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सबक क्यों नहीं लेती कांग्रेस
नई दिल्ली
Updated Mon, 19 May 2014 09:05 PM IST
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लोकसभा चुनाव में अपने शर्मनाक प्रदर्शन के बावजूद कांग्रेस कोई सबक लेती नहीं दिख रही है। पहली बार लोकसभा में दो अंकों में सिमट जाने वाली देश की सबसे पुरानी पार्टी लगता है कि किसी तरह के आमूलचूल परिवर्तन के लिए तैयार ही नहीं है। हार की समीक्षा के लिए हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक दरअसल सोनिया और राहुल गांधी के नेतृत्व में भरोसा जताए जाने की औपचारिकता के अलावा कुछ नहीं थी।
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नतीजे आने के बाद से ही पार्टी के भीतर जिस तरह से सोनिया और राहुल को बचाने के लिए कवायद शुरू हो गई थी, उसके बाद यह तय ही था कि पार्टी सामूहिक जिम्मेदारी के नाम पर कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के इस्तीफे खारिज कर देगी! पार्टी की मुश्किल यह है कि वह नेहरू-गांधी परिवार से इतर कुछ सोच भी नहीं सकती। इसके बावजूद यह स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह की राजनीतिक रूप से उदासीन भूमिका भी कांग्रेस की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है।
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वास्तव में चाटुकारिता और वफादारी से घिरा पार्टी नेतृत्व नए दौर में कांग्रेस को प्रासंगिक बनाए रखने में नाकाम साबित होता दिख रहा है। यदि उसके मतों का प्रतिशत गिरकर 19.3 फीसदी रह गया है, तो इसका यह मतलब भी है कि युवा मतदाताओं ने उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं किया है। इसके अलावा दलितों, मुस्लिमों और आदिवासियों और निचले तबके का उसका पारंपरिक वोट बैंक भी खिसका है। हैरानी की बात है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस करारी पराजय के बाद ऐसा कोई ठोस संदेश नहीं दे सका है, जिससे पार्टी के लाखों हताश कार्यकर्ताओं में किसी तरह का भरोसा जगे। पार्टी की ऐसी दुर्गति तो 1977 में भी नहीं हुई थी, जब आपातकाल के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी के खिलाफ भारी नाराजगी देखी जा रही थी।
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कभी पूरे देश में राज करने वाली पार्टी को इस चुनाव में किसी भी प्रदेश में दो अंकों में सीटें नहीं मिली हैं, जिससे उसके खिसकते जनाधार का पता चलता है। राहुल गांधी ने चुनाव अभियान के दौरान कहा था कि यदि भारत एक कंप्यूटर है, तो कांग्रेस इसका डिफॉल्ट प्रोग्राम है। लोकसभा चुनाव के नतीजों का यह सबक है कि कांग्रेस यदि खुद को अब भी अपडेट नहीं करती, तो उसे और भी बुरे दिन देखने को मिल सकते हैं।