मीडिया से दूरी क्यों बरतते हैं प्रधानमंत्री
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अगर मीडिया दुश्मन न होता, तो क्या नरेंद्र मोदी सरकार की आधी समस्याएं समाप्त हो जातीं? इस मुद्दे पर लंबे समय तक ध्यान देने के बाद मैं बहुत विनम्रता से यह कहना चाहती हूं कि ऐसा मुझे लगने लगा है। पहले मुझे संदेह था, लेकिन पिछले सप्ताह मेरा यह संदेह विश्वास में तब बदल गया, जब स्मृति ईरानी के लोकसभा वाले भाषण को अगले दिन के अखबारों ने तकरीबन अनदेखा कर दिया। मैं जो अखबार पढ़ती हूं, उनमें इस महत्वपूर्ण भाषण को ऐसे पेश किया गया, जैसे इसकी सिर्फ इतनी ही अहमियत थी, जितनी अन्य सांसदों के तकरीरों की। बल्कि कुछ अखबारों ने तो ज्यादा महत्व दिया तृणमूल कांग्रेस के सुगत बोस के भाषण को, जो मेरी राय में बिल्कुल वैसा ही था, जैसा प्रोफेसर कॉलेज में छात्रों के बीच दिया करते हैं। राजनीति में आने से पहले सुगत बोस प्रोफेसर थे।
मानव संसाधन विकास मंत्री का भाषण कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था, क्योंकि उन्होंने उन तमाम आरोपों के जवाब दिए, जो रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद मीडिया ने उन पर लगाए थे। कुछ अखबारों ने तो यहां तक कहा था कि अगर स्मृति ईरानी ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के कामकाज में हस्तक्षेप न किया होता, तो शायद रोहित वेमुला अपनी जान देने को मजबूर न होते। लेकिन स्मृति ईरानी ने इन शब्दों के साथ अपना भाषण शुरू ही किया कि उनका हस्तक्षेप तभी होता है, जब हस्तक्षेप करने के लिए उनके पास कोई दरख्वास्त आती है। फिर उन्होंने एक लंबी फेहरिस्त पेश की, और जिनसे यह साबित किया कि हस्तक्षेप करने के लिए उनके पास कांग्रेसी सांसदों के भी पत्र आते हैं। उसके बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय की जिस अनुशासन समिति ने रोहित वेमुला को बर्खास्त करने का निर्णय लिया था, उसके सारे सदस्य कांग्रेस सरकार ने नियुक्त किए थे। कुछ दिनों में जेएनयू के छात्रों पर सरकार के अत्याचार का मुद्दा भी वैसे ही हवा में गुम हो जाएगा, जैसे असहिष्णुता का मुद्दा गायब हो गया है। मोहम्मद इकलाख की हत्या के बाद महीनों तक मेरे पत्रकार दोस्तों ने इस मुद्दे को इतना उछाला कि भारत दुनिया भर में बदनाम हुआ। ऐसा लगने लगा, जैसे लोकतंत्र की जगह तानाशाही कायम हो गई है। इसका असर निवेशकों पर पड़ा और विदेशी पर्यटक भी कम आने लगे। मुझे याद है, उस दौरान जब न्यूयॉर्क जाना हुआ, तो मेरे दोस्तों ने मुझसे पूछा कि जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में आएं या नहीं। ये ऐसे लोग थे, जो कई बार भारत आ चुके थे। लेकिन उनको भी ऐसा लगने लगा था, जैसे मोदी सरकार के आने से लोकतंत्र को कुचल दिया गया हो।
अगर रोहित वेमुला ने आत्महत्या न की होती, जेएनयू के छात्रों ने भारत की बर्बादी के नारे न लगाए होते, तो असहिष्णुता को लेकर ऐसा प्रचार शायद आज भी हो रहा होता। मेरे कहने का मतलब यह कि मोदी के साथ मीडिया का रिश्ता अब भी वही है, जो गुजरात दंगे के बाद था। उधर मोदी ने जब देखा कि मीडिया उनके साथ न्याय करने की कोशिश करने को भी तैयार नहीं है, तो उन्होंने तय किया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मीडिया को दूर ही रखना है। उनका वह निर्णय गलत था, क्योंकि लोकतांत्रिक देश में मीडिया से दूर रहना खतरे से खाली नहीं है। सो प्रधानमंत्री जी, समय आ गया है कि पीएमओ में आप एक मीडिया टीम गठित करें, जो सवालों के जवाब दे सकें। वर्ना पत्रकार बंधु बदनाम करने के लिए मुद्दा ढूंढते रहेंगे।