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बारिश में क्यों डूब रहे शहर? कचरा प्रबंधन की कमजोरी से बढ़ रहा जलभराव का संकट
Thu, 27 Aug 2026 06:33 AM IST
Devesh Tripathi
सृष्टि मिश्रा, रिसर्च एनालिस्ट, सीईईडब्ल्यू
सृष्टि मिश्रा, रिसर्च एनालिस्ट, सीईईडब्ल्यू
Published by: Devesh Tripathi
Updated Thu, 27 Aug 2026 06:33 AM IST
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बारिश में क्यों डूब रहे शहर?
- फोटो :
ANI
विस्तार
मानसून ने फिर बता दिया कि भारी बारिश के सामने हमारे शहर कितने कमजोर हैं। कई शहर भारी बारिश के बाद सड़कों पर बाढ़ और जलजमाव की समस्या से जूझ रहे हैं। इस समस्या को गहराई से देखने पर इसके पीछे कचरा प्रबंधन की नाकामी साफ नजर आती है।हर मानसून में योजनाओं की कमियों और अधूरी तैयारियों के चलते शहरों में जलभराव, ट्रैफिक जाम और मोहल्लों में बाधित आवागमन जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। सड़कों और सर्विस लेन के किनारे डाला जाने वाला कचरा वर्षा जल निकासी के नालों में चला जाता है, जिससे उनकी जल निकासी क्षमता घटती है, बारिश के पानी का बहाव रुकता है, और अस्वास्थ्यकर स्थितियां पैदा होती हैं। मसलन, हैदराबाद में हैदराबाद डिजास्टर रिस्पॉन्स एंड असेट प्रोटेक्शन एजेंसी (हाइड्रा) ने बारिश के पानी की निकासी वाले नालों से 13 ट्रक कचरा निकाला।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, भारत में रोजाना 1,70,900 टन शहरी ठोस कचरा निकलता है। इसमें से 61 फीसदी की प्रोसेसिंग होती है, 22 फीसदी हिस्सा लैंडफिल में जाता है, जबकि 17 प्रतिशत कचरे का लेखा-जोखा ही नहीं मिल पाता है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वॉयरन्मेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के मुताबिक, जो कचरा आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाता, उसका बड़ा हिस्सा खुले में फेंक दिया जाता है। यह कचरा धीरे-धीरे जलस्रोतों और बारिश के पानी की निकासी वाले नालों में पहुंच जाता है। मानसून से पहले इन नालों की सफाई न होने के कारण उनकी जल निकासी क्षमता कम हो जाती है और जलभराव की समस्या बढ़ जाती है। यह समस्या बुनियादी ढांचे के डिजाइन में कमी के कारण और भी बढ़ जाती है।
शहरी जल निकासी तंत्र आमतौर पर सिर्फ 12 से 20 मिमी प्रति घंटे की तीव्रता वाली बारिश को संभाल पाते हैं। लेकिन, अब शहरों में कम समय में बहुत तेज बारिश हो रही है, जो इनकी क्षमता से कहीं अधिक है। सीईईडब्ल्यू के एक शोध में सामने आया है कि द्विवर्षीय पुनरावृत्ति अवधि वाली बारिश की घटनाओं में महाराष्ट्र के ठाणे और गुजरात के नवसारी शहरों में 55 से लेकर 60 मिलीमीटर प्रति घंटे की तीव्रता की बारिश दर्ज की गई। यह चुनौती तब और गंभीर हो जाती है, जब कचरा प्रसंस्करण की व्यवस्था पर्याप्त न हो। ऐसे में कुछ कदम उठाने जरूरी हैं।
पहला, शहरी स्थानीय निकायों को जल निकासी व्यवस्था और रोजमर्रा के संचालन की योजना बनाते समय वार्ड स्तर पर बारिश और कचरे से जुड़े आंकड़ों का एकसाथ विश्लेषण करना होगा। इससे योजना निर्माण के लिए पुराने औसत आंकड़ों की तुलना में एक सशक्त आधार मिलता है। दूसरा, शहरी स्थानीय निकायों को बारिश के बदलते पैटर्न को ध्यान में रखकर नालों की सफाई के समय में बदलाव करना होगा। इसके अलावा, स्वच्छता, जल-निकासी और सीवरेज जैसे विभिन्न विभागों के बीच तालमेल को औपचारिक रूप देना चाहिए। इधर-उधर कचरा फेंकने पर सख्ती किए बगैर सिर्फ नालों की सफाई करके शहरी बाढ़ नहीं रोकी जा सकती है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में वर्षा जल निकासी के नालों में सीवेज का प्रवाह रोकने, खुले में कचरा फेंकने पर जुर्माने को सख्त बनाने और नागरिक जिम्मेदारियों के प्रति जन-जागरूकता को बढ़ाने पर जोर दिया है। तीसरा, शहरों को एकीकृत जल निकासी व कचरा प्रबंधन ढांचे में निवेश करना होगा। यानी, बाढ़ के जोखिम वाले इलाकों में जीरो-वेस्ट योजनाओं के साथ वर्षा जल निकासी के ढांचे को विस्तार देना चाहिए।
अंत में, शहरों को शुरू में ही कचरे को नालों में जाने से रोकना होगा। कचरा पकड़ने वाले जाल (डेब्रिस ट्रैप्स), स्क्रीन और ट्रैश रैक जैसे कम लागत वाले उपकरण कचरे को नालों में जाने से रोक सकते हैं। केरल के अलाप्पुझा की ‘कैनालपी’ पहल मोहल्ला स्तर पर कचरा रोकने वाली स्क्रीन और विकेंद्रीकृत घरेलू कचरा प्रबंधन के जरिये प्लास्टिक को नहरों तक पहुंचने से रोकती है। वहीं, सिंगल-यूज प्लास्टिक पर रोक से नाले जाम होने की समस्या भी घट सकती है। यानी कचरे को स्रोत और जल निकासी, दोनों स्तरों पर रोककर बाढ़ और नालों की सफाई का खर्च कम किया जा सकता है।
अगर कचरा प्रबंधन सही नहीं है, तो कोई भी शहर सिर्फ बड़े नाले बनाकर भी बाढ़ की समस्या नहीं सुलझा सकते हैं। इसलिए, जलवायु परिवर्तन के कारण जिस तरह से बारिश की तीव्रता बढ़ रही है, कचरा प्रबंधन को एक जरूरी जलवायु अनुकूलन बुनियादी ढांचा मानना चाहिए। अब बाढ़ से वही शहर सुरक्षित रह पाएंगे, जो बारिश आने से काफी पहले से अपने कचरे को नालों में जाने से रोक पाएंगे।
-साथ में, कार्तिकेय चतुर्वेदी, प्रोग्राम एसोसिएट, सीईईडब्ल्यू