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सुरक्षा में बदलाव क्यों नहीं दिखता
तवलीन सिंह
Updated Sun, 23 Nov 2014 07:53 PM IST
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फिर वही भयानक सप्ताह आ गया है। मेरे लिए 26/11 को भुलाना इसलिए ज्यादा मुश्किल है, क्योंकि मैं मुंबई में रहती हूं, ओबेरॉय होटल के बिल्कुल बगल में। खिड़की से बाहर झांककर देखती हूं, तो ओबेरॉय होटल के वे कमरे साफ दिखते हैं, जिनमें से काला धुआं घंटों तक निकलता हुआ दिखा था 2008 में नवंबर के इसी हफ्ते। याद आता है मुझे, जैसे कल की घटना हो।
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26/11 की शाम में मेरी एक दोस्त मधु अपने पिता के साथ ताज के हार्बर बार में थी। उसने अपनी कहानी इन शब्दों में मुझे बताई-हम बैठे ही थे कि हंगामा-सा शुरू हुआ और गोलियों की आवाजें सुनाई पड़ीं। हमें होटल वालों ने कहा कि लॉबी में माफिया के कुछ लोगों के बीच शायद झगड़ा हो रहा है, सो हमें अंदरूनी रास्ते से ऊपर चैंबर्स क्लब में ले गए। वहां हमने सारी रात गुजारी डर-डरकर पूरे अंधेरे में। आतंकवादी दूर नहीं थे। उनके कदमों की आहट सारी रात हमारे कानों में आती रही।
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मेरी एक इतालवी दोस्त नादिया उस रात अपने पति के साथ ताज होटल के एक कमरे में ठहरी थी। जब उनके कमरे में बिजली अचानक चली गई और धुआं अंदर आने लगा, तो नादिया और उसके पति कमरे से बाहर आए और यह सोचकर जीने की तरफ भागने लगे कि होटल में शायद आग लग गई है। जब उन्होंने सीढ़ियों पर एक हथियारबंद आतंकवादी को ऊपर आते हुए देखा, तब ऊपर भागे, पर तब तक कमरे का दरवाजा लॉक हो चुका था। उन्होंने कई दरवाजे खटखटाए, पर उन्हें पनाह देने की हिम्मत किसी की नहीं हुई। अंत में एक जर्मन व्यक्ति ने दरवाजा खोला।
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बहुत डरावने थे वे दिन। लेकिन उनसे भी डरावनी चीज यह है कि दोबारा अगर पाकिस्तान ने ऐसा हमला किया, तो बिल्कुल वही होगा, जो उस समय हुआ था। इस नए किस्म के युद्ध के लिए जितनी कम तैयारी हमारी तब थी, वह आज भी है। गृह मंत्रालय की तरफ से आज तक हमने ऐसा कोई सुधार नहीं देखा, जिससे लगे कि राष्ट्र की सुरक्षा के ढांचे को मजबूत किया जा रहा है। अजमल कसाब और उसके साथी समंदर के रास्ते आए थे, और समंदर के रास्ते मैं भी अक्सर जाया करती हूं मुंबई से मंडवां गांव, जहां मेरे कुछ दोस्त रहते हैं। मंडवां समंदर के तट पर है, पर 26/11 के बाद सुरक्षा व्यवस्था नाम के वास्ते ही कड़ी की गई। वहां मेटल डिटेक्टर लगाया गया है, लेकिन वह चलता कम ही है। पास ही में पुलिस वाले बैठे रहते हैं। उनकी जब मर्जी होती है, तो किसी भी यात्री को रोककर उसका सामान खुलवा लेते हैं, तो मर्जी होने पर किसी को भी जाने की इजाजत दे देते हैं। समंदर के किनारे जितने भी गांव हैं, सब में सुरक्षा के प्रबंध ऐसे ही हैं।
मुझे निजी तौर पर उम्मीद थी कि मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद गृह मंत्रालय को यह आदेश मिलेगा कि 26/11 की पूरी तरह से तहकीकात कर सुरक्षात्मक ढांचे में परिवर्तन लाया जाए। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। राष्ट्र की सुरक्षा में परिवर्तन तब दिखेगा, जब सेना की मदद से ऐसी सैनिक टुकड़ियां स्थापित की जाएंगी, जिन्हें आतंकवादियों से मुकाबला करने का प्रशिक्षण दिया गया हो। सेना की मदद इसलिए लाजिमी है, क्योंकि जेहादी संस्थानों को पाक सेना ने कायम किया है। यह जानते हुए भी, कि 21वीं सदी में युद्ध इसी तरह का होगा, 26/11 के छह वर्ष बाद भी आखिर राष्ट्र सुरक्षा में परिवर्तन क्यों नहीं दिखता?