नौकरशाही जन विरोधी क्यों है
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सिविल सेवा दिवस पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौकरशाहों से आह्वान किया कि वे ‘युवा मित्र दिवस’ मनाएं, और उस दिन महाविद्यालयों में जाकर विद्यार्थियों को बताएं कि उन्होंने अन्य नौकरियों के बजाय इसका चयन क्यों किया। प्रधानमंत्री को सुनकर पूर्व आईसीएस अधिकारी पेंडरेल मून याद आ जाते हैं, जिनकी चर्चित पुस्तक ‘स्ट्रेंजर्स इन इंडिया’ में लिखा है कि आईसीएस अधिकारी ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रों को आईसीएस अधिकारी बनने के लिए प्रेरित करते थे। वे सम्मोहक तस्वीर पेश करते थे कि किस तरह इस नौकरी में पैसा और रुतबा है। वे उन्हें भारत आकर देखने को कहते थे कि कलक्टर कितने बड़े बंगले में ठाट-बाट से राजा की तरह रहता है।
दरअसल, अंग्रेजों ने राजस्व वसूली के लिए कलक्टर और लोगों को नियंत्रण में रखने के लिए जिला दंडाधिकारी (डीएम) का पद बनाया, और फिर बाद में दोनों पदों को मिला दिया। तब प्रशासन जन विरोधी था, जिसे भारत के माल-असबाब को लूटकर ब्रिटेन ले जाना था। मगर आजादी के बाद भी हमने उस पूरे औपनिवेशिक ढांचे को हूबहू अपना लिया। वैसे नौकरशाह भी बड़े-बड़े पदों पर आसीन हो गए, जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध षड्यंत्र किया था। मसलन, जब गांधी जी पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने के लिए वाशिंगटन में रूजवेल्ट तथा विंस्टन चर्चिल के बीठ बैठक हुई, तो उसमें आईसीएस अधिकारी सर गिरिजा शंकर बाजपेयी भी शामिल थे, जिन्हें आजादी के बाद विदेश मंत्रालय में सेक्रेटरी जनरल बनाया गया। इसी तरह, अंग्रेजों के प्रति वफादार अधिकारियों के बारे में सरदार वल्लभभाई पटेल का मानना था कि 'अब वे स्वदेशी सरकार के प्रति वफादार होंगे, क्योंकि उनकी वफादारी सरकार के प्रति थी, अंग्रेजों के प्रति नहीं'।
इसी का नतीजा है कि प्रशासन का शासन वाला चरित्र कायम है। कलक्टर ठाट-बाट से शासन करते रहे। उनके लिए बड़े सरकारी बंगले, गाड़ियां, चपरासियों की फौज एवं अन्य सुविधाएं मौजूद रहीं। ऐसे मे भला गरीब, भूखी जनता के साथ उनका आत्मसात कैसे होता? हालांकि जवाहरलाल नेहरू ने नौकरशाही के असली चरित्र को समझ लिया था। इसलिए उन्होंने सामुदायिक विकास कार्यक्रम शुरू किया था, जिसमें सरकार के विस्तार अधिकारी गांव जाकर लोगों के साथ पेड़ के नीचे बैठकर विकास पर उनकी राय लेते थे। किंतु दो-तीन जिलों से आगे यह कार्यक्रम बढ़ नहीं पाया। 1959 में शुरू हुई पंचायती राज का भी नौकरशाहों एवं सांसदों-विधायकों ने विरोध किया।
आज नौकरशाही का चरित्र ऐसा है कि सरकार सबसे बड़ी मुकदमेबाज बन गई है। कर्मचारियों/अधिकारियों के ऐसे कई वर्ग हैं, जिन्हें पूरे सेवा काल में एक भी प्रोन्नति नहीं मिलती। अगर वे केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) से मुकदमा जीतते हैं, तो सरकार उच्च न्यायालय में अपील कर स्थगन लेती रहती है। उच्च न्यायालय में भी हारने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जाती है। यदि आज पूरे देश में नक्सलवाद और आतंकवाद फैल रहा है, तो प्रशासन का जन-विरोधी चरित्र काफी हद तक इसका जिम्मेदार है। लिहाजा यदि प्रशासन की जड़ता को मोदी तोड़ पाने में सफल होते हैं, तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।
-लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार एवं स्तंभकार हैं