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मालदीव में क्यों दखल दे भारत

Sun, 11 Mar 2018 07:32 PM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Sun, 11 Mar 2018 07:32 PM IST
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Why India Intervenes In Maldives
मालदीव संकट

मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन और सुप्रीम कोर्ट के बीच गतिरोध के बाद जब से मालदीव सांविधानिक संकट में फंसा है और पूर्व राष्ट्रपति (जो फिलहाल निर्वासन में हैं) मोहम्मद नाशीद ने भारत से कार्रवाई करने का आह्वान किया है, तब से ये अटकलें लगाई जा रही हैं कि भारत संभवतः वहां सैन्य हस्तक्षेप करेगा। इस तरह के कयास 1988 के ऑपरेशन कैक्टस की तर्ज पर लगाए गए, जिसमें भारतीय सेना ने तख्तापलट की कोशिश का विरोध किया था। लेकिन उस समय सैन्य हस्तक्षेप तत्कालीन राष्ट्रपति गयूम (मौजूदा राष्ट्रपति के सौतेले बड़े भाई) के आग्रह पर किया गया था। इस समय मालदीव में एक निर्वाचित राष्ट्रपति है, जो हालांकि काफी बदनाम है। उन्होंने भारत से हस्तक्षेप करने के लिए नहीं कहा है। और न ही वहां की न्यायपालिका ने (जो दूसरा सत्ता केंद्र है) भारतीय सैन्य हस्तक्षेप का आग्रह किया है। मौजूदा राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ हैं, जिसमें अदालत ने सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत के इस फैसले ने मौजूदा राष्ट्रपति को नाराज कर दिया है और उन्होंने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी है। ऐसे में अगर भारत वहां सैन्य हस्तक्षेप करता है, तो उसकी हर तरफ आलोचना होगी, खासकर चीन भारत की आलोचना करेगा, जो मौजूदा राष्ट्रपति यामीन की उन नीतियों का सबसे बड़ा लाभार्थी है, जिसने चीन को 1,192 द्वीपों पर अपनी उपस्थिति जताने की अनुमति दी है।


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चीन के पास न केवल पर्याप्त संसाधन हैं, बल्कि लक्ष्य हासिल करने के प्रति दक्षता ने भी मालदीव में उसका प्रभाव बढ़ाया है। दूसरी ओर, राजनयिक आत्मसंतुष्टि के कारण वहां भारत का असर कम हुआ है। हमारी इसी राजनीयिक आत्मसंतुष्टि ने श्रीलंका और अब नेपाल में हमारा नुकसान बढ़ाया है। वर्ष 2017 में चीन के साथ मालदीव के मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद वहां चीन का प्रभाव तेजी से बढ़ा है, क्योंकि इस समझौते ने चीन को इस द्वीपीय देश में सस्ते चीनी उत्पादों की बाढ़ लाने की मंजूरी दी है। उसके बाद शीघ्र ही भारत की आपत्तियों के बावजूद चीनी युद्धपोत मालदीव गए। और उसके बाद ही राष्ट्रपति यामीन की मौजूदा सरकार पूरी तरह चीन के पाले में चली गई। यमीन की सरकार उन द्वीपों से भारतीय कंपनियों व संस्थाओं को बाहर कर रही है, जहां चीनी निवेश कर रहे हैं। लेकिन जैसा कि चीन के आर्थिक निवेश अक्सर अपने रणनीतिक हितों को पूरा करने के लिए तैयार किए जाते हैं, मालदीव भी अलग नहीं था। वहां चीन 1.5 डिग्री चैनल तक निर्बाध पहुंच चाहता है, जो हिंद महासागर में चीन की पहुंच के लिए जरूरी है और वह अंततः आठ डिग्री चैनल तक पहुंच चाहता है, जो भारतीय तटों के बहुत करीब है। चीन हिंद महासागर में कई ठिकानों पर कब्जा जमाने के लिए उत्सुक है, जैसा वह अपने बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (पहले ओबीओआर) के लिए जिबूती, ग्वादर और हम्बनटोटा आदि जगहों पर कर सका।

असल में चीन समुद्री मार्ग के जरिये अपने व्यापार को बढ़ावा देने तथा भारत पर दबाव बनाने के लिए मालदीव में अपना एक नौसैनिक अड्डा बनाना चाहता है, ताकि भारत की नौसैनिक गतिविधियों पर नजर रख सके और अपनी नौसैनिक क्षमता भी बढ़ा सके। एक तरह से कह सकते हैं कि चीन भारत पर अपनी मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाना चाहता है। वास्तव में चीन ने मालदीव समेत जिन-जिन देशों में निवेश किया है, वहां उसका असली मकसद अपना प्रभाव बढ़ाना है, न कि उन देशों की मदद करना। चीन के पास भारत की तुलना में ज्यादा पैसा है और उसी के बल पर वह भारत के पड़ोसी देशों को अपने प्रभाव में लेकर भारत पर दबाव बनाना चाहता है। पाकिस्तान तो हमेशा से भारत का विरोधी रहा ही है, श्रीलंका में भी हम्बनटोटा बंदरगाह का निर्माण कर चीन ने श्रीलंका को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की है। उधर नेपाल भी उसके प्रभाव में आता जा रहा है। म्यांमार में भी वह अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में लगा हुआ है। अब जबकि उसने मालदीव को भी अपने प्रभाव में ले लिया है, ऐसे में भारत के लिए चुनौती बढ़ गई है कि वह कैसे बांग्लादेश और भूटान को चीन के प्रभाव में जाने से रोके।

चूंकि मालदीव किसी मानवीय संकट में नहीं फंसा है, इसलिए सैन्य हस्तक्षेप पर परहेज करते हुए भारत ने अब ठहरकर प्रतीक्षा करने की रणनीति अपनाई है। हालांकि भारत ने अतीत में अपने पड़ोस में सैन्य हस्तक्षेप किया है और ऐसा उसने या तो नरसंहार रोकने के लिए किया है (जैसा कि उसने पूर्वी पाकिस्तान, अब बांग्लादेश में 1971 में किया ) या 1987 में श्रीलंका में तत्कालीन राष्ट्रपति जयवर्धने के अनुरोध पर। इन दोनों देशों में नई दिल्ली अपने सैन्य अभियानों की सफलताओं का कूटनीतिक इस्तेमाल करने में असमर्थ थी। इससे भी बड़ी बात यह है कि सैन्य हस्तक्षेप के बाद दूसरे देशों की समस्याओं को दूर करने का काम कभी आसान नहीं होता है। मालदीव का राजनीतिक अभिजात वर्ग बंटा हुआ है और अब वह अपनी रणनीतिक स्थिति के प्रति तीव्रता से जागरूक है, और वह उस देश (यहां चीन पढ़ा जाए) के साथ जुड़ने के लिए बेहद उत्सुक है, जो उसे उच्चतम लाभ पहुंचा सके।

इसलिए नई दिल्ली के सामने विचारणीय प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या मालदीव में सैन्य हस्तक्षेप उसके उद्देश्यों को पूरा करेगा। करीब पांच लाख लोगों की आबादी वाला यह द्वीपीय देश भारत के दक्षिणी तट के करीब स्थित है, और भले ही भारत वहां चीन की मौजूदगी रोकने के लिए उत्सुक हो, लेकिन हिंद महासागर में भारत को अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए मालदीव में मौजूदगी जरूरी नहीं है। इसके बजाय भारत को भविष्य में चीन का ठोस मुकाबला करने के लिए नौसेना की क्षमता में भारी निवेश करने की जरूरत है। 

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