इतनी बेताब क्यों है भाजपा

एम के वेणु Updated Wed, 07 May 2014 06:52 PM IST
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Why so BJP in hurry

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भारतीय जनता पार्टी ने पहले तो सफलतापूर्वक यह कथानक गढ़ा कि केंद्र में ज्यादा विकास आधारित एक वैकल्पिक व्यवस्था की मतदाताओं की चाह के मद्देनजर पूरे उत्तर भारत में नरेंद्र मोदी के पक्ष में लहर चल रही है। इसके बाद कुछ चुनावी सर्वेक्षणों में जताई गई अनुकूल राय के कारण पार्टी को यह भरोसा होने लगा था कि वह अपने दम पर लोकसभा की 272 सीटों के आंकड़े के नजदीक पहुंच सकती है।
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मगर अचानक, पिछले 48 घंटों के दौरान चीजें बदलती दिखीं। जब कुछ सर्वेक्षणों ने भाजपा के 240-245 सीटों पर सिमट जाने की बात की, तो नरेंद्र मोदी के माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिखने लगीं। फिर क्या था, अपने सुर बदलते हुए मोदी ने फैजाबाद में एक जनसभा में अचानक रामराज्य की बात की, जहां मंच के पीछे भगवान राम और एक मंदिर की विशाल तस्वीरें लगी हुई थीं। यही नहीं, अमित शाह ने आजमगढ़ को आतंकवाद का गढ़ बताने में भी देर नहीं लगाई। ये घटनाक्रम भाजपा खेमे की हताशा को ही बताते हैं, जिसे अब उन आखिरी पचास सीटों की चिंता सता रही है, जो ऐसी 250 सीटों का हिस्सा हैं, जिनके बारे में मोदी को लगता है कि पार्टी अपने दम पर जीत सकती है। वरना आखिर ऐसी क्या वजह थी कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की 33 लोकसभा सीटों पर मतदान से ठीक पहले, विकास के अपने मुद्दों से किनारा करते हुए मोदी को सांप्रदायिक और जाति आधारित मुद्दे उठाने पड़े? सवाल यह है कि क्या भाजपा के अपने गणित में पचास सीटें चिंता का कारण बन गई हैं?
या कहीं ऐसा तो नहीं कि भाजपा को महज 200 सीटों तक सिमटने और फिर तमाम गठबंधन सहयोगियों से मदद लेने पर मजबूर होने का डर सताने लगा है? दरअसल इन्हीं सवालों ने न केवल नरेंद्र मोदी की घबराहट में इजाफा किया है, बल्कि उन्हें तमाम चुनावी हथकंडों को अपनाने पर मजबूर भी किया है।
गौरतलब है कि प्रियंका गांधी के 'नीच राजनीति' के आरोप पर प्रतिक्रिया देते हुए नरेंद्र मोदी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर अपनी जाति के बारे में खुलकर बोला। प्रियंका ने जिस 'नीच' शब्द का उपयोग किया, उसे मोदी ने बेहद चालाकी के साथ अपने जातिगत पिछड़ेपन से जोड़ दिया। मगर ऐसे हथकंडे उस नेता की सोच को ज्यादा दर्शाते हैं, जो खुद को लेकर ऊहापोह में है।

इस दौरान, अमूमन मीडिया से कन्नी काटने वाली और काफी समय से जमीनी स्तर पर जुटी मायावती ने खुलकर राष्ट्रीय मीडिया के सामने आते हुए अंतिम समय पर अपनी पिछड़ी जाति का मुद्दा उठाने के मोदी के हथकंडे की निंदा की। एक टेलीविजन चैनल पर मायावती ने सवाल उठाए कि 'आखिर अब तक अपनी जाति को लेकर मोदी खामोश क्यों थे, पिछड़ी जातियों के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता के मामले में भाजपा का इतिहास क्या है, और मंडल कमीशन को लागू करने वाले वी पी सिंह के विरोध में खड़ी होने वाली भाजपा, अब इस पर क्या तर्क देगी?'

पूर्वी उत्तर प्रदेश की बकाया 33 महत्वपूर्ण सीटों पर बसपा काफी मजबूत है। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को इनमें से महज तीन सीटें मिली थीं। ऐसे में मायावती के गुस्से की वजह सहज ही समझी जा सकती है। अगर भाजपा 245-250 सीटों तक पहुंचना चाहती है, तो उसके लिए उसे यहां से 20-25 सीटें जीतनी ही होंगी। मगर पूर्वी उत्तर प्रदेश में दलित और मुस्लिमों का ताकतवर गठजोड़ है, जो मायावती के पक्ष में जाता है, और इससे भाजपा भी वाकिफ है। दूसरी ओर, यहां के कुछ हिस्सों में समाजवादी पार्टी भी खासी मजबूत है।

दरअसल भाजपा 250 लोकसभा सीटें पाने के लिए बेचैन है। ऐसा होने पर भाजपा अपने स्थायी सहयोगियों शिवसेना और अकाली दल की मदद से ही सरकार बना लेगी। दूसरी ओर अगर मोदी बहुमत से 70-80 सीटें कम रह जाते हैं, तब तो उनके लिए परेशानी है। और यह परेशानी राहुल गांधी ने अमर उजाला को दिए एक साक्षात्कार में बयां की। राहुल ने कहा कि भाजपा के वर्तमान सहयोगियों में से दो-तिहाई ऐसे हैं, जिनके पास संसद में एक सीट भी नहीं है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस, बीजू (जनता दल) और जनता दल (यूनाइटेड) जैसे कुछ बड़े पूर्व सहयोगी दल आज मोदी के सबसे बड़े आलोचक हैं। ऐसे में अगर भाजपा 200 सीटों के इर्द-गिर्द सिमट जाती है, तो मोदी की हालत बेहद नाजुक हो जाएगी। और यही वजह है कि चुनाव के अंतिम चरण में वह हिंदुत्व और पिछड़ी जाति का कार्ड खेलने से भी नहीं चूके।

दरअसल भाजपा की रणनीति है कि बिहार में 2009 की 12 की तुलना में अपनी सीटें दोगुनी से भी ज्यादा की जाएं। हालांकि वहां लालू के एकाएक उभार ने उसकी उम्मीदों को झटका दिया है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में पिछली बार मिली दस सीटों को बढ़ाकर अपना आंकड़ा 40-50 सीट करने की भी भाजपा की योजना है। मगर पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों की यात्रा करने पर मैंने पाया कि मीडिया ने बेशक मोदी की हवा बनाई है, जमीनी हकीकत कुछ और है। यहां के लोग बसपा, भाजपा और सपा के बीच त्रिकोणीय लड़ाई की बात कह रहे हैं। भदोई निर्वाचन क्षेत्र के एक शिक्षक दयाशंकर मिश्रा कहते हैं, 'केबल टीवी पर बार-बार मोदी के ही भाषण दिखाए जाते हैं। तो सबकी जुबान पर उनका नाम आना स्वाभाविक है। मगर बसपा और सपा के ताकतवर प्रत्याशियों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता।'

दरअसल पूरे ग्रामीण भारत में पहली बार नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी शैली का टेलीविजन अभियान छेड़ा हुआ है। मगर जमीनी हकीकत इससे अलग हो सकती है। और इस आशंका ने ही भाजपा की नींदें उड़ाई हुई हैं।
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