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चोट्टि मुंडा के हितों की रक्षक कौन
Mon, 16 Dec 2019 06:38 AM IST
बद्री नारायण
बद्री नारायण
बद्री नारायण
Published by: बद्री नारायण
Updated Mon, 16 Dec 2019 06:38 AM IST
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झारखंड के लोग
- फोटो : a
झारखंड में हो रहे विधानसभा चुनाव में देखना यह है कि हजार चौरासी की मां इस बार किसको वोट देती है। यह भी देखना है कि चोट्टि मुंडा अपने तीर लेकर किसके चुनावी जुलूस में जाता है। हजार चौरासी की मां और चोट्टि मुंडा, दोनों महाश्वेता देवी के उपन्यासों के जीवंत चरित्र हैं, जो झारखंड, छत्तीसगढ़ तथा देश की अन्य जगहों पर रहने वाली जनजातीय आबादी के प्रतीक हैं। झारखंड एवं छत्तीसगढ़, दोनों महत्वपूर्ण जनजातीय आबादी वाले राज्य हैं। छत्तीसगढ़ में पिछले साल विधानसभा चुनाव हो चुका है और वहां भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार है। जबकि झारखंड में विधानसभा चुनाव हो रहा है। मतदान के तीन चरण हो चुके हैं और आगामी 20 दिसंबर तक शेष दो चरणों के मतदान पूरे हो जाएंगे।
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छत्तीसगढ़ की तरह झारखंड में भी महत्वपूर्ण वन संपदा एवं भू-संपत्ति अर्थात जिंक, यूरेनियम, लौह अयस्क आदि पाए जाते हैं। वहां टीलों और पठारों के ऊपर देवता पूजे जाते हैं और उनके नीचे जमीन के अंदर छिपे महंगे खनिज पदार्थ कहां मिल जाएं, कहा नहीं जा सकता। इस प्रकार इन राज्यों में चुनाव का अर्थ अन्य राज्यों से थोड़ा भिन्न है। इन राज्यों में चुनाव के बाद बनी सरकार सिर्फ प्रशासन एवं राज्य द्वारा संचित एवं प्राप्त संस्रोतों के समान वितरण की जिम्मेदारी ही नहीं निभा रही होती, वरन् राज्य में पाई जाने वाली अनेक प्रकार की प्राकृतिक संपदाओं के इस्तेमाल करने का अधिकार भी पा जाती है। इसलिए इन राज्यों में सरकार सिर्फ जनतांत्रिक उपस्थिति के रूप में ही नहीं होती, वरन् अनेक प्रकार के प्राकृतिक संसाधनों के अधिकार को वहां के जनजातीय निवासियों के हाथों से लेकर किसी को दे देने के अधिकार के रूप में भी होती है। जबकि ये अधिकार हजार चौरासी की मां एवं चोट्टि मुंडा जैसे चरित्रों के अधिकार होते हैं। इस लिहाज से देखें, तो झारखंड में हो रहे विधानसभा चुनाव से यह भी तय होगा कि इन प्राकृतिक संपदाओं पर प्राप्त अधिकार का राजसत्ता क्या करती है और इनके नियोजन की नीतियां बनाते वक्त जनजातीय भावनाओं का ख्याल किस प्रकार रखती है। चूंकि झारखंड के जनजातीय आबादी के क्षेत्रों में प्राकृतिक संस्रोत हैं, अतः वहां की स्थानीय आबादी में अपने जल, जंगल, एवं जमीन को लेकर असुरक्षा बोध इधर लगातार बढ़ता गया है। छोटानागपुर एवं संथाल परगना टेनेन्सी ऐक्ट में परिवर्तन की रघुबर दास सरकार की कोशिशों ने भी इनमें असुरक्षा बोध बढ़ाया है।
जनतांत्रिक चुनावों में सरकार बनाने की शक्ति सिर्फ एक समुदाय के मतों से तय नहीं होता है। चूंकि राज्य की आबादी में प्रवसन, व्यापार, नौकरी एवं अन्य ऐतिहासिक कारणों से अन्य सामाजिक समूह भी बसते जाते हैं, अतः उनकी भी मत शक्ति धीरे-धीरे बढ़ती जाती है।
इस प्रकार झारखंड जैसे राज्यों में जनतांत्रिक शक्ति की प्राप्ति सिर्फ जनजातीय मतों से ही संभव नहीं है, बल्कि वहां की आबादी में बसने वाले पिछड़े सामाजिक समूहों के कृषक, जिन्हें सादान कहते हैं, तथा प्रवासी आबादी की भी बड़ी भूमिका है। ये सामाजिक समूह अनेक सामाजिक हितों पर कई बार एक राय रखते हैं। परंतु विकास की नीति एवं प्रश्नों पर इनके मत विभाजित होते हैं। कई बार जातीय एवं धार्मिक गोलबंदी भी मतों की दिशा तय करने में भूमिका निभाती ही है।
इस प्रकार जनजातीय समूहों के भीतर इधर विकसित हुआ असुरक्षा बोध उन्हें किसी एक के पक्ष में गोलबंद कर सकता है, किंतु आबादी के अन्य सामाजिक समूहों के मत विभाजित भी होंगे ही। इस प्रकार चोट्टि मुंडा के अधिकारों की सुरक्षा सिर्फ उसी के हाथों में नहीं है, बल्कि औरों के हाथों में भी है। भारतीय जनता पार्टी तथा झारखंड मुक्ति मोर्चा, दोनों ही चोट्टि मुंडा के पूर्वज बिरसा मुंडा की परंपरा पर चलने और उसकी रक्षा करने के दावे कर रहे हैं। दोनों ही अपने चुनावी भाषणों में उनकी स्मृति का इस्तेमाल कर रहे हैं। अब देखना यह है कि महाश्वेता देवी के उपन्यास का यह जीवंत चरित्र आखिर किसके पक्ष में जाता है। उसकी स्मृति को कौन ज्यादा प्रभावी ढंग से अपने पक्ष में गोलबंद कर पाता है।
झारखंड में हो रहे विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा एवं उसके नेतृत्व में कांग्रेस एवं राष्ट्रीय जनता दल का गठबंधन चोट्टि मुंडा के हितों का रक्षक बनने के लिए स्थानीय मुद्दों को अपने चुनावी विमर्श में उठा रहा है। बेरोजगारी, अशिक्षा एवं कुपोषण से जूझ रहा चोट्टि मुंडा एवं उसके जैसे अनेक सादान (गैर आदिवासी) पिछड़े एवं प्रवासी समूह उनके चुनावी विमर्श के केंद्र में हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय मुद्दों एवं अपने मुख्यमंत्री रघुबर दास के नेतृत्व में किए गए कार्यों के सम्मिश्रण से अपना चुनावी विमर्श खड़ा कर रही है। झारखंड के इस चुनाव में तीसरा पक्ष भी है। तीसरे पक्ष के रूप में आजसू सादान मतों का बहुलांश अपने पक्ष में खींचते हुए उपेक्षित जनजातीय समुदायों के मुद्दों को उठाकर उनके भी एक हिस्से को अपने पक्ष में खींचने में लगी है। लेकिन मतों के इस बहु विभाजन से भाजपा अपना चुनावी फायदा होते देख रही है।
देखना यह है कि झारखंड के इस चुनाव में गणित की विजय होती है या सामाजिक संबंधों के बन-बिगड़ रहे रसायन की। इस चुनाव में विजय चाहे जिसकी भी हो, किंतु आदिवासी आबादी के राज्यों में सरकार अगर जनजातीय मुददों की संवेदना अपने में संचित एवं विकसित करती रहे, तो हमारा जनतंत्र मजबूत होगा। मत शक्ति चाहे इन उपेक्षित समूहों की कम भी हो जाए, किंतु इनके हितों की रक्षा से राजनीतिक दलों को नैतिक शक्ति प्राप्त होगी, जो चोट्टि मुंडा को अपना तीर रखकर जनतांत्रिक धारा में बहने के लिए आकर्षित करेगी। हमें ऐसा जनतंत्र देना होगा, जो इनके सपने देखने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ सके। देखना है, झारखंड के चुनाव में क्या होता है।