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यहां हिंसा रोकना कौन चाहता है
Updated Thu, 07 Mar 2013 09:52 PM IST
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उत्तर प्रदेश के कुंडा क्षेत्र के एक प्रधान और उसके भाई की हत्या के बाद इलाके के डीएसपी जियाउल हक को मार डालने और उनके वर्दीधारी पुलिस दल के साथियों का उनकी हत्या के पहले ही मौके से गायब हो जाने, शहीद की पत्नी द्वारा मंत्री रघुराज प्रताप सिंह को षड्यंत्रकारी बताने और राजा समर्थित नगर पंचायत कुंडा के अध्यक्ष सहित जनसंपर्क अधिकारी तथा ड्राइवर का नाम अपराधियों में शामिल होने के बाद तो इस मामले में राजनीतिक उबाल आना ही था।
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यही कारण है कि विधानसभा में पूर्ण बहुमत की सरकार के बावजूद कोई ऐसा दल नहीं था, जो सरकार से इस्तीफे की मांग करने और सरकार बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग में पीछे रहा हो। शहीद पुलिस अधिकारी की पत्नी ने जब न्याय मांगने लिए मुख्यमंत्री को अंतिम संस्कार के पूर्व अपने गांव पहुंचने की मांग की, तो वहां भारी भीड़ इकट्ठा थी, लेकिन उसमें राजनीतिक लाभ उठाने वाले ही अधिक थे। मुख्यमंत्री शोक संतप्त परिवार के घर न पहुंच सकें, इसके लिए उन्हें रोकने का अभियान भी चला।
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जहां तक उत्तर प्रदेश में होने वाले दंगों और आपराधिक घटनाओं का संबंध है, तो सरकार भी यह स्वीकार करती है कि इनसे राज्य को मुक्ति नहीं मिल पाई है। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा प्रांत है। लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट को आधार माना जाए, तो यह सर्वाधिक अपराधों वाले प्रदेशों में नहीं है। पर इसी कारण राज्य में बढ़ते अपराधों का बचाव नहीं किया जा सकता।
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कुंडा वस्तुतः प्रतापगढ़ (अवध) की एक रियासत था। स्वतंत्रता आंदोलन में कालाकांकर और भदरी रियासतों का जिक्र आता है। कालाकांकर से ही देश का पहला हिंदी दैनिक हिन्दुस्थान के नाम से महामना मदन मोहन मालवीय के संपादकत्व में उस रियासत द्वारा निकाला गया था। कालाकांकर गांधी जी और नेहरू जी की प्रिय स्थली रहा है। जबकि भदरी के राजा बजरंग बहादुर भी स्वतंत्रता सेनानी होने के नाते हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल और एक विश्वविद्यालय के कुलपति मनोनीत हुए थे। लेकिन पिछले लगभग 25 वर्षों से भदरी और बैंती रियासतें एक होने के फलस्वरूप कुंडा क्षेत्र खास तौर पर कुख्यात हुआ।
उदय प्रताप सिंह और उनके पुत्र रघुराज प्रताप सिंह यानी राजा भैया काफी चर्चा में रहे हैं। एक मुख्यमंत्री ने उन्हें ‘कुंडा के गुंडा’ की संज्ञा दी थी। यह बात अलग है कि बाद में उन्होंने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में भी सम्मान दिया था। पिछले चुनाव में रघुराज प्रताप सिंह सपा के सहयोगी तो थे, लेकिन वे पूर्व की भांति निर्दल के रूप में ही चुनाव लड़े और जीते। कहा तो यह भी जाता है कि इस परिवार के आतंक से प्रतापगढ़ जिले के अधिकारी भी परे नहीं।
उत्तर प्रदेश में जब पहली बार सपा को पूर्ण बहुमत मिला और मुलायम सिंह ने बेटे को सत्ता सौंपी, तो उससे उनके सहयोगी और विरोधी का चिंतित होना स्वाभाविक था। मुलायम सिंह की राजनीति का मुख्य आधार पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक ही हैं। सरकार बनने के बाद राज्य में जो सांप्रदायिक दंगे हुए हैं, उनका उद्देश्य इस रूप में राजनीतिक बताया जाता है कि अल्पसंख्यकों में अविश्वास की भावना फैलेगी और पिछड़ा वर्ग भी खुद को सुरक्षित नहीं मानेगा।
इस तरह बढ़ते हुए सांप्रदायिक तनाव और दंगे एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में प्रयुक्त हो रहे थे, जिनका नुकसान सत्तारूढ़ दल को ही उठाना था। दरअसल उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को स्वीकार कर पाना उस वर्ग के गले कभी नहीं उतरता, जो सदियों से सत्ता में रहा है और सरकारी सेवाओं में भी जिसका वर्चस्व है। इसलिए सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं बेशक सपा को राजनीतिक रूप से कमजोर करने में सहायक होंगी, लेकिन सांप्रदायिक सोच तो सबसे अधिक सुरक्षा बलों और नौकरशाही में ही है।
आदिवासियों और दलितों की पदोन्नति में आरक्षण का विरोध करके सपा ने उन्हें भी विरोधियों में शामिल कर लिया है। सपा ने कांग्रेस को समय-समय पर राजनीतिक रूप से बचाया है, पर कांग्रेस में भी सवर्ण मानसिकता और उसकी स्वीकार्यता ही ज्यादा है। इसलिए ज्यो-ज्यों लोकसभा के चुनाव नजदीक आते जाएंगे, वैसे-वैसे विरोध के विभिन्न उपायों में अपराधजनित घटनाओं को रोका नहीं जा सकेगा।