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हमेशा मैं ही क्यों ठगा जाता हूं

Tue, 28 Jan 2014 07:02 PM IST
अखिलेश मयंक
अखिलेश मयंक Updated Tue, 28 Jan 2014 07:02 PM IST
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why i am duped every time

हर साल की तरह इस बार भी गणतंत्र दिवस पर मेरे सीने पर वज्रपात हुआ। पद्मश्री सम्मान प्राप्त करने वालों की सूची अखबारों में आई, तो पता चला कि मैं इस साल भी चुक गया। अखबार में छपी सूची कई बार पढ़ी। उसमें अपना नाम न मिलने पर दूसरा अखबार पढ़ा, क्योंकि एक अखबार पर भरोसा करना ठीक नहीं। जब दूसरे और तीसरे अखबार में भी अपना नाम नहीं मिला, तब लखनऊ और दिल्ली के जुगाड़ तंत्रों को खंगाला। तब जाकर यह भरोसा हुआ कि मेरे साथ इस बार भी धोखा हुआ है।

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इस मुल्क में योग्यता की तो कोई पूछ ही नहीं है, जबकि मैं पद्मश्री पाने की सभी योग्यताएं पूरी करता हूं। मसलन, मेरे टेलीफोन और एसएमएस से आजिज आकर मेरे सांसद, विधायक तथा जिले के डीएम लगभग एक दर्जन बार यह लिखकर दे चुके हैं कि मैं क्षेत्र का बहुत बड़ा समाजसेवी हूं।
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दान-पुण्य तो मैं करता ही हूं। मैंने एक-दो नहीं, पूरी 187 पुस्तकें लिखी हैं, जिसमें से तेल मालिश के फायदे तथा जुगाड़ के लाभ को राष्ट्रीय स्तर के दो संगठनों की तरफ से पुरस्कार भी मिल चुके हैं। इसके अलावा भी मेरी कई पुस्तकें पुरस्कार पाने के करीब हैं। मुझे अब तक कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। एक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मैंने लगभग जुगाड़ लिया है, बस बात उसमें मिलने वाले नकद राशि को लेकर अटकी हुई है।
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अब जमाना स्पेशलाइजेशन का है। लोग-बाग अपने स्पेशलाइजेशन को भुना रहे हैं। इसी को देखते हुए मैंने एक कोचिंग सेंटर खोलने की योजना बनाई है, जिसमें यह बताया जाएगा कि पद्मश्री कैसे प्राप्त करें। एक पुराने और दिग्गज कांग्रेस नेता ने कभी एक किताब लिखी थी, चुनाव कैसे जीतें? हालांकि वह खुद जीवन में एक भी चुनाव नहीं जीते थे। इसके बावजूद उनकी किताब इसलिए हिट रही थी, क्योंकि उसमें प्रैक्टिकल सुझाव थे। मेरे सुझाव भी प्रैक्टिकल होंगे, क्योंकि मेरे पास भी बीस साल की विफलता का अनुभव है। एक बार कोचिंग चल जाने के बाद प्लेसमेंट की गारंटी का दावा भी मैं करूंगा ही। इसलिए इच्छुक पाठक मुझसे पद्मश्री पाने की कोचिंग लेने के बारे में जरूर सोचें।


वैसे इसके पीछे मेरा उद्देश्य शुद्ध व्यावसायिक नहीं है। मेरा जनसेवा भाव भी ठाठें मार रहा है। दरअसल मैं नहीं चाहता कि पद्मश्री पाने के लिए जितने पापड़ मैं बेल रहा हूं, आने वाली पीढ़ियां भी उतनी ही परेशानी झेलें।

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