फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   why should be farooq sheikh go away?

फारूक शेख को क्यों जाना चाहिए था?

Sat, 04 Jan 2014 08:49 PM IST
कुमार प्रशांत
कुमार प्रशांत Updated Sat, 04 Jan 2014 08:49 PM IST
विज्ञापन
why should be farooq sheikh go away?

कोई कारण नहीं था कि फारूक शेख भी जाते! न तो किसी ने बुलाया था और न किसी ने कहा था। पिछली बार जब बात हुई थी तब मैंने ही कहा था, 'मुझे अच्छा लगता है कि आप मुंबइया फिल्मी दुनिया की तंगराहों के दवाब से मुक्त होकर अपनी तरह से, अपनी पसंद का काम कर पा रहे हैं!'

विज्ञापन


थोड़ी अचकचाहट के साथ फोन पर वे बोले, 'हां, यह तो है कि बहुत सारी तंगदिली से मैं बच जाता हूं लेकिन कुमार साहब, अपनी पसंद का काम न यहां कर पा रहा हूं और न वहां कर पाता था ! खैर छोड़िए... अपनी बताइए ...'मैं फोन का एसएमएस बार-बार खोल कर देख रहा हूं - सोमवार 23 दिसंबर 2013 की तारीख है उस पर और 5.57 शाम का समय दर्ज है और लिखा है अंग्रेजी में- आदाब! मेरी कामना है कि क्रिसमस का यह पर्व और आता नया साल खुशियों से भरा-पूरा हो। हमेशा के लिए खुशहाली हो- फारूक शेख
विज्ञापन


मेरे फोन का संदेश-स्थान प्राय: हर पर्व-त्योहार पर आई उनकी ऐसी शुभकामनाओं से भरा है। वे कभी चूकते नहीं थे। फारूक शेख से मेरी दोस्ती नहीं थी, लेकिन एक अजीब-सा रिश्ता था। मुंबई के वे बहुत अंधेरे दिन थे। बाबरी मस्जिद टूट चुकी थी और मुंबई आग में जी और जल रही थी... मन में सहेजी मुंबई की कितनी ही तस्वीरें उन दिनों रोज-रोज टूट रही थीं और मैं देख रहा था कि हर तस्वीर के साथ लोग भी टूट रहे थे... मुंबई में महात्मा गांधी का कभी निवास रहा था मणि भवन।
विज्ञापन
विज्ञापन


वहीं देर रात में हम कुछ लोग जमा थे और खुद से ही पूछ रहे थे कि अब किया क्या जाए... और तब किसी ने कहा कि हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि हम हार चुके हैं और तब मैंने आवाज लगाई थी। हम अभी हारे नहीं हैं! ... हम हारे तो जीतने के लिए बचेगा कौन !! और तब मैंने पहली बार फारूक शेख को पर्दे के बाहर देखा था। वे भी मुझे पहली बार ही देख रहे थे। हम दोनों उस छोटी-सी बैठक के दो सिरों पर बैठे थे। मैंने कहा, 'हमें कल धारावी में उतरना चाहिए। वहां आग लगी भी है और लगातार लगाई भी जा रही है। अब आग में उतर कर ही आग बुझाई जा सकती है! देर रात हो चुकी थी जब अगले दिन मैंने धारावी से निकलने की बात सोची, तभी किसी ने कहा, फारूक शेख साहब ने कहा है कि वे भी साथ ही निकलेंगे!

'वे हैं कहां?', मैंने हैरानी से पूछा तो बताया कि अगली गली के भीतर के किसी मुहल्ले में वे भी लोगों के बीच हैं। मैं थोड़ा हैरान भी हुआ और थोड़ा परेशान भी। वहां पहुंचा तो देखा वे उस अंधेरे से झोंपड़े में कई लोगों के साथ घिरे थे - सभी मुसलमान थे! वे शांत लेकिन पक्की आवाज में कुछ तीखी बातें कह रहे थे और यह मानने को तैयार नहीं हो रहे थे कि मुसलमान खुद को जितना निरीह व निर्दोष बता रहे हैं वे वैसे ही हैं...मैं चुप खड़ा रहा ताकि बातें भी न टूटें और उनका प्रभाव भी!


उस अंधेरे वक्त में वे जिस तरह रोशन हुए, वह छाप कभी मेरे मन से मिटी नहीं! फिल्में बहुत सारी तो नहीं कीं उन्होंने, लेकिन जब भी कीं, वे अपनी अलग पहचान बना सके। 'तुम्हारी अमृता' नाम का एक दो-पात्री नाटक फारूक शेख की अपनी अलग विशेषता बताता है। 'जीना इसी का नाम है' टीवी कार्यक्रम किसी अर्थ में खास था तो इसी अर्थ में कि उसे फारूक शेख पेश करते थे।

यह सब याद आ रहा है, लेकिन यह भरोसा नहीं हो रहा है कि अब फारूक शेख नहीं हैं; अौर जो हैं वे बस यादें ही हैं!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed