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एकात्म मानवतावाद की जरूरत क्यों
भूपेंद्र यादव
Updated Thu, 28 Sep 2017 10:32 AM IST
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भूपेंद्र यादव
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भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा हमेशा चर्चा का विषय रही है। पश्चिम में धर्म एवं नैतिकता अलग-अलग क्षेत्र हैं। आत्म विकास, आत्म शुद्वि, कर्मों का हिसाब प्रत्येक धर्म में है और हर धर्म का नैतिक पक्ष है। इसी नैतिक पक्ष के संरक्षण और महत्व को संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, दयानंद, श्री अरविंद, रवींद्रनाथ टैगोर, लोकमान्य तिलक ने अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में स्वीकार किया।
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मध्यकालीन संतों ने सामाजिक पुनर्जागरण का यह कार्य बिना शासन की अपेक्षा किए अपने सदाचार एवं त्याग और कपट से रहित जीवन से संभव किया। सांस्कृतिक आंदोलन का यह रूप कुंभनदास जी के इस कथन को भी प्रकट करता है, संतन को कहा सीकरी सों काम। परंतु वर्तमान में सांस्कृतिक क्षेत्र में कार्य करने वाले संगठन भी दबाव समूह बन गए हैं। पश्चिम में धर्मनिरपेक्षता का जो मूल्य शासन के लिए स्वीकार किया गया है, वहां धार्मिक संस्थाओं का स्वरूप भिन्न है। भारत में जाति, समाज, वर्ग, क्षेत्र के आधार पर धार्मिक अभ्यास प्रचलित है। हम बिना मूल आवश्यकताएं उपलब्ध कराए न तो समाजवाद ला सकते हैं, न ही आध्यात्मिक देश बना सकते हैं।
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साम्यवाद के समाजवादी स्वप्न ने अशिक्षित और मानवीय जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं से वंचित लोगों को साधन बनाकर उन्हें पशु बना दिया है। उनके जीवन में संघर्ष था, परंतु साम्यवाद एवं माओवाद ने उन्हें अनिवार्यतः हिंसक बना दिया। वहीं धर्म के पाखंड ने भी ईश्वर के नाम पर लोगों को विवेक शून्य कर दिया है। शिक्षा का प्रभाव शून्य हो गया है। भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण दोनों अतियों के विरुद्व था। भारत के राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र के लिए दीनदयाल उपाध्याय जी के एकात्म मानवतावाद में एक ऐसी दृष्टि है, जो मनुष्य एवं समाज के लिए सम्मानपूर्वक, प्रेमपूर्वक जीवन की उपलब्धि का मार्ग दिखलाती है। महात्मा गांधी, डॉ.अंबेडकर, लोकमान्य तिलक, सरदार पटेल ने कभी भी हिंसा समर्थित न्याय के शासन और धार्मिक आडंबरों और सिद्वांतों का समर्थन नहीं किया। परंतु शासन में इन मूल्यों का स्थान धर्मनिरपेक्षता की ऐसी अवधारणा ने लिया, जो समाज और उसके स्वरूप से ही तटस्थ थी। धर्म हमारी व्यक्तिगत चेतना, सामाजिक और राजनीतिक चेतना का मार्गदर्शक तभी बन सकता है, जब वह समानता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व के आधुनिक मूल्यों से समस्वर हो, एकात्म मानवतावाद का विचार यही है।
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राजनीतिक सक्रियता और क्षमता मात्र शासन करने में ही नहीं है। राजनीति को दिशा राजनीतिक साहस देता है, जो शासन प्राप्ति के प्रति जोखिम भी रखता है। संभव है कि आपको शासन प्राप्त करने में सफलता न मिले, परंतु वह राजनीति के स्वरूप को निर्धारित करने वाला एक आदर्श होता है। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन में इस राजनीतिक साहस का परिचय दिया था। दीनदयाल जी की पॉलिटिकल डायरी में भी इस प्रकार के राजनीतिक साहस के सूत्र हैं। अर्थशास्त्र का स्वरूप सिर्फ मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं से जुड़ा है और मनुष्य की भौतिकता के अलावा भी अन्य पक्ष हैं। सामाजिक व्यवस्था और राज्य व्यवस्था का संपूर्ण आधार अर्थव्यवस्था नहीं हो सकती। पूंजीवाद और साम्यवाद मनुष्य की भौतिक, आर्थिक आवश्यकताओं को ही सब कुछ मानती है। नैतिक और सांस्कृतिक पक्ष की स्थापना एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था का आधार हो सकती है, यह दीनदयाल जी के एकात्म मानवतावाद से संभव है।