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माफी दे क्यों नहीं देते
राजेंद्र शर्मा
Updated Wed, 29 May 2013 09:41 PM IST
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भाई, यह तो सरासर ज्यादती है। माओवादी भाई खुद अपनी तरफ से माफी मांग रहे हैं। पूरी जिम्मेदारी के साथ माफी मांग रहे हैं। लिखित में माफी मांग रहे हैं। खाली-पीली माफी ही नहीं मांग रहे, नाहक मारे जाने वालों के परिजनों के प्रति संवेदना भी प्रकट कर रहे हैं।
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दुख जता रहे हैं। फिर भी लोग हैं कि एक जरा-सी माफी देने में नखरे दिखा रहे है। वे माफी मांग रहे हैं और ये ऐंठ दिखा रहे हैं कि ऐसे गुनाह की माफी कतई नहीं मिल सकती।
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कमाल है, खाकी भाई हर रोज सरकार में किसी न किसी से माफी मांगने की मांग करते हैं और कोई माफी मांगकर नहीं देता। माओवादी भाई खुद आगे बढ़कर माफी मांग रहे हैं, फिर भी लोग भाव दिखा रहे हैं।
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हम कहते हैं कि माफी से इनकार की एक तुकदार वजह तो हो। अब यह तो कोई वजह नहीं हुई कि वे ईमानदारी से माफी नहीं मांग रहे। सच्चे पछतावे की माफी नहीं मांग रहे। सबको मारने के लिए माफी नहीं मांग रहे। ज्यादातर को मारने पर तो अपनी पीठ ही ठोक रहे हैं।
कुछ को मारने को जायज बता रहे हैं, तो कुछ और के मारने को अनिवार्य प्रतिशोध। बस नाहक बीच में आकर मारे गए थोड़े-से निर्दोष लोगों के मारे जाने पर वे खेद जता रहे हैं।
वे दुश्मन नहीं थे, फिर भी मारे गए, सो खेद भया! हम पूछते हैं कि वे खेद भी नहीं जताते, तो कोई क्या कर लेता? सो भागते भूत की लंगोटी ही सही। आखिर खेद तो जता ही रहे हैं, बंदूक के बल पर माफी नहीं मंगवा रहे।
कोई यह न भूले कि यह गांधी का देश है। माफी देना हमारा धर्म है। अब कोई यह न कहे कि बंदूक में यकीन करने वाले को कैसी माफी! देखिए, माफी हमेशा भूल-चूक होने के बाद ही ली और दी जाती है। बंदे अगर मारे ही नहीं जाते, तो माफी मांगने का मुद्दा ही क्यों उठता?
मामला हत्या का है, इतने सारे लोगों की हत्या का है, इससे भी माफी मुश्किल नहीं होनी चहिए। माफी, माफी है कोई सजा नहीं, जो जुर्म देख-देखकर दी जाए। उल्टे गुनाह जितना बड़ा, माफी उतनी ही महान! एक कत्ल की भी एक माफी, बीस कत्ल की भी एक ही माफी!
फिर भी जिन्हें जरा-सी माफी देना तक मंजूर नहीं, वे यह न भूलें कि माओवादी किसी के कुछ देने, न देने के भरोसे भी नहीं हैं। उन्हें माफी देने से कोई क्या इनकार करेगा, जब उन्होने माफी मांगी ही नहीं है। उन्होंने तो सिर्फ प्रकट किया है खेद और शोक। कोई दे न दे, वे किसी से कुछ मांगने नहीं जाते।