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निजी मुनाफे का साधन क्यों बने रेल

Sun, 07 Jun 2015 06:01 PM IST
अफलातून
अफलातून Updated Sun, 07 Jun 2015 06:01 PM IST
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Why rail become an instrument of private profit

रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने अपने तमाम मातहतों को 26 मई से एक पखवाड़े के लिए जन-संपर्क अभियान चलाने का निर्देश दिया है। इस मुहिम में रेलवे साधारण यात्रियों के सुझाव लेगा या नहीं, यह तो भविष्य में ही पता चलेगा। जबकि कभी ट्रेन में थ्री-टियर शयनयान की व्यवस्था सर्वोदयी नेता और अखिल भारत गो-सेवा संघ के राधाकृष्ण बजाज के सुझाव पर ही शुरू हुई थी। पर पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी के जमाने में ऐसे सुझावों पर कौन अमल करेगा?

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सारस्वत बैंक में कार्यरत कोंकण निवासी सुरेश प्रभु को  बाल ठाकरे ने खोजा था। द्वितीय श्रेणी के यात्रियों को प्रथम श्रेणी की सुविधाएं देने (लकड़ी की पटिया पर गद्दी तथा एक पश्चिमी संडास) के लिए याद किए जाने वाले रेल मंत्री मधु दंडवते को चुनाव में हराने का श्रेय भी इन्हें मिला था। रेल मंत्री प्रभु अपने क्षेत्र की कोंकण रेल से दो सबक लेकर पूरी भारतीय रेल में लागू कर देते, तो कुछ अच्छे दिन महसूस हो जाते। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित ‘जनरल पैकेट रेडियो सर्विस’ (जीपीआरएस) आधारित 'अक्षय-कवच' कोंकण रेल में लागू है। कोहरे वाले दिनों में गाड़ियों के विलंब और दुर्घटना से बचने की इस व्यवस्था को अगर वह देश भर में लागू कर दें, तो यह रेल सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा कदम होगा।

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‘पीने का पानी विश्व स्तरीय जांच से गुजरा है। आपको पीने का पानी खरीदने की आवश्यकता नहीं है।' कोंकण रेल जब शुरू हुई थी, तब स्टेशनों पर पीने के पानी के नलों के साथ यह सूचना लगी रहती थी। यात्री तसल्ली के साथ पानी पीते थे, बिना खरीदे। यह व्यवस्था पूरी भारतीय रेल में क्यों नहीं लागू हो सकती? ई. श्रीधरन कोंकण रेल के प्रथम निदेशक थे। भरोसेमंद पीने का पानी मुहैया कराने के साथ पानी खरीदने को अनावश्यक बना देने की सोच भी उनकी रही हो, तो आश्चर्य नहीं। 2013 में भारत में बोतलबंद पानी का बाजार 60 अरब रुपये का था। सालाना 22 फीसदी की वृद्धि दर से 2018 में इसके 160 अरब रुपये का हो जाने का अनुमान लगाया गया है। पानी की अनिवार्यता और रेलवे स्टेशनों पर मुफ्त साफ पानी की दुर्लभता के कारण गरीब यात्रियों को भी 15 रुपये लीटर की बोतल खरीदनी पड़ती है।
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जिन गाड़ियों में रसोई यान हैं, उनमें रेल मंत्रालय द्वारा निर्धारित दर का भोजन प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। लोगों ने शायद ही चलती गाड़ी में पैंतालीस और स्टेशन पर पैंतीस रुपये में इस स्टैंडर्ड वेज  थाली का आदेश लेते देखा है-पुलाव, जीरा चावल या सादा चावल-150 ग्राम, पराठा (दो) या रोटी (4) या पूड़ी (5)-100 ग्राम,  दाल या सांभर-150 ग्राम, दही-100 ग्राम या मिठाई, मौसमी सब्जी-100 ग्राम, अचार, पैकेज्ड पानी 250 मिलीलीटर। मेरे जैसे ग्राहक जब मैनेजर को बुलाने के लिए कहते हैं, तब जाकर यह मिल पाता है। जबकि यात्रियों को पनीर के चार छोटे टुकड़े और कथित दाल फ्राई के नाम पर पैंट्री वाले अस्सी रुपये की थाली देते हैं।


सफाई सेवा के निजीकरण के दौर में यार्ड में सफाई का काम भी शायद साफ हो गया है। यात्रियों में भारतीय रेल के प्रति श्रद्धा का भाव रहा है। सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के रूप में सेवा करते रहने के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि रेलवे निजी मुनाफे का साधन बनकर न रह जाए।

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