जिसे भी मिला, देर से मिला
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पुरस्कारों के साथ यही शिकायत रहती है कि वह कभी सही आदमी को नहीं मिलता, और अगर मिल भी जाए, तो सही समय पर नहीं मिलता। भले यह बात पुरस्कार हासिल करने वाले को न अखर रही हो, मगर प्रतिक्रियावादी तो पहली बात यही कहते हैं कि पुरस्कार मिला, यह तो ठीक है, मगर यह बहुत देर से मिला। अगर आप उनसे पूछ लें कि पुरस्कार आखिर कब मिल जाना चाहिए था, तब इनके पास कोई जवाब नहीं होगा। तब वे यह कहकर ही पिंड छुड़ा लेंगे कि इतनी देर से तो नहीं मिलना चाहिए था। जीते-जी मिलने वाले पुरस्कारों की यही फजीहत है कि ये कभी किसी को समय पर नहीं मिलते हैं। यहां तक कि लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड भी लोग चाहते हैं कि खेलने-खाने की उम्र में ही उन्हें दे दिया जाए।
किसी ने ठीक से लिखना भी शुरू नहीं किया है, अगर उसे भी पुरस्कार दे दिया जाए, तो ये चुप नहीं रहने वाले और यही कहेंगे कि देर से मिला पुरस्कार है। तो क्या, जब मां की गोद में खेल रहे थे, तभी पुरस्कार दे दिया जाता, तो सही समय पर मिलता! ऐसे भी हादसे हुए हैं कि लेने वाले ने तो कोई शिकायत नहीं की, मगर जिन्हें मिलने की उम्मीद थी, वे यह कहने से बाज नहीं आते हैं कि देर से मिला। अब पुरस्कार पाने वाला तो इसी ऊहापोह में रहता है कि पाने की खुशी मनाए या देर से पाने का रंज करे।
यहां अच्छे और बुरे काम की कोई बात नहीं करता है। हो सकता है, उम्र के पकने पर जो अनुभव की फसल आई है, उसी के नतीजे में पुरस्कार मिला है, मगर यहां भी वही अपनी डेढ़ टांग कि पुरस्कार देर से मिला। अगर आम को श्रेष्ठ आम का पुरस्कार मिल जाए, तो दुखी होने वाले यहां भी कह दें कि यह पुरस्कार तो उसे बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था। तो क्या कैरी को श्रेष्ठ आम का इनाम दे दिया जाए? कहीं इस स्थायी शिकायत का मतलब यह तो नहीं है कि लोग कम उम्र में ही पुरस्कार से लद जाएं, ताकि पके हुए लोगों के लिए रास्ता खुला रहे। यदि आज उन्हें नहीं मिला होता, तो अपना नंबर पक्का था।