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नवजातों को बचाने में हम विफल क्यों हैं?

Sun, 12 Jul 2015 05:34 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Sun, 12 Jul 2015 05:34 PM IST
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Why we fail in save infant?

इस सप्ताह दिल्ली में समय से पहले पैदा हुए एक बच्चे की, जिसे सांस संबंधी जटिलताएं थीं, वक्त पर इलाज न मिलने से मौत हो गई। अगर राजधानी का यह हाल है, तो देश के दूसरे हिस्सों की स्थिति की सहज ही कल्पना की जा सकती है। इस त्रासदी ने देश में नवजातों की मृत्यु के बढ़ते आंकड़े की ओर एक बार फिर ध्यान दिलाया है। इससे एक और ज्वलंत प्रश्न पैदा हुआ है। विगत सितंबर से देश में नवजातों की सुरक्षा के लिए एक कार्ययोजना (आईएनएपी) लागू है, लेकिन एक राष्ट्र के तौर पर क्या हम अपने नवजातों को बचाने पर पर्याप्त ध्यान दे रहे हैं?

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नवजातों की मौत के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है। वर्ष 2012 में दुनिया भर में तीस लाख नवजातों (एक से सत्ताईस दिन तक के बच्चे) की मृत्यु हुई थी, जिनमें से 7,79,000 मौतें भारत में हुई थीं। सरकारी डॉक्टर हमेशा देवदूत नहीं होते, न ही सरकारी अस्पतालों की स्थिति हमारे यहां बहुत अच्छी है। दिल्ली में मारे गए उस नवजात शिशु की बात करें, तो राजधानी के दो सरकारी अस्पतालों ने पर्याप्त सुविधाएं न होने का हवाला देकर उसका इलाज करने से इन्कार कर दिया था।
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पर पश्चिमोत्तर दिल्ली के उस निजी अस्पताल की बात कोई नहीं कर रहा, जहां वह शिशु पैदा हुआ था। उस अस्पताल के डॉक्टरों ने माता-पिता को कहा था कि शिशु को सांस संबंधी जटिलताएं हैं, इसलिए उसे कम से कम दो दिनों तक वेंटीलेटर पर रखना पड़ेगा, जिसका खर्च करीब बीस हजार रुपये बैठेगा। शिशु के पिता दिहाड़ी मजदूर थे, जिनकी मासिक आय चार हजार रुपये थी। वह वेंटीलेटर का इतना खर्च नहीं उठा सकते थे। ऐसे में, डॉक्टरों ने शिशु को सरकारी अस्पताल में दाखिल कराने का सुझाव दिया। जिन भी सरकारी अस्पतालों में वे गए, वहां भारी भीड़ थी। वहां वेंटीलेटर भी नहीं थे। डॉक्टरों के पास समय भी नहीं था। उस परिवार को इंतजार करना पड़ा। नतीजतन शिशु की मौत हो गई।
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आपातकालीन उपचार सुविधाओं से लैस कोई अस्पताल क्या सिर्फ इस आधार पर किसी रोगी को आपातकालीन वार्ड में भर्ती करने से इन्कार कर सकता है, क्योंक उसके परिवार के पास फीस चुकाने के पैसे नहीं हैं? क्या पश्चिमोत्तर दिल्ली के उस निजी अस्पताल का यह कर्तव्य नहीं था कि वह उस शिशु को वेंटीलेटर पर रखता, और उसकी हालत सुधरने पर उसे किसी सरकारी अस्पताल में ले जाने की सलाह देता?
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा है कि आपातकालीन चिकित्सा का अधिकार जीने के मौलिक अधिकार के दायरे में आता है। शीर्ष अदालत ने यह निर्णय 1989 में परमानंद कटारा बनाम भारत सरकार मामले में दिया था। दरअसल एक स्कूटर सवार दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और उसे काफी चोटें आई थीं। पर नजदीक के अस्पताल ने यह कहकर उसका इलाज करने से इन्कार कर दिया था कि उसके यहां ऐसे मरीजों की चिकित्सा की सहूलियत नहीं है, जिसका मामला कानूनी भी हो। उस स्कूटर सवार को बीस किलोमीटर दूर दूसरे अस्पताल में ले जाया जाता, इससे पहले उसने दम तोड़ दिया।

स्कूटर सवार का इलाज न करके उस अस्पताल ने गलती की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने छब्बीस साल पहले वह फैसला सुनाया था। लेकिन आज भी ऐसा कोई कानूनी ढांचा तैयार नहीं किया गया है, जिसमें इस तरह के सभी मामलों में मरीजों को आपातकालीन चिकित्सा वार्ड में तत्काल दाखिल करने की व्यवस्था हो। हमारे कानून निर्माताओं ने जान-बूझकर इस मुद्दे की अनदेखी कर दी है। इसी का नतीजा है कि गंभीर स्थितियों में मरीजों को कई बार आपात चिकित्सा सुविधा नहीं मिलती। द क्लिनिकल एस्टाब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन ऐंड रेग्युलेशन) ऐक्ट, 2010 में उन अस्पतालों में भी अनिवार्य आपात चिकित्सा का प्रावधान है, जहां कर्मचारियों और सुविधाओं की कमी है। लेकिन इसका पूरी तरह पालन नहीं होता। कई राज्यों में इस केंद्रीय कानून को अब तक लागू नहीं किया गया है।

हाल के वर्षों में हमारे यहां नवजात बीमारों की विशेष चिकित्सा के लिए सिक न्यूबोर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) खोले गए हैं। अप्रैल, 2011 में ऐसी यूनिटों की संख्या 253 थी, जो मई, 2013 में बढ़कर 391 हो गई। पर देश के तेरह राज्य/केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं, जहां ऐसी एक भी यूनिट नहीं खुली है। जबकि कई राज्यों में ऐसी यूनिटों में डॉक्टरों और नर्सों का अभाव है।

जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ अमर जेसानी कहते हैं, आपात सुविधाओं से लैस कोई अस्पताल अगर गंभीर मरीजों को भर्ती करने से मना करता है, तो यह गंभीर लापरवाही है। लिहाजा मरीज के गंभीर स्थिति में होने या उसकी मौत होने पर ऐसे अस्पतालों से हर्जाना लेना चाहिए। अमेरिका में तीन दशक पहले इस तरह की लापरवाही से ही 'आपातकालीन उपचार का अधिकार' अस्तित्व में आया।


दिल्ली में उस नवजात की मौत पर सरकार हरकत में आई है। जांच हो रही है कि अस्पतालों ने उसका इलाज करने से क्यों मना किया। उम्मीद है कि जांच के नाम पर इस गंभीर मुद्दे को दबा नहीं दिया जाएगा।

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