पीछे क्यों हट गए ट्रंप
सोवियत साम्राज्य को अपनी महाशक्ति का रुतबा खोने में दो दशकों का समय लगा और अंततः दुनिया भर में उसका पतन हो गया। लेकिन अरबपति से अमेरिकी राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस समझौते से हटते हुए चार महीने से कम समय में ही अविश्वसनीय ढंग से वैश्विक जलवायु परिवर्तन से निपटने में अमेरिका की नेतृत्वकारी भूमिका त्याग दी है। ऐसा लगता है कि उम्मीदवार ट्रंप ने राष्ट्रपति ट्रंप पर विजय प्राप्त कर ली है। भले ही पेरिस समझौते से पीछे हटकर ट्रंप ने अपना चुनावी वायदा पूरा किया हो और उनके कट्टर समर्थक प्रसन्न हुए हों, लेकिन दीर्घकालीन अर्थों में उनका यह फैसला अमेरिका के राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाएगा और वैश्विक नेता के रूप में अमेरिकी छवि को तेजी से ग्रहण लगेगा। नेता वही है, जो आगे बढ़कर नेतृत्व करे, जो रणक्षेत्र से भाग खड़ा हो, वह कभी सच्चा नेता नहीं हो सकता!
पेरिस समझौते से बाहर होने के जो कारण उन्होंने बताए हैं, -फैक्टरियों का बंद होना, रोजगार का नुकसान, संप्रभुता का कमजोर पड़ना और अमेरिका के साथ अनुचित व्यवहार, वे तथ्यपरक नहीं हैं। नौ गवर्नर, आठ मेयर और कुछ कंपनियों के सीईओ तथा चर्चित हस्तियों ने ट्रंप के इस संकीर्णतावादी फैसले की आलोचना की है। पूर्व राष्ट्रपति अल गोर ने इसे एक लापरवाह और असंगत कदम बताया है। उनके मुताबिक, इससे दुनिया में अमेरिका की स्थिति कमजोर होगी। इसी तरह गोल्डमैन सैश, ऐपल, फेसबुक के सीईओ ने भी नाराजगी जताते हुए इसे पर्यावरण के लिए झटका और विश्व में अमेरिकी नेतृत्व को कमजोर करने वाला बताया है। हॉलीवुड अभिनेता लियोनार्डो डिकैप्रियो ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप के असावधान फैसले से हमारी धरती का भविष्य खतरे में पड़ गया है। ट्रंप के फैसले से असहमति जताते हुए टेस्ला के सीईओ एलॉन मुस्क ने राष्ट्रपति की आर्थिक परिषद से इस्तीफा दे दिया है।
न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर ब्लूमबर्ग ने निंदा करते हुए दृढ़ निश्चय के साथ कहा कि अमेरिका पूरी तरह से पेरिस समझौते का पालन करेगा और उसका सम्मान करेगा तथा वाशिंगटन (ट्रंप प्रशासन) हमे रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकता। यही नहीं, कैलिफोर्निया (विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था) के गवर्नर ने एक कदम आगे बढ़कर कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए चीन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है। इस प्रकार भले ही ट्रंप और उनके कट्टर समर्थक जलवायु परिवर्तन समझौते को धोखा बता रहे हों, लेकिन पूरा देश उनके फैसले के समर्थन में नहीं है, यहां तक कि उनकी बेटी इवान्का भी नहीं!
यूएनईपी के कार्यकारी निदेशक एरिक सॉलथैम ने अमेरिकी फैसले को निराशाजनक और अफसोसनाक बताते हुए कहा कि पेरिस समझौता बोझ नहीं है, जैसा कि ट्रंप दावा कर रहे हैं, बल्कि नवीनीकृत ऊर्जा में निवेश से ज्यादा, बेहतर और अच्छा वेतन देने वाली नौकरियां पैदा होती हैं और यह अमेरिका में पहले से हो रहा है। सॉलथैम का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ाई वैश्विक सुरक्षा में निवेश है, क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग विवाद, अस्थिरता और आतंकवाद की वाहक है, जिससे कई देशों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
पेरिस में सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि 193 अन्य देशों ने भी अपनी संप्रभुता को दांव पर लगाया। प्रति व्यक्ति 16.5 टन कार्बन उत्सर्जन करने वाले अमेरिका को ऐतिहासिक जिम्मेदारी के सिद्धांत पर अमल से छूट दे दी गई। इसलिए अमेरिका के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ। स्पष्ट है कि 2025 तक 2005 के 26 से 28 फीसदी स्तर तक कार्बन उत्सर्जन कम करने की अमेरिकी प्रतिबद्धता ट्रंप को परेशान कर सकती है।
जर्मन चांसलर ने महसूस किया कि अमेरिका खुद को और पूरी दुनिया को नुकसान पहुंचा सकता है। उन्होंने जोर दिया कि जर्मनी, यूरोप और अन्य देश एकजुट रहेंगे और ज्यादा निर्णायक कदम उठाएंगे। तो फ्रांस के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मैक्रों ने जोर दिया कि हम महत्वाकांक्षी समझौते से कम पर समझौता नहीं करेंगे। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप के कदम से ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक कम करने के विश्व के लक्ष्य को गंभीर झटका लगेगा।
हालांकि पेरिस समझौते से अमेरिका के अलग होने से चीन, भारत और यूरोपीय संघ को जलवायु परिवर्तन पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का मौका मिला है, लेकिन अगर सबसे बड़े प्रदूषक देश निरंतर प्रदूषण फैलाते रहेंगे, तो पर्यावरण की रक्षा कैसे हो पाएगी?
नरेंद्र मोदी और सुषमा स्वराज ने स्पष्ट रूप से दावा किया कि भारत ने किसी बाहरी देश के दबाव में पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किया है और न ही उसे धन की पेशकश का लालच दिया गया। भारत पर्यावरण की रक्षा के लिए खड़ा है, क्योंकि यह प्रकृति के साथ रहने की सदियों पुरानी परंपरा की पुष्टि करता है, जैसा कि पेड़ों, नदियों, पहाड़ों, पशुओं की पूजा के रूप में दिखता है। मोदी सरकार पेरिस समझौते में निर्दिष्ट कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है और अक्षय ऊर्जा स्रोतों से 100 गीगावाट ऊर्जा पैदा करने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है।
ट्रंप और मोदी ने फोन पर तीन बार बातचीत की है। ट्रंप ने रियाद में भारत को आतंकवाद से पीड़ित बताया, जिसका भारत में स्वागत किया गया। लेकिन पेरिस समझौते से पीछे हटने की घोषणा करते हुए भारत का उन्होंने जिस तरह से जिक्र किया, उससे दोनों नेताओं के अगले महीने वाशिंगटन में होने वाली बैठक से पहले कुछ नकारात्मकता पैदा हुई है। ट्रंप के दावों के विपरीत वर्ष 2015 में भारत को 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर (अरबों नहीं) की सहायता प्राप्त हुई है, जो 2018 तक घटकर 34 मिलियन डॉलर रह जाएगी।
इसके अलावा भारत को यह भ्रम नहीं था कि अमेरिकी सरकार संबंधित कंपनियों को जरूरी टेक्नोलॉजी हस्तांतरण के लिए आदेश जारी करेगी, इसके लिए भारत को सीधे बातचीत करनी होगी। पिछले चार महीनो में ट्रंप ने कई यू-टर्न लिए हैं, इसलिए गृह मंत्री राजनाथ सिंह को उम्मीद है कि ट्रंप अपने फैसले पर विचार करेंगे। कम से कम उन्हें भारत पर आरोप लगाना बंद करना चाहिए। भारत और अमेरिका के बीच बहुस्तरीय और बहुआयामी रिश्ते को जलवायु परिवर्तन या एच1बी वीजा के मतभेदों के कारण खत्म नहीं होने देना चाहिए। भारत की सात शीर्ष आईटी कंपनियों को 2016 में मात्र 9356 नए एच1बी वीजा मिले। ट्रंप एवं मोदी को भारत-अमेरिकी रिश्ते को बेहतर बनाना चाहिए।