 शोध पत्र तैयार किए, जो 2019 में व्हाट इकोनॉमी नीड्स नाऊ (अर्थव्यवस्था को अभी किस चीज की जरूरत है) शीर्षक से प्रकाशित हुए। ये सारे अर्थशास्त्री भारतीय या भारतीय मूल के थे।

डॉ अभिजीत बनर्जी और डॉ रघुराम राजन ने उनके विचारों को परखने के बाद 'भारत की आठ शीर्ष चुनौतियां' शीर्षक से इस संग्रह का उपसंहार लिखा। इनमें से प्रत्येक का संबंध प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अर्थव्यवस्था से है। नीचे बक्सों की मेरी सूची है, जिनमें से पांच विचार मैंने इस किताब से लिए है। यहां बक्से दिए गए हैं, और मैंने बताया है कि क्यों मैंने इन्हें क्रॉस किया है या इसमें राइट का टिक लगाया हैः

✖ राजकोषीय घाटे पर अंकुशः राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाने में मोदी सरकार का रिकॉर्ड बहुत खराब है। पहले पांच वर्षों के दौरान यह राजकोषीय घाटे को 4.5 फीसदी से 3.4 फीसदी तक कम करने में सफल रही। वास्तव में चार वर्षों के दौरान राजकोषीय घाटा 3.4 फीसदी से 3.5 फीसदी के बीच था और 2019-2020 के बजट में इसे 3.3 फीसदी तक नीचे लाने का वादा किया गया है। 2018-19 के आंकड़े को लेकर संदेह है, क्योंकि उस वर्ष राजस्व का भारी हानि हुई थी और बजट की भारी उधारी बकाया थी। इसलिए 2019-2020 के राजकोषीय घाटे का अनुमान भी संदेह के दायरे में है।   

✖  तनावग्रस्त क्षेत्र ( कृषि, बिजली, बैंकिंग): बजट भाषण में कृषि क्षेत्र के तनाव को कम करने के किसी भी तरह के उपाय का जिक्र नहीं है। बिजली के बारे में इसमें मौजूदा योजना उदय को ही दोहराया गया है, जिसका लक्ष्य वितरण कंपनियों के वित्तीय और परिचालन प्रदर्शन में सुधार करना है। इसमें पुराने और नाकारा संयंत्रों को रिटायर करने की बात की गई है और प्राकृतिक गैस में कमी के कारण गैस संयंत्रों की क्षमता के कम उपयोग की ओर ध्यान देने की बात की गई है। 

बैंकिंग क्षेत्र के बारे में इसमें, सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 70,000 करोड़ रुपये (यह पूरी तरह से नाकाफी है) उपलब्ध कराने और बैंकों को वित्तीय रूप से मजबूत एनबीएफसी की जमा संपत्तियों को खरीदने के लिए छह माह में एक बार आंशिक क्रेडिट गारंटी प्रदान करने का वादा किया गया है। (यह अपर्याप्त तरलता को समझने में पूरी तरह से नाकाम रहा )

✖  कारोबार का बेहतर माहौलः कारोबारी माहौल को 'बेहतर' बनाने से संबंधित अनेक विचार मेज पर मौजूद थे। यदि करोबार वही चीजें उसी ढंग से करेगा तो इससे क्या अच्छा होगा और क्या सिर्फ इसे इसी तरह से करते रहने से कारोबार आसान हो जाएगा? विशेष आर्थिक क्षेत्र जरूरी नहीं कि निर्यात को ही लक्षित हों; श्रम कानूनों को बदलें, न कि सिर्फ उन्हें संहिता बनाएं; स्टार्ट अप को शुरू होने और बिना किसी मंजूरी या लाइसेंस वगैरह के तीन साल तक चलने की मंजूरी दें। ये सब ऐसे विचार थे, जिन्हें स्वीकार किया जा सकता था।

✖  कम बोझ वाला नियंत्रणः सर्वश्रेष्ठ समाधान है व्यापक विकेंद्रीकरण। इसकी शुरुआत स्कूली शिक्षा को राज्यों को स्थानांतरित करने से हो सकती है, जैसा कि मूल संविधान में प्रावधान था, उसके बाद और अधिक विषयों को समवर्ती सूची से राज्य सूची में स्थानांतिरत किया जा सकता है। इसके उलट वित्त मंत्री ने स्कूल और कॉलेज की शिक्षा में केंद्र सरकार की बड़ी भूमिका मान ली! रिजर्व बैंक, सेबी, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, सीबीडीटी, सीबीआईसी आदि नियंत्रकों में बदल चुके हैं और विनियम कम होने के बजाए बोझ बन गए हैं। 

✔ और अधिक नकद हस्तांतरणः इस मामले में केंद्र सरकार ने आगे बढ़कर डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया है और बड़ी नकदी निकासी को हतोत्साहित किया है। यह स्वाभाविक है कि और अधिक सब्सिडी और नकद लाभ प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण के जरिये हस्तांतरित होंगे। हालांकि यह 'सुधार' सात वर्ष पुराना है, लेकिन मैं इसके बक्से पर टिक लगाऊंगा।

अर्थव्यवस्था को मौलिक सुधारों की जरूरत है, जैसा कि 1991-96 के दौरान किया गया था। सरकार के पास ऐसे सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए जनादेश प्राप्त है। बिना किसी स्पष्टीकरण के सरकार ने वृद्धिशील सुधारों का रास्ता चुना है। वे 13 अर्थशास्त्री, जो कि सारे भारतीय हैं या भारतीय मूल के हैं, इससे मायूस होंगे। वे लोग भी, जो मौलिक सुधारों के हिमायती थे।
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