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सड़कों पर क्यों बह रहा है दूध, बता रहे हैं के. सी. त्यागी
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उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, बिहार, झारखंड और तमिलनाडु सबसे अधिक दुग्ध उत्पादक राज्यों की श्रेणी में आते हैं। कोरोना संकट के कारण पूर्ण बंदी ने समूचे औद्योगिक आर्थिक ढांचे को शिथिल किया है। सिर्फ कृषि क्षेत्र से आने वाले समाचार ही उत्साहवर्धक हैं।
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जहां समूचे देश की जीडीपी के रुझान नकारात्मक दिख रहे हैं, वहीं कृषि क्षेत्र में जीडीपी विकास दर पांच फीसदी संभावित है। आमतौर पर अपने देश में कृषि क्षेत्र की परिभाषा में सिर्फ गेहूं, धान, गन्ना, कपास, तिलहन और दलहन के किसान ही शुमार किए जाते हैं और ग्रामीण भारत के किसानों में फल, सब्जी, फूल, मत्स्य और दुग्ध उत्पादन के कारोबार को इससे भिन्न करके देखा जाता है।
जबकि दोनों ही कृषि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के अंग हैं। पूर्ण बंदी के दौरान जहां किसानों ने गेहूं, गन्ना और चावल के भंडार भर दिए, वहीं अन्य कृषि व्यवसायों के किसान बर्बादी की कगार पर हैं। जैसे, धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक आयोजनों पर रोक के कारण कई हजार करोड़ रुपये का फूलों का व्यापार घाटे का सौदा बन गया है। कमोबेश यही हालत जल्द खराब होने वाले फल और हरी सब्जी उत्पादकों की हुई। इन क्षेत्रों के करोड़ों किसान और मजदूर भुखमरी के कगार पर हैं।
दुग्ध कारोबार पर भी संकट है। दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय कृषि क्षेत्र की घरेलू पैदावार का 1/3 हिस्सा है। लगभग 10 करोड़ उत्पादक इस व्यवसाय का हिस्सा हैं। पूर्ण बंदी के दौरान उन्हें रोज कई हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। मिठाई की दुकानें, रेस्टोरेंट तथा पनीर की आपूर्ति बंद होने से यह क्षेत्र अब तक 60 अरब रुपये तक का अनुमानित घाटा उठा चुका है।
भारत दुनिया में सर्वाधिक दूध उत्पादन करने वाला देश है। पिछले वर्ष देश में 17.63 करोड़ टन दूध का उत्पादन हुआ। विश्व के कुल दुग्ध उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 22 फीसदी है। अपने देश में कृषि से जुड़े इस क्षेत्र की वृद्धि दर 5.6 फीसदी है। हाल में केंद्र सरकार की ओर से घोषित किए गए 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज में दुग्ध उत्पादकों एवं पशुपालकों की भी दशा सुधारने के लिए घोषणा की गई। लगभग दो लाख करोड़ रुपये के कर्ज दुग्ध उत्पादकों के लिए आरक्षित किए गए हैं।
बिना किसी सरकारी प्रोत्साहन के दूध का 70 प्रतिशत कारोबार असंगठित क्षेत्र में है। मात्र 30 फीसदी दुग्ध कारोबार ही संगठित क्षेत्र यानी डेयरी आदि के माध्यम से होता है। देश के एक बड़े हिस्से में सहकारी दुग्ध संस्थाएं भी इससे जुड़ी हुई हैं। लगभग दो लाख से ज्यादा गांवों से दूध एकत्रित करके डेयरियों में पहुंचाया जाता है। सहकारी संस्थाएं महाराष्ट्र और गुजरात में संस्थागत होकर सक्रिय हैं। गुजरात सहकारी दुग्ध मार्केटिंग फेडरेशन समूचे विश्व में अपने अमूल उत्पाद के लिए विख्यात है।
किसानों के साथ-साथ गाय-भैंस आदि भी इसी उद्योग का प्रमुख हिस्सा है, जिसकी संख्या इस समय लगभग 30 करोड़ है। पूर्ण बंदी में इन पशुओं के चारे को लेकर भी बड़ी मुसीबत पैदा हुई, जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर चारा ले जाने की मनाही थी। डीजल के दामों में निरंतर वृद्धि भी घाटे का सौदा साबित हो रही है।
पिछले कुछ दिनों से दुग्ध उत्पादक सड़कों पर ही दूध को पानी की तरह बहा रहे हैं। दुग्ध उत्पादकों की शिकायत यह है कि लॉकडाउन के दौरान दूध के दामों में बेतहाशा कटौती हुई है। कई स्थानों पर यह कटौती 35 से 45 फीसदी तक हुई है। बोतलबंद पानी की कीमत भी 20 रुपये लीटर है, जबकि किसानों को अपना दूध 15 से 16 रुपये प्रति लीटर बेचना पड़ रहा है।
पिछले पांच साल से दूध के दामों में वृद्धि न के बराबर हुई है। दूध के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने का कोई प्रावधान भी नहीं है। एक पशु पर रोजाना करीब 200 रुपये का खर्च आता है। जमीन का रकबा दिनोंदिन घट रहा है। चारा उगाने के लिए पर्याप्त जमीन भी उपलब्ध नहीं है। वन संरक्षण अधिनियम भी इन पशुपालकों के जी का जंजाल बना हुआ है। पशुओं को आरक्षित वनों, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों में घास चरने की अनुमति नहीं है।
केंद्र सरकार के एक फैसले को लेकर भी दुग्ध उत्पादक दुखी हैं। सरकार ने 10 हजार मीट्रिक टन स्किम्ड मिल्क पाउडर आयात करने की अनुमति दी है। इस दूध पर सीमा शुल्क घटाकर सिर्फ 15 फीसदी कर दिया गया है। लॉकडाउन के कारण पहले ही देश में दूध पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।
ऐसे में, आयात करने की जरूरत क्यों आन पड़ी? किसान संगठनों का आकलन है कि देश में सवा लाख टन मिल्क पाउडर का भंडार है। ये संगठन काफी समय से निर्यात खोलने की मांग को लेकर संघर्षरत हैं। कई जानकर इसे विश्व व्यापार संगठन की ओर से लगाई गई शर्तों का नतीजा मान रहे हैं। इन संगठनों ने सरकार से मांग की है कि डीजल, चारे और बिजली के दामों में बढ़ोतरी को देखते हुए दुग्ध उत्पादकों के खाते में 10 रुपये प्रति लीटर का अनुदान भेजा जाए और दूध की कीमत 27 रुपये लीटर तय की जाए।
बड़े पैमाने पर हो रहा नकली दूध का कारोबार भी दुग्ध उत्पादकों की समस्या का प्रमुख कारण है। मिलावटी दूध में यूरिया, कास्टिक सोडा, डिटर्जेंट पाउडर, कृत्रिम चिकनाई, सफेद रोगन और कभी-कभी तो पेंट तक मिलाकर बेचा जाता है, जो असमय मृत्यु का कारण भी बनता है। पिछले साल सभी राज्यों से दूध के नमूने लिए गए, तो 68 फीसदी नमूने एफएसएसआई (फूड सेफ्टी ऐंड स्टैंडर्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के मानकों पर खरे नहीं उतरे। सरकार ने हाल ही में उपभोक्ता संरक्षण कानून लागू किया है।
इसके असरदार क्रियान्वयन पर भी बाजार का रुख स्पष्ट होगा। दूध का लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर इस क्षेत्र को प्रोत्साहित करना होगा। चिलिंग सेंटरों की संख्या बढ़ानी होगी, ताकि दूध सुरक्षित रखा जा सके। नकली उत्पादों के खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी है। और आत्मनिर्भरता के इस दौर में विदेशी आयात तो हतोत्साहित करने जैसा होगा।