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सार्वजनिक बैंक क्यों हैं बदहाल
एम के वेणु
Updated Fri, 29 Jan 2016 06:29 PM IST
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बैंक किसी अर्थव्यवस्था के लिए उसी तरह जरूरी है, जैसे जीवन के लिए रक्त। कोई भी अर्थव्यवस्था बिना स्वस्थ बैंकिंग व्यवस्था के विकास नहीं कर सकती, जो सकल घरेलू उत्पाद की बढ़ोतरी के लिए कर्ज प्रदान करती है। इसके विपरीत, यह दुखद है कि भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की, जो कुल ऋण वितरण के 75 फीसदी के जिम्मेदार हैं, स्थिति बहुत खराब है। यहां तक कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी स्वीकार किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की सेहत राजग सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
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भारतीय बैंकों के साथ आखिर क्या गड़बड़ी है? शेयर बाजार द्वारा भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों का मौद्रिक आकलन निजी क्षेत्र के एकमात्र बैंक एचडीएफसी से भी कम है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसकी मुख्य वजह है कि शेयर बाजार के निवेशक मानते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के ऊपर ऋण वितरण का भारी दबाव है, जिससे इन बैंकों का पर्याप्त पूंजी आधार खत्म हो चुका है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि इन बैंकों ने बड़े व्यवसायी समूहों को कर्ज दिया, जिन्होंने राजनीतिक रूप से ताकतवर होने के कारण इनके बड़े कर्ज को नहीं चुकाया।
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रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने दावोस से एक बार फिर चेतावनी दी है कि बैंकिंग क्षेत्र के इन न चुकाए जाने वाले कर्जों के खिलाफ अगर तत्काल कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो यह नियंत्रण से बाहर जा सकता है। अगर बैंकिंग क्षेत्र के बुरे ऋण की समस्या बिगड़ती है, तो अर्थव्यवस्था के वर्ष 2016 में वैश्विक अपस्फीति के नए चक्र में फंसने का खतरा है। राजन ने दावोस में असाधारण स्पष्टता के साथ कहा कि मुट्ठी भर व्यवसायियों ने बैंकों से भारी कर्ज लिया है और कर्ज न चुका पाने के कारण उन्होंने शेष अर्थव्यवस्था के ऋण का गला घोंट दिया है।
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एक मोटे अनुमान के मुताबिक, शीर्ष दस व्यवसायी समूहों ने, जो जाने-माने नाम हैं और यूपीए तथा एनडीए, दोनों के शासन में फलते-फूलते रहे हैं, करीब 7.3 लाख करोड़ रुपये का ऋण लिया है और उसका ब्याज चुकाने के लिए जूझ रहे हैं। इनमें से ज्यादातर कंपनियों ने ऊर्जा, सड़क, दूरसंचार जैसे बुनियादी संरचनाओं के क्षेत्र या स्टील जैसी वस्तु में भारी निवेश किया है, जहां दुनिया भर में कीमतें गिर गई हैं।
राजन ने हाल ही में वित्तीय क्षेत्र, खासकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बारे में ताजा चेतावनी दी है, क्योंकि शेयर बाजार ने इनके भीतर की सड़ांध को पढ़ना शुरू कर दिया है, जबकि बैंक इसे छिपा रहे हैं। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयर मूल्य इतने गिर गए हैं कि उन्होंने उसे अपने बुक वैल्यू से भी कम उद्धृत करना शुरू कर दिया है। किसी भी कंपनी की बुक वैल्यू उसकी बैलेंस शीट में दर्शाई गई नेट वर्थ या शुद्ध संपत्ति (देनदारियों से अधिक रकम) होती है, जो शेयर पूंजी और वर्षों से संचित संपत्ति का योग होता है। स्पष्ट है कि बैलेंस शीट में नेट वर्थ को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है। ऐसा वर्ष 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट के बाद कुछ बड़े अमेरिकी बैंकों के साथ भी हुआ था। सबसे बुरी बात यह है कि भारत के 40 से ज्यादा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की बाजार पूंजी गिरकर 2.4 लाख करोड़ तक पहुंच गई है, जो निजी क्षेत्र के एकमात्र बैंक एचडीएफसी के बाजार मूल्य से भी कम है! करदाताओं के पैसे का इस स्तर पर विनाश किया गया है, जो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पूंजी आधार को निर्मित करता है। इसलिए शेयर बाजार ने स्पष्ट संकेत दिया है सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सड़ांध अब तक की जानकारी से कहीं ज्यादा है। इसी वजह से रघुराम राजन पिछले महीने बैंकों को बाध्य किया कि वे खराब ऋणों का पूरी तरह से खुलासा करने के लिए प्रावधान बनाएं, जिनके ब्याज पिछली दो तिमाही से चुकाए नहीं गए हैं।
हाल ही में प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसी क्रेडिट सुइस ने बुनियादी संरचनाओं और कमोडिटी क्षेत्र की दस सर्वाधिक कर्ज में फंसे समूह (इनमें एस्सार, रिलायंस, एडीएजी, जीएमआर, जीवीके, अडानी, लैंको, विडियोकॉन, वेदांता और जेपी शामिल हैं) का आंकड़ा जारी किया है, जो चीन से उत्पन्न अपस्फीति से जूझ रहे हैं। क्रेडिट सुइस के आकलन के मुताबिक, करीब 7.3 लाख करोड़ के सकल कर्ज में करीब तीन लाख करोड़ का कर्ज लगभग दिवालिया होने की स्थिति में है। लेकिन बैंकों ने कहीं भी इसका उल्लेख गैर निष्पादित संपत्ति (एनपीए) के रूप में नहीं किया है। इन्हीं कर्जों के बारे में राजन ने बैंकों से उसका खुलासा करने के लिए कहा है।
राजनीतिक रूप से राजन ने एक संवेदनशील नब्ज को छुआ है और अगले कुछ महीनों में प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री की इस कसौटी पर परीक्षा होगी। प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री बड़े कॉरपोरेट समूह द्वारा लिए गए इस भारी बुरे ऋण की स्थिति से कैसे निपटते हैं, इस पर विपक्ष की भी नजर है। दरअसल यह राजग के आर्थिक प्रबंधकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। बैंकिंग क्षेत्र के इस गहराते संकट का खुलासा कोटक महिंद्रा बैंक के चेयरमैन उदय कोटक ने किया, जिन्होंने पिछले दिनों दावोस में कहा कि बैंक इस उम्मीद में बैठे नहीं रह सकते कि वैश्विक कमोडिटी मूल्य चढ़ेगा। उदय कोटक ने राजन की इस बात का समर्थन किया कि बैंकों को 31 मार्च तक अपनी बैलेंस शीट में खराब ऋणों की भयावहता का खुलासा करना चाहिए।
कोटक ने तर्क दिया कि प्रमुख भारतीय व्यवसायियों में आज यह आत्मविश्वास नहीं है कि वे आगे अर्थव्यवस्था की गिरावट से निपट सकते हैं। जबकि 2008 में जब दुनिया मंदी से जूझ रही थी, इनमें भारी आत्मविश्वास था। उससे पहले बड़े कॉरपोरेट समूह और बैंकों की बैलेंस शीट अच्छी थी। हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने प्रति-तर्क दिया है कि 2008 के मुकाबले आज अर्थव्यवस्था ज्यादा लचीली है। लेकिन वह जानते होंगे कि दावोस में संभवतः बहुत से लोग उनसे सहमत नहीं होंगे।