फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Why Patel demand reservation

आरक्षण विरोधी पटेल क्यों मांगने लगे हक!

Sun, 13 Sep 2015 04:42 PM IST
हरि देसाई
हरि देसाई Updated Sun, 13 Sep 2015 04:42 PM IST
विज्ञापन
Why Patel demand reservation

आम तौर पर गुजरात में समृद्ध एवं सवर्ण मानी जाने वाली पटेल जाति को एकाएक क्या हुआ कि वह अपने आपको पिछड़ों में शामिल कराने के लिए आंदोलन को विवश हुई और वह भी जब पटेल समाज की मुख्यमंत्री आनंदी बहन की कैबिनेट में अन्य छह पटेल मंत्री हैं और राज्य के कुल 182 विधायकों में से 44 पटेल विधायक हैं? आक्रोश काफी समय से पनप रहा था। किंतु आरक्षण के मसले ने उसे ज्वालामुखी बनकर बाहर आने को विवश किया। गुजरात की छह करोड़ 24 लाख की जनसंख्या में से पटेलों की तादाद डेढ़ करोड़ के करीब है और सामाजिक, शैक्षणिक एवं व्यापार-उद्योग के क्षेत्र में भी उनका बोलबाला है। उत्तर गुजरात के मेहसाना जिले में कडवा पटेलों की जनसंख्या अधिक है, लेकिन वहीं की आनंदी बहन पटेल लेउवा पटेल हैं। यहां से ही कडवा पटेल समाज के उनके साथी मंत्री एवं प्रतिद्वंद्वी नितिन पटेल भी आते हैं। मेहसाना एवं उत्तर गुजरात के अन्य जिलों में प्रभाव रखने वाले आंजना पटेलों को हालांकि मंडल आयोग ने सामजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ी जातियों (ओबीसी) में शामिल किया है।

विज्ञापन


वर्तमान सरकार ने लगभग दो दशक के बाद सरकारी नौकरियों में भर्ती अभियान आरंभ किया, किंतु उसमें उनकी सहभागिता बहुत कम नजर आई, क्योंकि आरक्षण प्रणाली की वजह से अधिकांश पद अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) एवं अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) की झोली में जाने से पटेल जाति के लायक उम्मीदवारों को ज्यादा हिस्सा नहीं मिला। जैसा कि पटेल आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक ने बार-बार दोहराया कि गुजरात में सरकारी नौकरियों के लिए 25 लाख रुपये देने के लिए तैयार पटेलों को जब नौकरी न मिले तो उनका हताश होना स्वाभाविक है। वैसे भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में गुजरात के पाटीदार उत्तर भारत के कुर्मी क्षत्रिय से अपना नाता जोड़ते हैं। दक्षिण में महाराष्ट्र के मराठा समाज एवं आंध्र के रेड्डी से संबंध रखते हैं। हार्दिक पटेल ने अपने आपको किसी भी राजनीतिक दल से अलग रखा है, फिर भी बिहार के नीतीश कुमार से अपनत्व जताया। कुर्मी समाज के कुमार ने भी पाटीदार आरक्षण को न्यायोचित ठहराते हुए अपना समर्थन घोषित किया है। अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा के दो आदर्श पुरुषों में सरदार पटेल एवं छत्रपति शिवाजी हैं।
विज्ञापन


पटेल समाज के कुछेक लोग समृद्ध जरूर हैं, शिक्षित भी हैं, किंतु अधिकांश किसान एवं छोटे-मोटे व्यवसायों से संबंधित हैं। सभी पटेल न तो समृद्ध हैं और न ही जमींदार। शिक्षा के लिए अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में दाखिला दिलवाने में भी आर्थिक संकट का अनुभव कर रहे हैं। वैसे तो 1981 और 1985 के आरक्षण विरोधी आंदोलन में अधिकांश योगदान पटेलों का ही रहा। फिर भी यदि आप लड़ नहीं सकते, तो साथ में हो जाओ, इस कहावत को सही साबित करने के लिए पटेलों ने आरक्षण का दामन थामने की ठानी। वैसे उनकी रैलियों और सभाओं में से अधिकांश स्वर तो आरक्षण प्रणाली को समाप्त करने या तो आर्थिक मानदंड के आधार पर आरक्षण के पक्ष में निकलते रहे। फिर भी ओबीसी आरक्षण के कोटे से शिक्षा प्रवेश एवं सरकारी नौकरियों में दाखिला संभव होता है, तो उसे भी वे आजमाना चाहते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


पटेल समाज में भी संपन्न और वंचित तबके के बीच की खाई बढ़ती गई है। सत्ता पक्ष भाजपा के साथ जुड़े हुए इस समाज के विधायक गत जुलाई से अब तक की आरक्षण रैलियों और सभा-कार्यक्रमों को खुलकर सहयोग देने से कतराते रहे। यही वजह है कि अधिकांश भाजपाई विधायक एवं सांसद, यहां तक कि राज्य एवं केंद्र के गृह राज्य मंत्री के निवास स्थानों पर भी हमले हुए।


नरेंद्र मोदी एवं आनंदी बहन पटेल के कार्यकाल में नए उद्योग लगाने एवं रोजगार देने की घोषणाएं तो बहुत हुई, किंतु आए दिन वाइब्रेंट समिट के आयोजनों के बावजूद नए उद्योग लगाने और रोजगार के नए अवसर पैदा होने की आशा-अपेक्षाएं परिपूर्ण नहीं हुई। इसके विपरीत कई उद्योग बंद हो जाने से और विशेष रूप से हीरा उद्योग में मंदी के माहौल से पटेल कारीगरों में बेरोजगारी बढ़ती गई। महंगाई एवं जीवन निर्वाह का खर्च बढ़ता गया। कोरे वायदे पेट की आग बुझाने के लिए काफी नहीं होते हैं। आने वाले दिनों में अब होगा क्या? पटेल समाज में फूट डालने के सभी प्रयास विफल होते हुए नजर आने से भाजपा के कुछेक विधायकों ने खुलकर राज्य सरकार और आलाकमान के खिलाफ बोलना शुरू किया है। अपने समाज के बलबूते पर चुने गए इन विधायकों को समाज के साथ रहने में ही अपनी भलाई नजर आती है। हो सकता है, विगत आंदोलनों की भांति आरक्षण आंदोलन के आक्रोश को शांत करने के लिए राज्य में नेतृत्व परिवर्तन का निर्णय भाजपा आलाकमान को लेना पड़े।

निदेशक एवं प्राध्यापक, सरदार पटेल शोध संस्थान (सेरलिप), वल्लभ विद्यानगर

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed