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सहकारी संघवाद में भेदभाव क्यों

भारत डोगरा Updated Wed, 17 Apr 2019 07:49 PM IST
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राज्य सरकारों की यह मांग बहुत समय से रही है कि उन्हें केंद्रीय करों का बेहतर हिस्सा मिले तथा इसे अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर खर्च करने की राज्य सरकार की क्षमता भी बढ़े। यह मांग पूरी होने की उम्मीद वर्ष 2015-16 में बंधी, जब 14 वें वित्त आयोग की सिफारिशों को लागू किया गया।
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उस समय निर्णय लिया गया कि केंद्रीय करों के विभाजीय पूल में राज्यों की हिस्सेदारी को 32 प्रतिशत से बढ़ा कर 42 प्रतिशत किया जाएगा। पर उसी समय केंद्र समर्थित योजनाओं में केंद्र सरकार का हिस्सा बहुत कम कर दिया गया, जिससे इन योजनाओं के अंतर्गत राज्य सरकारों को मिलने वाली धनराशि बहुत कम हो गई। यह एक हाथ से देने तथा दूसरे हाथ से लेने वाली स्थिति थी। यह कटौती बहुत जल्दबाजी में नहीं करनी चाहिए थी। एक अन्य ध्यान देने योग्य बात थी कि संसाधन प्राप्त करने के एक तरीके के रूप में केंद्र सरकार ने सेस (या उपकर) व सरचार्ज का उपयोग बढ़ा दिया। कई तरह के सेस जैसे शिक्षा संबंधी सेस, स्वच्छता संबंधी सेस लगाए गए। ऐसे उपकरों को केंद्र सरकार के पास ही रखा गया व इनकी हिस्सेदारी राज्य सरकारों से नहीं की गई। इसके अतिरिक्त कुछ उपकरों का पूरा उपयोग निर्धारित लक्ष्य के लिए नहीं किया गया।

जब आय का बढ़ता हिस्सा उपकर व सरचार्ज के रूप में प्राप्त किया गया व इस तरह प्राप्त राशि की हिस्सेदारी राज्य सरकारों से नहीं हुई, तो इससे भी राज्य सरकारों की हिस्सेदारी की क्षति हुई। इस तरह चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों का बढ़ते संसाधन के रूप में उतना लाभ राज्य सरकारों को नहीं मिला, जितनी कि उम्मीद थी। इसके बावजूद राज्य सरकारों को इस बात की प्रसन्नता थी कि केंद्र से प्राप्त होते संसाधनों में वह हिस्सा बढ़ रहा है, जिसे वे अपनी प्राथमिकता के अनुसार खर्च कर सकती हैं।

पर यह प्रसन्नता भी बहुत समय तक नहीं बनी रह सकी। वित्त वर्ष 2017-18 में जीएसटी के आगमन के साथ टैक्स दर निर्धारित करने की क्षमता राज्य सरकारों के पास नहीं रह सकी व जीएसटी परिषद में केंद्रीकृत हो गई। राज्य सरकारों को अपना सीमित उपकर या सेस लगाने के लिए भी जीएसटी परिषद की अनुमति लेना जरूरी हो गया है।

उदाहरण के लिए, हाल ही में जब केरल में भयंकर आपदा के बाद वहां की राज्य सरकार को सेस की जरूरत महसूस हुई, तो जीएसटी परिषद की स्वीकृति प्राप्त करना जरूरी माना गया। इस तरह राज्य सरकारों को एक ओर कुछ लाभ मिलता नजर आता है, तो शीघ्र ही इसमें कई बाधा भी आ जाती है।

केंद्र व राज्य में न्यायसंगत हिस्सेदारी व इस आधार पर सभी राज्यों के जन-हितों को आगे बढ़ाने को को-ऑपरेटिव फेडरेलिज्म या सहयोगी संघवाद कहा गया है। इसका अभी प्रचार जितना है, उतनी उपलब्धि नहीं है। चुनाव के कारण इस संदर्भ में समस्याएं और बढ़ सकती हैं, क्योंकि प्रायः केंद्र सरकार का वित्त मंत्रालय उन राज्यों की परियोजनाओं की प्राथमिकता देने लगता है, जहां सत्ताधारी दल वही हैं, जो केंद्र में हैं। इस कारण कुछ अन्य राज्यों की कठिनाइयां बढ़ जाती हैं।

यह न्यायसंगत लोकतंत्र व संघवाद के अनुकूल नहीं है। सहयोगी व न्यायसंगत संघवाद का उद्देश्य प्राप्त करने के लिए अभी हमें अनेक सुधार करने होंगे। एक उपाय यह है कि अंतर्राज्यीय परिषद या इंटर-स्टेट कांऊसिल को अधिक मजबूत कर सहयोगी संघवाद को मजबूत करने में अधिक असरदार भूमिका दी जाए। एक अन्य उपाय यह भी है कि उपकर व सरचार्ज से प्राप्त आय को भी केंद्र सरकार राज्य सरकारों से साझा करे। संसाधनों के वितरण का मुद्दा एक नाजुक मुद्दा है और इस मुद्दे पर व्यापक आम सहमति बनाकर ही आगे बढ़ना चाहिए। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

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