तमिलनाडु से क्यों नहीं सीखते

रीतिका खेड़ा Updated Sun, 18 Mar 2018 07:33 PM IST
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सर्वोच्च न्यायालय के हाल ही के अंतरिम आदेश ने बैंक और मोबाइल को आधार से मुक्ति प्रदान की है। दुखद है कि देश की गरीब जनता को उस आदेश ने आधार से मुक्ति नहीं दी : आधार को जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) से हटाने का आदेश नहीं दिया गया। खाद्य सुरक्षा कानून वर्ष 2013 में पारित हुआ और उसमें एक बड़ी (लेकिन अधूरी) जीत यह थी कि देश की दो-तिहाई जनता को जन वितरण प्रणाली में शामिल करने का निर्णय लिया गया। ऐसा करने से उन तमाम परिवारों को राहत मिली, जो सस्ते अनाज के हक से वंचित थे। वर्ष 2016 में हमने बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल-इन छह राज्यों में एक सर्वे किया। सर्वे के परिणामों के अनुसार, इन राज्यों में खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया गया। नए कार्ड बंट चुके थे और लाभार्थी परिवारों को सस्ते दाम पर गेहूं-चावल मिलना शुरू हो चुका था। अनाज की चोरी के मामले में छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में तो पहले से ही सुधार आ चुका था, लेकिन 2016 के सर्वे के अनुसार, बाकी चार राज्यों में भी काफी सुधार दिखा।
उस सर्वेक्षण के तुरंत बाद जन वितरण प्रणाली को आधार से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की गई। 2017 तक झारखंड में आधार को सस्ते राशन में पूरी तरह से लागू कर दिया गया। जून, 2017 में हमने 900 परिवारों का सर्वे किया : हमने पाया कि राशन कार्ड में नाम जुड़वाने के लिए और हर महीने राशन खरीदते समय आधार के बिना काम नहीं चलता। यदि झारखंड में प्रशासनिक व्यवस्था ठीक होती, तो अलग बात थी, लेकिन नाम जुड़वाने जैसे मूल काम के लिए भी लोग कम हैं।

हर महीने चावल लेते समय पांच काम करना जरूरी हो गया है-बिजली, पॉइंट ऑफ सेल मशीन, इंटरनेट, सरकारी सर्वर और उंगली के निशान का सत्यापन। इनमें से एक भी फेल हो जाए, तो आप राशन नहीं ले सकते। ऐसे में ताज्जुब की बात नहीं कि सर्वे के जिन गांवों में आधार अनिवार्य है, वहां अनाज न खरीद पानेवाले परिवारों की संख्या उन गांवों से पांच गुना ज्यादा है, जहां आधार लागू नहीं। अलबत्ता जहां आधार जरूरी है, और जहां जरूरी नहीं है-इन दोनों तरह के गांवों में अनाज की चोरी एक जैसी है-औसतन, परिवारों को अपने हिस्से का 93 प्रतिशत अनाज मिल रहा था। उंगलियों से सत्यापित करने से अनाज चोरी में कोई फर्क नहीं आया, लेकिन लोगों की मुसीबतें बढ़ गई हैं। कभी टावर नहीं, तो कभी उंगलियों के निशान फेल हो जाते हैं। आधार से लोगों का फायदा कम, नुकसान ज्यादा हुआ है।

2016 के सर्वे में उत्तर प्रदेश को इसलिए शामिल नहीं किया गया, क्योंकि यहां खाद्य सुरक्षा कानून पूरी तरह से लागू नहीं हुआ। यहां पीडीएस की स्थिति समझने के लिए आगरा जिले के अकोला ब्लॉक के कुछ गांवों में हमने पूरा एक दिन बिताया। जाते ही यह सुनकर राहत मिली कि आधार से सत्यापित करने की प्रक्रिया अभी केवल शहरी इलाकों में है, गांवों में नहीं।

पीडीएस को सुधारने के लिए परिवारों का चयन सही रूप से होना पहला कदम है। उत्तर प्रदेश में यह हुआ है कि नहीं, कहना मुश्किल है, पर कई ऐसे दलित परिवार मिले, जिनके पास राशन कार्ड नहीं था। अनाज चोरी रोकने के लिए लोगों के पास अपना राशन कार्ड होना जरूरी है। अकोला के उन गांवों में लोग शिकायत कर रहे थे कि नए कार्ड नहीं आए, ‘ऑनलाइन नहीं हुआ।’ अकोला में ऐसा लगा कि उत्तर प्रदेश पहले कदम पर ही चूक रहा है।

आगरा के दौरे के ठीक एक सप्ताह बात मुझे तमिलनाडु के त्रिची और तंजावुर के कुछ गांवों में राशन की दुकान देखने का मौका मिला। मेरी रुचि यह देखने में ज्यादा थी कि राशन में आधार के उपयोग का वहां क्या असर हुआ है।

तमिलनाडु में लोगों को एक क्यूआर कोड वाला स्मार्ट कार्ड दिया गया है, जो बिना बायोमीट्रिक के और बिना इंटरनेट के इस्तेमाल किया जा सकता है। यह जरूर है कि आवेदन के समय आधार (लगभग) अनिवार्य है। वहां हालांकि मुझे ऐसे लोग नहीं मिले, जो आधार की वजह से सस्ते राशन से वंचित हुए हों। बेशक इधर-उधर से कुछ खबरें मिलीं कि कोई छूट गया। वहां राशन में आधार से किसी को शिकायत नहीं थी। हर व्यक्ति अपने राशन की खरीद की पर्ची स्मार्ट कार्ड द्वारा एक मिनट से कम में कर रहा है। जब इंटरनेट नहीं चलता, तब काम ऑफलाइन जारी रहता है। जैसे ही इंटरनेट चल पड़ता है, ऑफलाइन रिकॉर्ड ऑनलाइन कर दिए जाते हैं। और सबसे अच्छी बात यह कि हर एक व्यक्ति की खरीद के रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध हैं।

इस सबसे सुशासन और तकनीक के बारे में चार अहम सबक सीखे जा सकते हैं : पहली बात, तकनीक का सही उपयोग किया जाए, तो यह लोगों के लिए फायदेमंद हो सकती है, जैसे-तमिलनाडु के स्मार्ट कार्ड, जहां न इंटरनेट का झमेला है, न ही उंगलियों के निशानों का झंझट है। दूसरा, बिना सोचे-समझे तकनीक का इस्तेमाल नुकसान कर सकता है। झारखंड में आधार का उपयोग इस बात की सीख देता है। वहां आधार सुधरती हुई जन वितरण प्रणाली को बैठा देने का काम कर रहा है। सेवा करने के बजाय वहां आधार-रूपी तकनीक ने लोगों को अपना मोहताज बना लिया है। तीसरा, जहां राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक क्षमता ही नहीं, वहां तकनीक का उपयोग बेमतलब होगा। चौथा, आधार के मामले में केंद्र यह भूल गया लगता है कि मालिक कौन है और सेवक कौन। राज्यों को यह संकेत मिल रहा है कि जन वितरण प्रणाली में आधार का लागू होना सबसे पहला उद्देश्य है, चाहे उससे पीडीएस का नुकसान ही क्यों न हो।

तकनीक तब तक सही है, जब तक वह सेवक और हम उसके मालिक बने रहें। आधार से यह खतरा है कि लोगों को उसकी जरूरतों की हिसाब से चलना पड़ रहा है, जिससे लोगों का नुकसान भी हो रहा है। बैंक खाते और मोबाइल के मामले में सर्वोच्च न्यायालय को यह बात समझ में आ गई, लेकिन आधार से त्रस्त पीडीएस लाभार्थियों की व्यथा समझी नहीं गई।

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