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दिल्ली का ऐसा हाल क्यों? हवा को लेकर चिंता होने लग गई है

Mon, 21 Oct 2019 08:44 AM IST
Tavleen Singh तवलीन सिंह
Updated Mon, 21 Oct 2019 08:44 AM IST
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Why is Delhi like this?

इस महीने में हर साल की तरह दिल्ली की हवा को लेकर चिंता होने लग गई है। दिल्ली सरकार ने फिर से ऑड-ईवन स्कीम दिवाली के बाद शुरू करने का फैसला किया है। लेकिन यह उपाय नहीं, बल्कि दिखावा है। असली उपाय ढूंढने की कोशिश न तो दिल्ली सरकार ने की है और न ही केंद्र सरकार ने, बावजूद इसके कि ऐसे उपाय उपलब्ध हैं। इस मौसम में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण पंजाब और हरियाणा के खेतों में पराली का जलाया जाना है। किसान पराली जलाने पर इस वजह से मजबूर हैं, क्योंकि उनको सरकार की तरफ से न तो कोई तकनीकी सहायता मिलती है और न ही तकनीकी विकल्प ढूंढने के लिए उनकी आर्थिक सहायता की जाती है।


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पंजाब सरकार ने रेडियो पर इश्तहार जारी किए हैं, जिसमें किसानों से पराली न जलाने की विनती की गई है। यह सिर्फ एक झूठा प्रयास है। पिछले सप्ताह मैं सड़क के रास्ते कसौली से दिल्ली आ रही थी। जब मैं पंजाब से गुजर रही थी, तब मैंने रेडियो पर अच्छी-सी बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ ये शब्द सुने, वीरे पराली न साड़ीं। यह घोषणा सुनकर मुझे बुरा लगा और गुस्सा भी आया कि उत्तर भारत में वायु प्रदूषण की समस्या अब इतनी गंभीर हो चुकी है कि दिखावे के इलाज अब हमारे काम नहीं आएंगे। सच तो यह है कि असली उपाय ढूंढे बिना काम नहीं चलने वाला।

ऐसा लगता है कि पर्यावरण को लेकर हमारे राजनेता गंभीर नहीं हुए हैं। कसौली अपने आप में इसका उदाहरण है। खुशवंत सिंह लिटफेस्ट में भाग लेने के लिए मैं पहली बार कसौली गई थी। कसौली शहर का हाल देखकर मुझे रोना आया और चिंता भी हुई। कसौली में पर्यटन इतना बढ़ गया है कि शहर के हर दूसरे कोने पर एक नया होटल बन गया है। इन होटलों का निर्माण भ्रष्ट अधिकारियों को रिश्वत देकर हुई है, क्योंकि इनसे पहाड़ को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई की कोई कोशिश नहीं दिखती। इतनी लापरवाही से पहाड़ों को काटकर विकास आया है कि वापसी के रास्ते में मुझे ऐसा लगा कि भूस्खलन कभी भी हो सकता है। पहाड़ों का ध्यान रखे बगैर सड़कें चौड़ी की जा रही हैं। सो जहां खुदाई हुई, वहां पहाड़ कच्चे रह गए हैं।

जब भी कोई अविकसित देश विकास के रास्ते पर चल पड़ता है, तो पर्यावरण को नुकसान होता ही है। दूसरी ओर, जिन देशों की सरकारें अक्लमंदी से काम करती हैं, वहां सुनियोजित ढंग से विकास को आने दिया जाता है। जब हर साल देश की राजधानी में वायु का हाल यह हो जाता है कि सांस लेना मुश्किल हो जाए, तो ऐसे उपाय ढूंढने जरूरी हो जाते हैं, जो वास्तव में समस्या का समाधान साबित हों। दिल्ली में ऐसा क्यों नहीं हुआ? जब पराली जलाने के आधुनिक विकल्प हैं, तो पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसानों को वे विकल्प उपलब्ध क्यों नहीं हैं? दिल्ली का ऐसा हाल क्यों है, जहां हर साल हमें ऑड-ईवन जैसा तमाशा बर्दाश्त करना पड़ता है, जो उपाय नहीं, सिर्फ ढोंग है?

प्रधानमंत्री व्यक्तिगत तौर पर्यावरण को लेकर इतने गंभीर हैं कि उन्होंने इस विषय पर एक किताब लिखी है। सो उनको क्यों नहीं दिखता है कि अधिकतर राजनेता समझते ही नहीं कि देश के जल और वायु को इतना नुकसान पहुंचा है कि अब दिखावे से काम नहीं चल सकता। अंत में इतना कह दूं कि उत्तर की तरफ से जब मैं दिल्ली लौटी, तो बड़ा-सा एक पहाड़ नजर आया, जिसने मुझे चौंका दिया। दोबारा देखने पर मालूम हुआ कि यह कूड़े का वही पहाड़ है, जिसके कारण इस महानगर की वायु में रोज जहर फैलता है।

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