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हिंदू पाकिस्तान क्यों बनाएं? धर्म और राज्य के मेल का असफल प्रयोग, इतिहास दे रहा चेतावनी
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हिंदू पाकिस्तान क्यों बनाएं?
- फोटो :
ANI
विस्तार
देश की आजादी और विभाजन के ठीक दो महीने बाद 15 अक्तूबर, 1947 को भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रांतीय मुख्यमंत्रियों को एक चिट्ठी में लिखा था, “पाकिस्तान की ओर से चाहे जितनी उकसावे वाली कार्रवाई की गई हों और गैर-मुसलमानों के साथ चाहे जितनी भी ज्यादतियां और भयावह घटनाएं हुई हों, हमें अपने यहां अल्पसंख्यकों के साथ सभ्य समाज की तरह व्यवहार करना होगा। उन्हें लोकतांत्रिक राज्य के नागरिकों के रूप में सुरक्षा और अधिकार देना हमारी जिम्मेदारी है।”ऐसा नहीं है कि नेहरू की इस विचारधारा से कांग्रेस में सब सहमत थे। पार्टी में परंपरावादी हिंदू सोच रखने वाले लोग भी मौजूद थे। फिर भी प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जनसंघ द्वारा प्रतिनिधित्व की जाने वाली हिंदुत्ववादी ताकतों को हाशिये पर रखने की कोशिश करते रहे। नेहरू के निधन के कई दशक बाद आरएसएस और जनसंघ की उत्तराधिकारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का प्रभाव तेजी से बढ़ा। नतीजा, जो भारत 1947 के बाद अपने पड़ोसी पाकिस्तान से अलग रास्ता अपनाने की उम्मीद कर रहा था, वह आज धर्म को लेकर धीरे-धीरे पाकिस्तान की राह पर है।
गौरतलब है कि पिछले तीन आम चुनावों में भाजपा के टिकट पर चुने गए 800 से अधिक सांसदों में एक भी मुसलमान नहीं है। भाजपा ने हिंदू वोट बैंक तैयार करने की कोशिश की है और कई चुनाव केवल हिंदुओं के समर्थन के आधार पर लड़े और जीते हैं। सत्ता में आने के बाद संघ परिवार ने सामाजिक स्तर पर अपना वर्चस्व मजबूत किया है। एक समय था, जब मुसलमान महत्वपूर्ण कैबिनेट पदों पर होते थे, बड़े सरकारी विभागों का नेतृत्व करते थे (जिसमें विदेश सेवा और इंटेलिजेंस ब्यूरो जैसे संस्थान भी शामिल हैं), सुप्रीम कोर्ट और भारतीय वायु सेना के प्रमुख भी बने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य के दो शहरों से मुसलमान सांसद चुने जाते थे। आज सार्वजनिक जीवन में किसी प्रमुख पद पर मुसलमानों की मौजूदगी बेहद कम है।
हिंदू बहुसंख्यकवाद कानूनी मोर्चे पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। नागरिकता संशोधन अधिनियम और अनुच्छेद 370 का उन्मूलन इस तरह देखा गया कि जम्मू कश्मीर भारत का मुस्लिम बहुल राज्य था। प्रतीकात्मक स्तर पर यह भारत के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के भगवा कपड़ों में और नए राम मंदिर के उद्घाटन की अध्यक्षता करने वाले प्रधानमंत्री में दिखाई देता है। हमारे सबसे शक्तिशाली राजनेताओं द्वारा दिया गया यह संकेत ऐसा व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहित करता है, जैसे कि वे पहले हिंदू हों और बाद में भारतीय। हिंदुत्व ने लोकप्रिय संस्कृति में भी पैठ बना ली है।
शब्द और कर्म में कई स्तर पर भारत पाकिस्तान जैसा बनता जा रहा है। अंतर सिर्फ यह है कि वहां मुसलमान सत्ता में हैं, यहां हिंदू हैं। हिंदुत्व का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसके पड़ावों में 19वीं सदी की हिंदू धर्म प्रचारक संस्थाओं की गतिविधियां, 20वीं सदी की हिंदू महासभा और 1925 में आरएसएस की स्थापना शामिल है। जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते हिंदुत्व का प्रभाव कम रहा, लेकिन वह मौजूद हमेशा रहा। नेहरू के बाद की कांग्रेस सरकारों की गलतियों ने हिंदू दक्षिण पंथ को पनपने और फैलने का अवसर दिया। इसमें राजीव गांधी की भूमिका विशेष रूप से दोषपूर्ण मानी जाती है। प्रधानमंत्री रहते उन्होंने एक ओर शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटकर मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश करने की कोशिश की तो दूसरी ओर बाबरी मस्जिद के पास अयोध्या के एक छोटे से मंदिर के ताले खुलवाकर हिंदू कट्टरपंथियों को संतुष्ट करने का प्रयास किया। इन गलत कदमों पर उस समय पत्रकार नीरजा चौधरी ने चेतावनी दी थी कि “चुनावी लाभ के लिए सरकार द्वारा दोनों समुदायों को खुश करने की नीति एक दुष्चक्र है, जिसे तोड़ पाना आगे चलकर बेहद मुश्किल हो जाएगा।” वामपंथी सांसद सैफुद्दीन चौधरी ने तो और भी तीखे शब्दों में कहा था कि राजीव गांधी भले ही भारत को 21वीं सदी में ले जाने की बात करते हों, लेकिन उनके कामकाज से लगता है कि “उनकी सोच पिछड़ी और रूढ़िवादी है।”
नेहरू ने राजनीति से धर्म को दूर रखने की कोशिश की थी। उनके पौत्र ने उसे चालाकी और स्वार्थपूर्ण तरीके से राजनीति में शामिल कर लिया। राजीव गांधी की नीतियां आखिर में भाजपा के काम आईं। अयोध्या में राम का भव्य मंदिर बनाने के लिए देशव्यापी आंदोलन छेड़ा गया। 1984 के चुनाव में भाजपा को महज दो सीटें मिली थीं, लेकिन सवा दशक के भीतर ही वह देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की गठबंधन सरकार की मजबूरियों के कारण वह नियंत्रित रही। भाजपा के दूसरे प्रधानमंत्री को लगातार दो बार संसद में पूर्ण बहुमत मिला और तीसरी बार थोड़ा कम पड़ने पर भी उन्होंने 'हिंदू प्रथम' एजेंडे को आगे बढ़ाने में संकोच नहीं किया। नरेंद्र मोदी और अमित शाह वैचारिक रूप से कहीं अधिक प्रतिबद्ध, संगठित और दृढ़ हैं, जबकि कांग्रेस के वंशवादी नेताओं की राजनीति में रुचि अक्सर अस्थिर और मौके-मौके पर जागने वाली लगती है। नतीजतन, संघ परिवार का प्रभाव और शक्ति लगातार बढ़ती गई।
कुल मिलाकर, 2026 का भारत पहले से कहीं अधिक ‘हिंदू पाकिस्तान’ बनने के करीब पहुंच गया है। क्या इस प्रवृत्ति को पलटा जा सकता है और भविष्य में एक धर्मनिरपेक्ष, गैर-सांप्रदायिक राज्य को फिर से मजबूत किया जा सकता है? इसका सीधा जवाब देना मुश्किल है। लेकिन दूसरे देशों के अनुभवों को देखें तो यह दिखता है कि धर्म और राज्य के मेल का प्रयोग कहीं भी सफल नहीं रहा है। पाकिस्तान में इस्लाम को राष्ट्रीय पहचान के केंद्र में रखने से उसके आर्थिक और राजनीतिक भविष्य को भारी नुकसान पहुंचा। जिन धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर बांग्लादेश की स्थापना हुई थी, उनसे हटना उसे लगातार कमजोर कर रहा है। ईरान के पास विकसित देश बनने की पूरी आर्थिक और सांस्कृतिक क्षमता थी, लेकिन 1979 में सत्ता में आए कट्टरपंथी अयातुल्ला ने उस संभावना और महत्वाकांक्षा को खत्म कर दिया।
यह समस्या केवल इस्लामी देशों तक सीमित नहीं है। 1970 के दशक में शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और विकास के अन्य पैमानों पर श्रीलंका भारत से काफी आगे था। अगर सिंहली-बौद्ध कट्टर राष्ट्रवाद का उभार और उससे भड़की गृह युद्ध की आग न होती तो कोलंबो और कैंडी भी बंगलूरू तथा हैदराबाद की तरह आईटी क्रांति के बड़े केंद्र बन सकते थे। इसी तरह इस्राइल भी आधुनिक यहूदी धर्म की सबसे प्रतिक्रियावादी प्रवृत्तियों के कारण हुए युद्ध अपराधों के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ता जा रहा है। किसी देश की सार्वजनिक पहचान को बहुसंख्यक धर्म के इर्द-गिर्द गढ़ना और कानून, नीतियां तथा संस्थान मुल्लाओं, पादरियों, भिक्षुओं या रब्बियों की इच्छाओं के अनुसार चलाना हर तरह के देशों में विनाशकारी साबित हुआ है।