{"_id":"9d4232ac0c01ecae6e3e61693f606565","slug":"why-debate-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"क्यों करें बहस","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
क्यों करें बहस
अरविंद तिवारी
Updated Tue, 27 Jan 2015 08:13 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इन दिल्ली वालों को बैठे-ठाले दिल्लगी सूझती रहती है। अब नया ‘शिगूफा’ छोड़ा है, ‘बहस कर लो'! नेता भाषण बाद में देता है, ‘बहस कर लो’ की मुनादी पहले पिटवाता है। जो बहस करना चाहता है, उससे बहस नहीं करते। जो बहस से बचना चाहते हैं, उन्हें चुनौती दी जाती है। हमारे देश की नब्बे फीसदी आबादी हरदम बहस में मशगूल रहती है! कुछ पूर्व प्रधानमंत्री टाइप के लोग चुप रहने को अपना हथियार जरूर बनाते हैं, मगर वे लोग भी बहस सुनने का पूरा आनंद लेते हैं।
विज्ञापन
गली-मोहल्ले और पान वाले पहलवान की दुकान पर जो बहस होती है, उसमें सब कुछ मूल रूप में ही दिखाई देता है। टीवी वालों की तरह एडिटिंग नहीं होती। यहां 'बीप-बीप' भी नहीं सुनाई देता। दर्शक वह सब देख लेता है, जो घट रहा होता है। ऐसी बहस पर तभी विराम लगता है, जब एक-दो लोगों की जमकर पिटाई हो जाती है। चौराहा हो या चौबारा, लोगों की आपसी ‘मुलाकात’ अंततः ‘मुक्कालात’ में तब्दील हो ही जाती है। जब पूरे देश में इसी तरह बहस-मुबाहिसा तारी है, तो आप दिल्ली के चुनाव में सार्वजनिक बहस करवाकर क्या हासिल करना चाहते हैं? मान लो आप दिल्ली में बहस के जरिये चुनाव का ‘नजरिया’ तय कर भी लें, तो क्या यूपी-बिहार में फेल नहीं हो जाएंगे? वहां तो बहस करने पर गला सिर्फ पकड़ा ही नहीं जाता, उसके कटने की भी नौबत आ जाती है!
विज्ञापन
यह ऐसा देश है, जहां सास बहू से, पत्नी पति से, बेटा बाप से, बाबू अफसर से, मरीज डॉक्टर से, इंजीनियर ठेकेदार से, कार्यकर्ता मंत्री से, छात्र शिक्षक से, संपादक रिपोर्टर से, लेखक समीक्षक से लगातार बहस ही करते रहते हैं। आदर्श पड़ोसी भी तो उन्हें माना जाता है, जो बहसरूपी 'सीज फायर' का उल्लंघन करते हैं! चूंकि हमारे यहां बहस के पैमाने काफी खतरनाक किस्म के हैं। इसलिए दिल्ली के नेताओं का हित इसी में है कि वे बहस के चक्कर में न पड़ें। देश के तमाम नेता पिछले अड़सठ वर्षों से विभिन्न सदनों में बहस ही तो करते रहे हैं, मगर परिणाम क्या निकला, यह भी भला बताने वाली बात है?
विज्ञापन