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प्रधानमंत्री जी को गुस्सा क्यों नहीं आता
तवलीन सिंह
Updated Sun, 13 Oct 2013 05:32 PM IST
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हमारे मनमोहन सिंह वतन वापस आए और कुछ घंटों के बाद चल दिए पूर्वी एशिया की तरफ ब्रुनेई में हुए आसियान सम्मेलन में हिस्सा लेने। उस थोड़े से समय में जब तक वह भारत की धरती पर मौजूद थे, पत्रकारों ने उनकी गैरत, उनके स्वाभिमान से जुड़े कई सवाल पूछे।
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क्या राहुल गांधी के 'बकवास' वाले बयान से उन्हें परेशानी नहीं हुई? उन्हें तब बुरा नहीं लगा कि राहुल ने उनकी सरकार के अध्यादेश को कूड़ेदान में फाड़कर फेंक देने की बात ऐन उस वक्त कही, जब वह बराक ओबामा से मिल रहे थे? क्या उनके दिमाग में त्यागपत्र देने का ख्याल आया था ऐसा होने के बाद? प्रधानमंत्री ने अपने खास धीमे स्वर में कहा कि उनको किसी भी किस्म की तकलीफ नहीं हुई और इस्तीफा देने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। फिर चल दिए अगले विदेशी दौरे पर।
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इस बीच राहुल गांधी ने कई बार कहा कि 'उन्होंने जो किया, वह ठीक था, क्योंकि सच बोलने के लिए कोई भी समय ठीक होता है।' उनकी बातों से लगा कि अपनी करतूत से वह गौरवान्वित थे, और होंगे क्यों नहीं, जब उनकी प्रशंसा दिल्ली के जाने-माने राजनीतिक पंडितों ने की।
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अंग्रेजी के दो बड़े रिसालों ने कवर पर उनकी तस्वीर चिपका दी यह कहकर कि जमाना राहुल का आ गया है। राहुल गांधी ने खुद इसे स्वीकार किया रामपुर में और आश्वासन दिया कि 2014 में जो सरकार बनेगी, वह नौजवानों की होगी। यानी, दोस्तो, अपने प्रिय प्रधानमंत्री इस्तीफा दें या न दें, कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि अभी से कांग्रेस ने उनकी छुट्टी कर दी है।
नरेंद्र मोदी ने जिस तरह भाजपा के चुनाव अभियान की शुरुआत की, देश भर में आम सभाओं को संबोधित करके, उसी तरह राहुल गांधी ने कमान संभाली है, कांग्रेस के चुनाव अभियान की। शुरुआत दिल्ली के विज्ञान भवन से हुई, जहां युवराज साहिब ने दलितों से कहा, एयरोनॉटिक्स में एक एस्केप वेलोसिटी का कॉन्सेप्ट होता है, एस्केप वेलोसिटी, मतलब अगर आपको धरती से अंतरिक्ष में जाना है, तो 11.2 किलोमीटर प्रति सेकंड आपकी गति होनी चाहिए...यहां हिंदुस्तान में हमारी जाति की जो अवधारणा है। उसमें भी 'एस्केप वेलोसिटी' होती है। दलित समुदाय को इस धरती पर बृहस्पति की एस्केप वेलोसिटी चाहिए।
दिल्ली के बाद राहुल जी प्रकट हुए अलीगढ़ में, जहां समझाया लोगों को कि किस तरह उनकी सरकार हर तरह के अधिकार दे रही है आम आदमी को और किस तरह उत्तर प्रदेश की सरकार उनको लैपटॉप दे रही है, लेकिन बिजली नहीं। इसके बाद पहुंचे रामपुर, जहां उन्होंने वायदा किया नौजवानों की सरकार देने का।
पूछना तो हमें चाहिए युवराज साहिब से कि अब तक क्यों रहे हैं बुजुर्ग उनकी सरकार में, अब तक क्यों नहीं दलितों का हाल बेहतर हुआ है ऐसे देश में, जहां उनके परिवार के किसी न किसी सदस्य ने पचास वर्षों से ज्यादा राज किया है। लेकिन आज मैं आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहती हूं तकरीबन अदृश्य रहने वाले प्रधानमंत्री की तरफ। विदेशों में जरूर दिखते हैं अपने प्रिय डॉक्टर साहिब, लेकिन देश में इतने कम कि भारत के दुश्मनों के हौसले बुलंद हो गए हैं देश के अंदर भी और सरहदों के उस पार भी।
देश के अंदर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह खुलकर कह रहे हैं कि सेना ने कश्मीर के मंत्रियों को रिश्वत देने का काम किया है। यानी कश्मीर में लोकतंत्र बहाल रखने के लिए जिस पर हमें नाज है, वह लोकतंत्र झूठा है। ऐसी बातें करना गद्दारी मानी जातीं, अगर वास्तव में देश का प्रधानमंत्री होता। यकीनन जनरल पर सैनिक अदालत में मुकदमा चलाकर जेल भेज दिया जाता। पर हमारे प्रधानमंत्री सिर्फ नाम के प्रधानमंत्री हैं, जनरल पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं है।
उधर कश्मीर के केरन क्षेत्र में सीमा पार से इतने जेहादी घुस आए, उनको पकड़ने और मारने का काम 14 दिनों तक चला। क्या जेहादी भारतीय सेना का इस तरह मुकाबला कर सकते, अगर उनको पाकिस्तानी सेना की मदद न होती? बहुत बड़ी कीमत चुका रहा है यह देश ऐसे प्रधानमंत्री के होने के कारण, जो गांधी परिवार के सेवक पहले हैं और भारत की जनता के बाद में। इस नई परंपरा से भारत में लोकतंत्र को तो नुकसान हुआ ही है, उससे भी ज्यादा नुकसान मनमोहन सिंह की निजी छवि को हुआ है।