धूप आने दो: भगवान विष्णु ने इसलिए लिया हयग्रीव अवतार, दिलचस्प है घटनाक्रम
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ब्रह्मा को पुष्प पर बैठे देखकर मधु और कैटभ का उपहास करने का मन हुआ। उन्होंने ब्रह्मा को चुनौती देते हुए कहा, ‘इस पुष्पासन से नीचे उतरो और पराजय स्वीकार करो, अन्यथा हमसे युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।’
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विस्तार
भगवान विष्णु जानते थे कि विशालकाय मधु-कैटभ से सामान्य रूप में टक्कर लेना सरल नहीं था। उनके शरीर से एक प्राणी प्रकट हुआ, जिसकी ग्रीवा (गर्दन), हय (अश्व) के समान थी। ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की। उन्होंने साथ ही, ज्ञान के स्रोत भी उत्पन्न किए। वेदों का प्राकट्य हो चुका था। इसी बीच, विष्णु के कान के मैल से दो जीव प्रकट हुए।
दोनों प्राणी भूखे थे। वे भोजन की तलाश में इधर-उधर भटकने लगे। उनमें से एक ने भूख शांत करने के लिए शहद को पसंद किया, इसलिए उसका नाम मधु हो गया। दूसरा प्राणी कीट के समान दिखता था, इसलिए उसका नाम कैटभ पड़ा। भूख से व्याकुल मधु और कैटभ, चारों ओर घूमे लेकिन उन्हें खाने को कुछ नहीं मिला। चारों ओर केवल जल व्याप्त था, इसलिए मधु और कैटभ ने उसी जल को पी लिया। जल से पुष्ट होकर मधु और कैटभ का आकार बढ़ने लगा और वे अत्यंत शक्तिशाली हो गए। शक्ति आई तो साथ में अहंकार भी आया। घमंड से भरे हुए मधु और कैटभ, ब्रह्मा के पास पहुंच गए। उस समय ब्रह्मा अपने कमल पुष्पासन पर विराजमान थे।
ब्रह्मा को पुष्प पर बैठे देखकर मधु और कैटभ का उपहास करने का मन हुआ। उन्होंने ब्रह्मा को चुनौती देते हुए कहा, ‘इस पुष्पासन से नीचे उतरो और पराजय स्वीकार करो, अन्यथा हमसे युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।’
ब्रह्मा, उन दोनों राक्षसों से युद्ध नहीं करना चाहते थे, इसलिए वह अपने स्थान पर बैठे रहे। यह देखकर मधु और कैटभ को क्रोध आ गया और वे दोनों ब्रह्मा को उनके पुष्पासन से गिराने का प्रयत्न करने लगे। इस खींचा-तानी में ब्रह्मा के हाथ से चारों वेद फिसलकर नीचे गिरने लगे। इससे पहले कि ब्रह्मा वेदों को पकड़ पाते, मधु और कैटभ ने दौड़कर वेद उठा लिए और उन्हें जल में छिपा दिया।
वेदों की रक्षा करना अनिवार्य था। इसलिए ब्रह्मा, तत्काल भगवान विष्णु के पास गए और उन्होंने मधु एवं कैटभ के विषय में विष्णु को विस्तार से बताया। विष्णु ने ब्रह्मा को आश्वासन दिया कि वह वेदों की रक्षा अवश्य करेंगे। परंतु विष्णु यह भी जानते थे कि विशालकाय मधु-कैटभ से सामान्य रूप में टक्कर लेना सरल नहीं था। इसके लिए विष्णु ने अवतार लेने का निश्चय किया। उनके शरीर से एक प्राणी प्रकट हुआ जिसकी ग्रीवा (गर्दन), हय (अश्व) के समान थी। इसलिए विष्णु का यह अवतार ‘हयग्रीव’ कहलाया।
विष्णु और मधु-कैटभ में युद्ध आरंभ हो गया। विष्णु अकेले थे किंतु मधु-कैटभ दो थे। दोनों में से एक थक जाता तो दूसरा लड़ने के लिए तैयार हो जाता। इस तरह वह युद्ध पांच हजार वर्ष तक चलता रहा किंतु विष्णु, मधु और कैटभ को परास्त नहीं कर पाए। शक्ति काम नहीं आई तो विष्णु ने युक्ति का सहारा लिया। वह बोले, ‘मैंने कभी ऐसा रण-कौशल नहीं देखा। आप जैसे अजेय योद्धाओं से वरदान पाकर मेरा जीवन धन्य हो जाएगा।’
मधु और कैटभ हंसने लगे। उन्होंने अहंकार में भरकर हयग्रीव से कहा, ‘तुम्हें क्या चाहिए? जो चाहोगे, वही पाओगे!’ विष्णु को इसी क्षण की प्रतीक्षा थी। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘मुझे वरदान दीजिए कि मैं आप दोनों का वध कर सकूं।’ विष्णु की बात सुनकर मधु-कैटभ दुविधा में पड़ गए। चारों ओर अथाह जल देखकर मधु और कैटभ ने प्राण बचाने के लिए अंतिम प्रयास किया। वे विष्णु से बोले, ‘हमारी एक शर्त है। हम चाहते हैं कि तुम हमें ऐसे स्थान पर मारो जहां पानी न हो!’
हयग्रीव मुस्कराए...उनका शरीर बढ़ने लगा। आकार इतना विशाल हो गया कि वह जल की सतह पर तैरते किसी पर्वत के समान दिखने लगा। मधु और कैटभ कुछ समझ पाते इससे पहले हयग्रीव ने दोनों को उठाया और अपनी एक-एक जंघा पर रखकर उनका वध कर डाला। इस तरह विष्णु ने हयग्रीव अवतार में मधु और कैटभ का संहार करके वेदों की रक्षा की। फिर विष्णु ने मधु-कैटभ के शवों से मेद निकाला। ब्रह्मा ने उसी मेद से भूमि का निर्माण किया। मेद से निर्मित पृथ्वी ‘मेदिनी’ कहलाई। मधु का वध करने पर विष्णु को एक नया नाम मिला–मधुसूदन!