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किसने बोला बनाम क्या बोला: किसी को गिराना ईमानदारी नहीं है… गलती करने वाले की समान भाव से आलोचना हो

Sat, 24 May 2025 08:45 AM IST
Balbir Punj बलबीर पुंज
Updated Sat, 24 May 2025 08:45 AM IST
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सार
चुनिंदा ढंग से समान चीजों के लिए किसी को उठाना और किसी को गिराना ईमानदारी नहीं है और इससे बहस दूसरी दिशा में चली जाती है। होना तो यह चाहिए कि जिसने भी गलती की हो, उसकी समान भाव से आलोचना हो, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हमारा ध्यान ‘किसने बोला’ के बजाय ‘क्या बोला’ पर केंद्रित हो।
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Who said vs what Putting someone down is not honesty criticize person who makes mistake in same way
गलती करने वाले की समान भाव से आलोचना हो (प्रतीकात्मक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

यदि एक कुख्यात सोवियत उक्ति को यूं बदल दें, ‘आप मुझे चेहरा दिखाओ, मैं आपको कानून दिखा दूंगा’, तो यह भारत में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ से संबंधित घटनाक्रम पर पूर्णतः सटीक बैठेगी। अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद और मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कुंवर विजय शाह-दोनों ने कर्नल सोफिया कुरैशी पर अपमानजनक बयान दिए। परंतु विरोध का स्वर एकसमान नहीं है, जो गुट विजय शाह को बर्खास्त करने की मांग कर रहा है, वही अली के पक्ष में खड़ा है। यही दोहरापन 2022 में नूपुर शर्मा के मामले में भी सामने आया था। वास्तव में, इस कथित उदारवादी बुद्धिजीवी वर्ग की निष्ठा ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ या लोकतांत्रिक मूल्यों से नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक निष्ठा से निर्देशित होती है। इनके लिए अपराध या नैतिकता व्यक्ति की मजहबी, जातिगत और राजनीतिक पहचान से तय होती है-न कि आरोपी के कृत्य से।


विजय शाह का इस्तीफा मांगने वाले कांग्रेसी प्रवक्ता पवन खेड़ा के लिए अली का विवादित पोस्ट ‘विचारशील’ है। उनके अनुसार, ‘अली की एकमात्र गलती यह है कि उन्होंने यह पोस्ट लिखी...दूसरी गलती उनका नाम है।’ यहां खेड़ा अली के मुस्लिम होने का संकेत दे रहे हैं। क्या यह सच नहीं कि कांग्रेस, वामपंथी, तृणमूल और अन्य कई स्वघोषित बुद्धिजीवी अली का समर्थन केवल उनकी मजहबी पहचान के कारण ही कर रहे हैं? उनका ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ से कोई भी सरोकार अपने राजनीतिक हितों और विचारधारा की सेवा का एक आवरण मात्र है।



अली खान महमूदाबाद, विजय शाह और नूपुर शर्मा-तीनों का उनकी पहचान के आधार पर समर्थन या विरोध हो रहा है। अली खान सामंतवादी जागीरदार परिवार से हैं। इसके बावजूद वह ‘समाजवादी’ हैं। वर्ष 2019-22 के बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुके हैं। दो दशक पहले उनके परिवार की संपत्ति 50 हजार करोड़ रुपये आंकी गई थी। इस खानदान के कई राजनीतिक-वैचारिक अवतार रहे हैं। अली के पिता मोहम्मद अमीर
मोहम्मद खान दो बार उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के विधायक थे। महमूदाबाद परिवार की जड़ें भारत में हैं, परंतु उनका पाकिस्तान से प्रेम भी गहरा है। अली के दादा मोहम्मद अमीर अहमद खान मुस्लिम लीग के प्रमुख सदस्य, खजांची और मोहम्मद अली जिन्ना के करीबी थे। विभाजन के बाद उन्होंने पाकिस्तान की नागरिकता स्वीकारी। अली के परदादा मोहम्मद अली मोहम्मद खान उस अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पहले कुलपति थे, जिसने भारत के विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण में महती भूमिका निभाई। आज इस वंश के लख्त-ए-जिगर अली हरियाणा स्थित अशोका विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं, जबकि उनके पूर्वजों के पाकिस्तान आंदोलन में योगदान के कारण कराची में एक क्षेत्र का नाम ‘महमूदाबाद’ रखा गया है, और उनके सम्मान में पाकिस्तान द्वारा 1990 में एक डाक टिकट भी जारी किया जा चुका है। राजनीतिक लोकाचार की भाषा में महमूदाबाद परिवार को ‘सेकुलर’ कह सकते हैं।

कुंवर विजय शाह की पहचान क्या है, जो अपने बड़बोलेपन के कारण संकट में हैं। वह 1990 से लगातार आठ बार के विधायक हैं। राजगोंड आदिवासी समाज से आते हैं। चूंकि कुंवर विजय भाजपा से हैं, इसलिए वह एक राजनीतिक-वैचारिक वर्ग (कांग्रेस-वामपंथी सहित) के लिए घोषित ‘सांप्रदायिक’ हैं और उनकी एक भी गलती ‘माफी’ योग्य नहीं है। नूपुर शर्मा की पहचान भी कमोबेश यही है और उनका मामला इस पक्षपात को और अधिक स्पष्ट करता है। निष्कासन से पहले वह भी भाजपा की मुखर सदस्य थीं। मई 2022 में एक न्यूज चैनल की बहस में नूपुर ने उकसावे पर उन्हीं बातों को दोहराया, जिसका उल्लेख अक्सर मुल्ला-मौलवी और जाकिर नाइक जैसे विवादित इस्लामी विद्वान अपनी तकरीरों में करते हैं। फिर भी नूपुर को सांप्रदायिक घोषित कर दिया गया। कई खाड़ी-मध्यपूर्व देशों में भारत-विरोधी प्रस्ताव पारित हुए। इस्लामी संगठनों ने नूपुर के खिलाफ फतवे जारी कर दिए।

देश में मजहबी उन्माद की लहर दौड़ गई। तब सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें देश के कुछ क्षेत्रों में फैली अराजकता, यहां तक कि उदयपुर में एक नूपुर समर्थक दर्जी की दो जिहादियों द्वारा निर्मम हत्या के लिए भी ‘एकमात्र जिम्मेदार’ ठहरा दिया। आज भी नूपुर अपनी जान बचाने हेतु सुरक्षाबलों के साए में भूमिगत जीवन जीने को विवश हैं। उनके प्राणों पर मंडराते खतरे की गंभीरता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2022 में विश्वविख्यात लेखक सलमान रुश्दी पर सैटेनिक वर्सेज के तीन दशक पुराने फतवे के चलते जानलेवा हमला हुआ था। तथाकथित प्रगतिशील जमात की दृष्टि में नूपुर का ‘अपराध’ और भी गंभीर है-क्योंकि वह हिंदू हैं, सवर्ण हैं और इसलिए उनके संदर्भ में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का कोई अर्थ नहीं है।

सितंबर, 2023 में तमिलनाडु सरकार में तत्कालीन मंत्री और द्रमुक नेता उदयनिधि स्टालिन ने ‘सनातन धर्म’ को डेंगू व मलेरिया जैसा बताते हुए इसके ‘समूल विनाश’ की बात कही थी। यह कोई भावावेश में दिया गया वक्तव्य नहीं था, बल्कि पूर्वनियोजित व लिखित भाषण था। अदालत ने इसे ‘सांविधानिक सिद्धांतों के खिलाफ’ बताया। परंतु इस मामले में नूपुर प्रकरण में आंदोलित बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया बेहद फीकी रही। क्यों हिंदू विरोधी विषवमन ही ‘प्रगतिशीलता’, ‘आधुनिकता’ और ‘सामाजिक न्याय’ का पर्याय है?

ऐसी दोहरी मानसिकता मार्च, 2025 में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी के मामले में भी देखने को मिली थी। इमरान द्वारा ‘ऐ खून के प्यासे बात सुनो’ कविता संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट पर दर्ज प्राथमिकी को शीर्ष न्यायालय ने यह कहते हुए निरस्त कर दिया, ‘भले ही बहुत से लोग किसी दूसरे के विचारों को नापसंद करते हों, लेकिन विचारों को व्यक्त करने के व्यक्ति के अधिकार का सम्मान और संरक्षण किया जाना चाहिए।’ दुर्भाग्य से यह न्यायिक विवेक-विजय शाह, अली खान और नूपुर शर्मा को नहीं मिला।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ लोकतंत्र की प्राणवायु है, लेकिन अन्य सभी स्वतंत्रताओं की तरह यह भी असीम नहीं है। यदि किसी वक्तव्य का उद्देश्य समाज में विभाजन और वैमनस्य फैलाना है, तो फिर चाहे वह अली हो या विजय-दोनों की आलोचना समान रूप से होनी चाहिए। जब किसी अभिव्यक्ति पर प्रतिक्रिया-‘किसने क्या बोला’ के बजाय केवल ‘किसने बोला’ के आधार पर आने लगे, तब ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ खतरे में पड़ जाती है।
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