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चुनाव सुधार कौन चाहता है
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वीवीपैट
पिछले दिनों लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी करते हुए चुनाव आयोग ने जो कदम उठाए, उन्हें साफ-सुथरे चुनाव की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है। यह बात सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? बताया गया कि सोशल मीडिया पर प्रचार को अब प्रत्याशी के चुनाव खर्च से जोड़ा जाएगा। पर जब इसी बात का पता नहीं चल पाता कि उम्मीदवार ने चुनाव में में कितना खर्च किया है, तब फिर सोशल मीडिया पर होने वाले खर्च प्रत्याशी के खर्च से जोड़ने की घोषणा से वास्तविक तौर पर क्या फर्क पड़ जाएगा?
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एक उदाहरण से स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी। हमारी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में 6,753 उम्मीदवारों के शपथपत्र का गहराई से विश्लेषण किया। उसमें हमने पाया कि सिर्फ चार प्रत्याशियों ने ही चुनावी खर्च की तय सीमा से अधिक खर्च करने की बात स्वीकारी थी। जबकि तीस प्रत्याशियों ने कहा था कि उन्होंने तय खर्च सीमा के 90-95 प्रतिशत तक खर्च किया। शेष प्रत्याशियों ने-जो कुल 6,753 उम्मीदवारों का 99.99 प्रतिशत होते हैं-बताया कि उन्होंने तय खर्च सीमा का आधा ही खर्च किया। जिस दौर में चुनाव में अंधाधुंध खर्च होता है, उस दौर में चुनाव लड़ने वाले ज्यादातर उम्मीदवार अगर कहें कि उन्होंने तय सीमा का आधा ही खर्च किया है, तो इस पर कौन विश्वास करेगा? एक तरफ तो उम्मीदवार शपथपत्र में तय खर्च सीमा का आधा ही खर्च करने की बात स्वीकारते हैं, दूसरी ओर, चुनावी खर्च की सीमा बढ़ाए जाने की भी उनकी ओर से लगातार मांग की जाती है! जाहिर है, शपथ पत्र में वे झूठी और आधी-अधूरी जानकारियां देते हैं।
यहां मैं एक राष्ट्रीय पार्टी के एक दिवंगत नेता का जिक्र करना चाहूंगा। एक बार उन्होंने स्वीकारा था कि पिछले चुनाव में उन्होंने आठ करोड़ रुपये खर्च किए। जबकि शपथपत्र में उन्होंने 19 लाख रुपये खर्च करने की बात कही थी। वह एक बड़े नेता थे। यानी चुनावी खर्च के मामले में सच्चाई और पारदर्शिता का अभाव हर पार्टी में दिखाई देता है। चूंकि इलेक्टोरल बांड के आने से भी पारदर्शिता नहीं आई है, इसलिए इस नए कदम से भी बहुत उम्मीद नहीं है।
ऐसे ही सभी ईवीएम को वीवीपैट से जोड़ने को भी एक महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है। पर उससे भी महत्वपूर्ण सवाल है कि कितने वीवीपैट की गिनती की जाएगी। सौ फीसदी वीवीपैट की गिनती का तो मतलब ही नहीं है, क्योंकि उससे ईवीएम के इस्तेमाल का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। जबकि बहुत कम वीवीपैट की गिनती से-जैसा कि अभी संभवतः एक फीसदी वीवीपैट की ही गिनती होती है-संदेह बने रहेंगे। 21 विपक्षी दलों ने 50 फीसदी वीवीपैट की गिनती की मांग की है, जबकि बताया जाता है कि चुनाव आयोग 30 फीसदी वीवीपैट की गिनती करने के लिए भी राजी नहीं है। सवाल यह है कि वीवीपैट की गिनती का सैंपल साइज क्या होना चाहिए। चुनाव आयोग ने भारतीय सांख्यिकी संस्थान (इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट) से इस बारे में सलाह मांगी है, पर उसका जवाब अभी तक नहीं आया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है, और 25 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई के समय चुनाव आयोग के एक अधिकारी को अदालत में मौजूद रहने के लिए कहा है। चुनाव के समय इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुस्ती ठीक नहीं।
सात चरणों में होने जा रहे मतदान पर भी सवाल हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था बहाल करने के कारण ऐसा करना पड़ता है। संविधान का अनुच्छेद 324 स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जाने की बात करता है। पर यहां तो बंदूक के साये में चुनाव होते हैं। चुनाव को लोकतंत्र का पर्व बताते हुए हम नहीं थकते। पर वास्तविक तौर पर देखें, तो हमारे यहां लोकतंत्र तो है ही नहीं। हम यह कहते हुए नहीं थकते कि जनता ही जर्नादन है, वही सब कुछ तय करती है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? क्या अपने इलाके से उम्मीदवारों के चयन में उसकी कोई भूमिका है? मतदाता तो उन्हीं प्रत्याशियों में से किसी एक को चुनते हैं, जिन्हें राजनीतिक दल चुनाव मैदान में उतारते हैं। इस तरह मतदाताओं के चयन के विकल्प को तो राजनीतिक पार्टियां ही खत्म कर देती हैं। यानी मतदाता स्वतंत्र नहीं हैं। ऐसे ही सांसद और विधायक भी स्वतंत्र नहीं होते। वे भी अपनी पार्टियों से बंधे होते हैं। अगर वे पार्टी के रुख से अलग हटकर किसी विधेयक का समर्थन या विरोध करना चाहें, तो पार्टी व्हिप से उनकी सदस्यता चली जा सकती है।
इस दृष्टि से विचार करें, तो हमारा लोकतंत्र खोखला लोकतंत्र है। हम चुनाव को लोकतंत्र का पर्व कहते हैं, पर यह एक दिखावा ही है। चुनाव आयोग की सक्रियता की बहुत बातें की जाती हैं। लेकिन चुनाव आयोग के पास कोई कानूनी ताकत ही नहीं है। राजनीति को अपराधियों से दूर करने और चुनाव को साफ-सुथरा और पारदर्शी बनाने के लिए चुनाव आयोग बहुत बार सक्रिय हुई। लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने सुनियोजित ढंग से चुनाव आयोग के आदेशों और सुझावों पर चुप्पी साध ली। इस मामले में तमाम राजनीतिक दल एक हैं। अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधियों की आय और संपत्ति में अप्रत्याशित बढ़ोतरी की निगरानी के लिए स्थायी तंत्र गठित न करने के कारण केंद्र सरकार को दो सप्ताह में जवाब देने के लिए कहा है, यह एक और उदाहरण है कि खुद राजनीतिक दल ही राजनीति में शुचिता और ईमानदारी लाने के पक्ष में नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल फरवरी में जनप्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कुछ आदेश दिए थे, जिनमें से कुछ पर ही सरकार ने अमल किया है। ऐसे में, चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए कदमों के आधार पर परिदृश्य बदल जाने की उम्मीद करना भोलापन ही है।
-लेखक एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के सह-संस्थापक हैं।