संघ ने मोदी को क्यों आगे किया
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गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने बारह वर्षों के कार्यकाल में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अच्छे संबंध नहीं रहे। मोदी चूंकि सांविधानिक पद पर पहुंचने वाले संघ के पहले प्रचारक थे, इसलिए गुजरात में तब काम कर रहे संगठन के अधिकांश नेता मान बैठे थे कि सत्ता की असली ताकत वे ही हैं। पर ऐसा नहीं हुआ। अहमदाबाद स्थित हेडगेवार भवन जाकर संघ के नेताओं से दिशा निर्देश लेने के बजाय मोदी खुद इंतजार करते थे कि संघ के नेता उनके पास आएं। संघ और गुजरात सरकार में तालमेल नहीं था। बाद में संघ और भाजपा की गुजरात इकाई के बीच भी तालमेल नहीं रहा। मोदी ने संघ के सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए, और जिन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया, वे या तो किनारे लग गए या बाहर कर दिए गए। जैसे, संघ में गुजरात के प्रांत प्रचारक मनमोहन वैद्य को तमिलनाडु भेज दिया गया, जहां संघ का कोई आधार नहीं था और विहिप नेता प्रवीण तोगड़िया को कहा गया कि वह राजनीति से दूर रहें।
आज इन तथ्यों को याद करने का मतलब सिर्फ एक सवाल का उत्तर जानना है-वह यह कि मोदी के साथ इतने विवादों के बावजूद, और यह जानने के बाद भी, कि वह सलाह-परामर्श की उस परंपरा में विश्वास नहीं करते, जो संघ परिवार के कामकाज का आंतरिक हिस्सा है, संघ नेतृत्व ने लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता पर विचार न कर मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की हरी झंडी क्यों दी है? जबकि वह बखूबी जानता है कि अगर सारा कुछ मोदी की योजना के अनुरूप चला, तो वह प्रधानमंत्री पद पर अपना कब्जा जमा सकते हैं? संघ ने मोदी का पूर्ण वर्चस्व क्यों स्वीकार किया, जबकि उसे पता है कि संगठन को हाशिये पर डाल देना मोदी की फितरत में है, जैसा उन्होंने गुजरात में किया!
इसका तात्कालिक उत्तर यह है कि भाजपा को एक ऐसे करिश्माई नेता की जरूरत है, जो उसे वैसा पुनर्जीवन दे सके, जैसा अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में मिला था। इसका जवाब संघ की इस अपेक्षा में भी मिल सकता है कि कौन-से भाजपा नेता उसके एजेंडे को आगे ले जा सकते हैं।
नरेंद्र मोदी ने पहली बार भाजपा के प्रधानमंत्री पद का दावेदार होने का इरादा 2011 के मध्य में सद्भावना यात्रा की शुरुआत करते हुए जताया। इस प्रक्रिया में उन्होंने आडवाणी की जनचेतना यात्रा को गुजरात में चर्चा में आने देने से भी सायास रोका। तब पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी और मोदी के रिश्ते ठीक नहीं थे। गडकरी द्वारा संजय जोशी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में लाने के फैसले को मोदी ने पसंद नहीं किया, क्योंकि इस पुराने सहयोगी से उनके रिश्ते पहले ही खराब हो चुके थे। गडकरी के इस फैसले का विरोध करते हुए उन्होंने बैठकों में भाग नहीं लिया। यह स्थिति मई, 2012 में संघ प्रमुख मोहन भागवत के हस्तक्षेप करने के बाद बदली, तब मोदी कार्यकारिणी की बैठक में शामिल हुए। संजय जोशी को भाजपा की सर्वोच्च नीति निर्धारक समिति से हटाया गया, उन्हें रेलगाड़ी से दिल्ली लौटने भी नहीं दिया गया, क्योंकि उनकी गाड़ी गुजरात होकर आती, जहां रेलवे स्टेशनों पर उनके समर्थकों के बड़ी संख्या में जुटने की आशंका थी! उसके बाद मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना तय था।
एक स्तर पर मोदी की स्वीकार्यता की वजह लोगों के बीच उनकी भारी लोकप्रियता और संघ के कार्यकर्ताओं में उनका अपार समर्थन है। उन्हें शीर्ष पद का दावेदार बनाने के लिए संघ के निचले स्तर ने भारी दबाव बनाया। अगर संघ के नेता इसका संज्ञान न लेते, तो उन्हें सामान्य कार्यकर्ताओं का विद्रोह झेलना पड़ सकता था। वाजपेयी युग के अंत के साथ अपना महत्व खो चुका संघ दोबारा राजनीति के केंद्र में आने का इच्छुक है। यह तभी संभव है, जब भाजपा को अपने सबसे करिश्माई नेता को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने को कहा जाता।
सच यह भी है कि लालकृष्ण आडवाणी के नाम पर संघ नेतृत्व और उसके कार्यकर्ता एकमत नहीं थे, जो 2012-13 में मोदी के सबसे सटीक विकल्प थे। संघ में अब यह धारणा बन गई है कि मजबूत छवि और अयोध्या आंदोलन में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका के बावजूद आडवाणी केंद्र में एनडीए सरकार के दौर में कमजोर नेता साबित हुए थे। कारगिल विवाद में खुफिया चूक, आईसी-814 अपहरण मामले में ढुलमुलपन और संसद पर हमले से पहले सुरक्षात्मक उपाय न अपना पाने का जिम्मेदार संघ नेतृत्व और कार्यकर्ता आडवाणी को मानते हैं। उनकी सोच है कि खुद को आधुनिक सरदार पटेल और लौह पुरुष बताने के बावजूद आडवाणी ने संघ की लाइन को वरीयता नहीं दी। इसके विपरीत, गुजरात में गोधरा हादसे के बाद मोदी ने संघ के एजेंडे को पुनर्जीवित किया। 2002 में संघ के समर्थन के कारण ही मोदी का मुख्यमंत्री पद बचा रहा पाया था।
संघ और उसके कार्यकर्ताओं के मुताबिक, हिंदुत्व के एजेंडे को सिर्फ मोदी ही लागू कर सकते हैं। जबकि आडवाणी और अन्य नेता दूसरी पार्टियों से समझौता करने की मानसिकता वाले हैं। यह अलग सवाल है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ऐसा ही कठोर रुख अपनाएंगे या नहीं। संघ की सर्वोच्च प्राथमिकता फिलहाल अपने राजनीतिक और सामाजिक एजेंडे को पुनर्जीवित करने की है, भले ही इस प्रक्रिया में मोदी संघ को हाशिये पर डाल दें।
(वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी- द मैन, द टाइम्स के लेखक)