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मामूली भ्रष्टाचार का जिक्र क्या करना

Mon, 20 May 2013 09:55 PM IST
श्याम विमल
श्याम विमल Updated Mon, 20 May 2013 09:55 PM IST
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why mention minor corruption

भ्रष्टाचार के इस यूपीए युग में चालीस साल पहले की घूसखोरी के बारे में बताने का कोई मतलब नहीं है। हाथी जितने भारी भ्रष्टाचार और खदान जितने गहरे घोटालों के बरक्स चींटी जितने भ्रष्टाचार के प्रसंग का बखान करना ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है। कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली।

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लेकिन गंगू तेली वाली आपबीती बताए बिना बात न बनेगी। कहां तो महान घोटालेबाजों और कमीशनखोरों के अरबों रुपये रेसकोर्स के मैदान में, और कहां सुविधा शुल्क के नाम पर दो सौ रुपये का रसरंजन ढाबे में! दरअसल ये श्रीमान दिल्ली के एक कॉलेज में लेक्चरर बन गए थे।
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ऊपरी आमदनी का जरिया बनी रेल मंत्रालय में पुस्तकों की वार्षिक खरीद हेतु तीन विद्वानों की परामर्श व चयन-समिति में पांच साल के लिए नियुक्ति। वह नियुक्ति वैतनिक न होकर मानद थी। समिति की जब-जब बैठकें आयोजित होतीं, तब-तब टी.ए.-डी.ए. का मानदेय काफी बन जाता।
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ऊपर से प्रथम श्रेणी का फ्री रेलवे पास। किताबें फोकट में आ जातीं। उन्हें पढ़ना तो क्या था, बस उलट-पुलटकर देखना होता था और खास प्रकाशक को पटाना भी होता था। इससे अपनी अपठनीय कविताओं के छपने की उम्मीदें भी बन गईं।

पांडुलिपि में पड़ी-पड़ी कविताओं को दीमक चाट जाए, उससे बेहतर यही सही कि छपकर मोटी खरीद में किताबें अलमारियों में सजी-सिमटी रहें, और किसी परिवर्तित युग में शोध कार्य यदि हुआ, तो इस्तेमाल में आ जाएं। बहरहाल, घूस पांच रुपये की हो या पांच-दस लाख की, बेचारा गंगू तेली कितना संयम बरते। उसने पुस्तक चयन समिति में स्थान पाया।

छककर रेल सफर किए। सफर में नए-नए अनुभव मिले। प्रकृति दर्शन हुए, तो कविता छायावादी हो चली। प्रकाशक चयन समिति को पटाने लगे। बल्क परचेज पर कमीशन का प्रतिशत बढ़ा तथा कविताओं की पांडुलिपियां प्रकाश में आने लगीं। गंगू तेली कवि को अचानक छोटे-मोटे भ्रष्टाचार में आनंद आने लगा। उसे लगा कि लोग नाहक ही ईमानदारी का इतना बखान करते हैं।


थोड़ा-सा भ्रष्टाचार कर ही लिया, तो कौन-सा आसमान गिर पड़ा! परिवार वाले भी खुश हुए कि यह आदमी थोड़ा-सा प्रैक्टिकल तो हुआ है। सो रेल मंत्रालय में अपनी मालगाड़ी 'पवनपूत' की माफिक ब्रॉडगेज पर चल निकली। लेकिन बंसल साहब के दौर में सौ-दो सौ रुपये के उस भ्रष्टाचार की भला क्या औकात! आज तो इसका जिक्र करने में भी शर्म आती है।

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