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पंचशील को क्यों याद करें
विजय क्रांति
Updated Tue, 01 Jul 2014 07:10 PM IST
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आखिरकार चीन सरकार ने 1954 में भारत-चीन के बीच हुए उस ‘पंचशील समझौते’ की 60वीं सालगिरह मना ही डाली, जिसे लेकर किसी जमाने में भारत सरकार गद्गद हुई घूमती थी। हालांकि इसमें हिस्सा लेने के लिए भारत की ओर से उपराष्ट्रपति मुहम्मद हामिद अंसारी वहां गए, लेकिन नई दिल्ली की हवा से वह उत्साह गायब था, जिसका प्रदर्शन बीजिंग में पिछले कई महीनों से बढ़-चढ़ कर किया जा रहा था।
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पर चीनी अंदाज में समारोह की पूर्व संध्या पर बीजिंग ने चीन का नया नक्शा भी जारी कर दिया, जिसमें पहली बार आधिकारिक तौर पर न केवल भारत के अरुणाचल प्रदेश के एक बड़े हिस्से को, बल्कि जम्मू-कश्मीर के कई हिस्सों को भी चीन का भाग दिखाया गया है। अपनी इसी अदा को संगत देते हुए चीनी सेना की एक टुकड़ी अपनी आक्रामक स्पीडबोट में लद्दाख की पानगोंग झील के भारतीय नियंत्रण वाले हिस्से में तीन किलोमीटर भीतर तक घुस आई। उसी दिन यह समाचार छपा कि चीनी सेना ने भारत के पाक-अधिकृत जम्मू-कश्मीर वाले हिस्से के रास्ते चीन के शिंजियांग से पाकिस्तानी सैनिक बंदरगाह ग्वादर के बीच 1,800 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन का सर्वेक्षण शुरू कर दिया है। यह सब ऐसे मौके पर हुआ, जब उपराष्ट्रपति के साथ ही केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण भी चीन में मौजूद थीं। इसे मोदी सरकार की सदाशयता और भारत-चीन संबंधों को सही रास्ते पर लाने का ही संकेत माना जाएगा कि उकसाने वाली इन हरकतों के बावजूद नई दिल्ली ने वैसी प्रतिक्रिया नहीं दी, जैसी 1979 में विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के समय हुई थी। उनकी यात्रा के दौरान चीन द्वारा वियतनाम पर हमला करने पर नाराजगी जताते हुए भारत सरकार ने वाजपेयी को बीच में ही वापस बुला लिया था।
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लेकिन समारोह मनाने के इस उत्साह में किसी ने भी यह याद करने की कोशिश नहीं की कि 29 अप्रैल, 1954 को भारत और चीन के बीच बीजिंग में किए गए इस समझौते का 1955 के उस ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय अफ्रीकी-एशियन बांडुग सम्मेलन से कोई लेना-देना नहीं है, जिसमें ‘पंचशील’ को अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मुख्य मानक और दिशा-निर्देशक सिद्धांत के तौर पर स्वीकार किया गया था।
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असलियत तो यह है कि ‘भारत और चीन के तिब्बती क्षेत्र के बीच व्यापार और व्यवहार की संधि’ नाम वाला यह समझौता केवल तिब्बत पर केंद्रित था, जिस पर चीन ने जबरन 1951 में कब्जा कर लिया था। न तो समझौते के शीर्षक में और न उसकी छह शर्तों में कहीं भी ‘पंचशील’ का जिक्र है। असली मसौदा तिब्बत में भारत के साथ होने वाले सीमा व्यापार और भारतीय तीर्थयात्रियों के साथ व्यवहार से ज्यादा कुछ भी नहीं था। बल्कि इस संधि में भारत ने कूटनीतिक, सैनिक और डाक तथा संचार के वे सारे अधिकार चीन को सौंप दिए, जो ब्रिटिश राज के बाद भारत सरकार को स्वतंत्र तिब्बत में मिल गए थे।
असल में नेहरू जी ‘पंचशील’ के भारतीय विचार से इतने अभिभूत थे कि चाऊ ने उन्हें खुश करने के लिए पंचशील को संधि में प्रस्तावना के रूप में शामिल कर लिया, लेकिन व्यवहार में इस प्रस्तावना का कोई अर्थ नहीं था। चाऊ की चीनी चाशनी के लपेटे में फंसे नेहरू जी को बहुत देर में समझ आया कि इस संधि के माध्यम से चीन ने भारत से तिब्बत पर चीन के पूर्ण अधिकार की मुहर लगवा ली है। इस समझौते में भारत द्वारा तिब्बत को ‘चीन के तिब्बती क्षेत्र’ के तौर स्वीकार करते ही तिब्बत पर चीनी कब्जे के खिलाफ सारा अंतरराष्ट्रीय उत्साह समाप्त हो गया।
हालांकि तब नेहरू जी इस संधि को अनंतकाल के लिए चाहते थे, पर चीनी जिद पर इसकी समय सीमा केवल आठ साल रखी गई। इसे इतिहास का संयोग कहिए या चीन सरकार का दुर्योग कि 1962 में संधि का काल खत्म होने के तुरंत बाद चीन ने भारत पर हमला कर दिया। तब नेहरू जी और उनके सहयोगियों को समझ आया कि वे तो हिंदी-चीनी भाई-भाई की धुन पर झूमते रहे, जबकि इस दौर में चीन ने तिब्बत को अपनी सैनिक छावनी में बदल डाला था और तिब्बत के रास्ते भारतीय सीमा तक पक्की सड़कों का जाल बिछा दिया था।
लेकिन 1954 के इस कथित ‘पंचशील’ समझौते के बाद चीन ने किस तरह से समझौते की सभी छह शर्तों को तार-तार किया इसका स्वाद मिलने में भारत को बहुत देर नहीं लगी। उदाहरण के लिए, इस संधि के माध्यम से चीन ने तो नई दिल्ली, कोलकाता और कालिंपोग में अपने वाणिज्य दूतावास खोलने की सुविधा ले ली। लेकिन तिब्बत के ग्यांत्से, यातुंग और गारतोक में पहले से बने भारतीय व्यापार कार्यालयों के लिए इतनी मुसीबतें खड़ी कर दीं कि भारत को उन्हें आखिरकार बंद करना पड़ा।
भारतीय विदेश मंत्रालय के 22 जनवरी, 1960 के एक नोट के अनुसार, चीनी अधिकारियों ने स्थानीय लोगों पर यातुंग में भारतीय अधिकारियों का बहिष्कार करने और उन्हें अपने घर किराए पर न देने के निर्देश जारी किए। 31 जुलाई, 1960 की एक अन्य रिपोर्ट में भारतीय व्यापार प्रतिनिधि ने अपनी ल्हासा यात्रा का विवरण देते हुए लिखा है कि भारतीय और नेपाली दुकानों का सार्वजनिक बहिष्कार करने के आदेश दिए गए हैं। उन पर बेतहाशा टैक्स लगाकर उन्हें व्यापार बंद करने पर मजबूर किया जा रहा है।
इस समझौते की बाकी शर्तों में कैलाश और मानसरोवर के भारतीय तीर्थयात्रियों और व्यापारियों के लिए खोले गए छह रास्तों में से आज केवल एक लिपूलेख दर्रा ही खुला है। लद्दाख और उत्तराखंड के बाकी सभी दर्रे चीनी मेहरबानी से आज भी बंद हैं। सीमा पर होने वाले व्यापार की असलियत भी हास्यास्पद है। ऐसे में एक के बाद एक चीनी आक्रामक कदमों के बीच, 1954 के ‘पंचशील समझौते’का समारोह करना बेतुका लगता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और चीन-तिब्बत मामलों के विशेषज्ञ हैं)