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किसका हित चाहती है सरकार

Wed, 14 Dec 2016 07:20 PM IST
महक सिंह
महक सिंह Updated Wed, 14 Dec 2016 07:20 PM IST
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Whose interest the government wants
महक सिंह

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में 'जय जवान और जय किसान' का नारा दिया जाता है। किसानों ने गेहूं तथा अन्य अनाजों के उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बनाया है। किसानों के बेटे सीमा पर देश की रक्षा कर रहे हैं। लेकिन खेद है कि अन्नदाता को उनके उत्पादों का लाभकारी मूल्य भी नहीं दिया जाता, उल्टे विदेशों से अनाज आयात कर उनका घोर उत्पीड़न किया जा रहा है।

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लगता है, केंद्र सरकार गेहूं उत्पादक किसानों के उत्पीड़न पर उतर आई है। एक ओर सरकार ने वर्ष 2016-17 के लिए गेहूं के समर्थन मूल्य में मात्र 100 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि करके 1,625 रुपये प्रति क्विंटल भाव घोषित किया है, वहीं समर्थन मूल्य बढ़ाने में उत्पादन लागत में हुई बढ़ोतरी का भी ध्यान नहीं रखा है, जो अभी 2,100 रुपये प्रति क्विंटल है। विडंबना यह है कि वर्ष 2015-16 में देश के घरेलू आवश्यकता से भी अधिक उत्पादन होने और देश के गोदामों में 2.8 करोड़ टन का बफर स्टॉक होने के बावजूद गत सितंबर में आयात शुल्क 25 प्रतिशत से घटाकर 10 फीसदी किया गया था, जिसे अब पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
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सरकार दावा कर रही है कि वर्तमान रबी मौसम में गेहूं की बोआई का क्षेत्रफल बढ़ा है। सरकारी अनुमान के अनुसार, अब तक पिछले वर्ष से 12 प्रतिशत अधिक 225 लाख 63 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में गेहूं की फसल बोई जा चुकी है। गेंहू का वर्तमान स्टॉक भी 2.02 करोड़ टन से अधिक है। तो फिर किन कारणों से केंद्र सरकार ने गेहूं पर आयात शुल्क घटाकर उसे शून्य कर दिया है और अब रूस व यूक्रेन से 12 लाख टन गेहूं आयात कर रही है।
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गेहूं का यह आयात फरवरी-मार्च में होने की संभावना है। उसी समय देश में गेहूं की फसल पकती है। इससे देश में गेहूं के मूल्य में कमी आएगी और किसान सस्ते में अपनी फसल बेचने को मजबूर होंगे। इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होगा, क्योंकि वे व्यापारियों से गेहूं न खरीदकर विदेशों से गेहूं का आयात कर लेंगी। सरकार के इस फैसले से किसान हैरान और परेशान हैं। मौजूदा केंद्र सरकार किसान हितैषी होने का दावा करती है और भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र में और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में यह दावा किया जाता रहा है कि किसानों को उनकी फसलों की उत्पादन लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिया जाएगा। यह भी दावा किया गया कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। क्या किसानों को सरकारी कर्मचारियों, विधायकों, सांसदों और गैर कृषि उत्पादों के बढ़ते मूल्यों के अनुपात से कम समर्थन मूल्य देकर किसानों का हित किया जा रहा है? सर्वोच्च न्यायालय में तो देश के अटार्नी जनरल ने तो डेढ़ गुना समर्थन मूल्य देने को असंभव और चुनावी जुमला कहकर नकार दिया था। सरकार के इस फैसले से भविष्य में गेहूं उत्पादक किसानों की बर्बादी की भयावह तस्वीर नजर आ रही है।


गैर कृषि उत्पादों के लगातार बढ़ते मूल्यों के चलते एक उपभोक्ता के रूप में भी किसान दोहरी मार झेल रहे हैं। गन्ना मूल्य का भुगतान न होने से किसान पहले ही पीड़ित थे, अब नोटबंदी तथा गेहूं पर आयात शुल्क खत्म करके सरकार उसका और उत्पीड़न कर रही है। यदि केंद्र सरकार का रवैया नहीं बदला, तो किसान खेती छोड़ने को मजबूर होंगे। लगता है कि सरकार की मंशा भी यही है।

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