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इस सूखे का जिम्मेदार कौन

हिमांशु ठक्कर Updated Mon, 11 Apr 2016 07:18 PM IST
हिंमांशु ठक्कर
हिंमांशु ठक्कर
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इस बार का सूखा लगातार दो वर्ष मानसून में क्रमशः 14 और 12 प्रतिशत की कमी के कारण ही भीषण नहीं है, बल्कि मानसून में कमी से हुए असर से भी स्थिति भयावह हुई है। जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार बढ़ती गर्मी भी इसके लिए जिम्मेदार है। देश के एक बड़े हिस्से में पिछले दो वर्षों में रबी फसल की विफलता से भी किसानों का संकट बढ़ गया है। संकट के समय भूमिगत जल एक बड़ा सहारा होता है, पर देश के बहुत बड़े हिस्से में भू-जल की उपलब्‍धता कम हुई है। जलस्रोतों और भूमिगत जल का घटता स्तर और बढ़ता प्रदूषण समस्या को और बढ़ावा दे रहा है। लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों की दूरदर्शिता के अभाव से भी स्थिति बदतर हुई है; यानी संकट को भांपते हुए पहले से कदम नहीं उठाए गए।
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भूकंप या सुनामी की तरह सूखा अचानक नहीं आता। सूखे की स्थिति जुलाई, 2015 के बाद से ही बन रही थी, जब 36 मौसम विभागों में से कम से कम छह पहले से ही वर्षा की गंभीर कमी की बात कर रहे थे। मानसून के अंत में जब तस्वीर स्पष्ट हो गई थी, तब अगर सरकारों ने आवश्यक कदम उठाए होते, तो आपदा का आज जो असर है, उसे कम किया जा सकता था। उदाहरण के लिए, इस साल सबसे भीषण सूखे का सामना कर रहे महाराष्ट्र में सरकार सूखाग्रस्त कृष्‍णा एवं भीमा बेसिन से उच्च वर्षा वाले क्षेत्र कोंकण में पानी के प्रवाह को रोक सकती थी।

यही नहीं, सरकार गन्ना पेराई और गन्ने की खेती करने पर भी रोक लगा सकती थी। सरकार अपने विकसित किए गए जल स्रोतों का एक सर्वेक्षण करके, उन जल स्रोतों समेत उनके 500 मीटर के दायरे में आने वाले ऐसे अन्य स्रोतों को भी अपने अधीन कर सकती थी। शोलापुर ऐसा आदर्श पहले ही पेश कर चुका है। सरकार चाहती, तो न केवल टैंकरों से पेयजल की आपूर्ति करने वाले माफिया तत्वों पर लगाम लगाई जा सकती थी, बल्कि सूखाग्रस्त इलाकों में मौजूद कोल्ड ड्रिंक एवं ड्रिंकिंग वाटर मैन्यूफैक्चरिंग इकाइयों को भी बंद कर सकती थी। दुर्भाग्य से महाराष्ट्र सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। सरकार की जलयुक्त शिवार योजना एक बेहतर कोशिश है, पर शोलापुर जैसे अपवाद को छोड़कर ज्यादातर इलाकों में इसके कार्यान्वयन में खामियों के कारण ऐसा नहीं हो सका। सिंचाई घोटाले के खिलाफ प्रभावी कदम न उठाए जाने और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं की लगातार विफलता ने जलयुक्त शिवार जैसे प्रयासों को भी बदनाम कर दिया।

नदी के ऊपर बने बांधों से अतिरिक्त पानी छोड़ने में महाराष्ट्र सरकार की निष्क्रियता और आईपीएल मैचों और गोल्फ कोर्सों में पानी की बर्बादी से इन्कार को भी सराहा नहीं जा सकता। सूखे के समय में महाराष्ट्र जल संसाधन नियामक प्राधिकरण की निष्क्रियता के साथ बार-बार अदालत की फटकार सरकार की विफलता की कहानी बयान करती है।

वास्तव में महाराष्ट्र ने इस साल इतिहास का एक भयानक सूखा झेलते हुए संभवतः इसके प्रति सबसे अधिक उदासीन राज्य का उदाहरण पेश किया है। यही नहीं, इसने जल संसाधनों के विकास का विफल मॉडल भी पेश किया है। यह भी एक विरोधाभासी प्रमाण है कि देश के कुल 5,174 बड़े बांधों में से अकेले महाराष्ट्र में 1,845 बांध हैं, अर्थात भारत के 36 प्रतिशत बड़े बांध सिर्फ एक ही राज्य में हैं। इसके बावजूद ताजा आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में 15.5 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि ही सिंचित है! पिछले एक दशक में सिंचित क्षेत्र में व्यावहारिक तौर पर कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, और वर्तमान राज्य सरकार पिछली सरकार के सिंचाई घोटाले को मुद्दा बनाकर ही सत्ता में आई है। इसके बावजूद अपना वायदा पूरा करने या कोई सबक सीखने के बजाय सरकार त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम के तहत केंद्र द्वारा दिए गए पैसे को एक बार फिर से घोटाले के लिए बदनाम उन्हीं परियोजनाओं में लगा रही है, जिससे बड़े ठेकेदार लॉबी को ही अधिक फायदा होगा।

सूखाग्रस्त इलाकों में लोगों को भोजन, पानी और रोजगार की जरूरत है, यह बात सर्वोच्च न्यायालय भी केंद्र एवं राज्य सरकारों से कह रहा है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) रोजगार की कमी को काफी हद तक पूरा कर सकती है, लेकिन केंद्र सरकार ने 2016-17 के बजट में इस योजना को दिए जाने वाले आवंटन में कटौती कर दी है। उस पर भी लगभग 12 हजार करोड़ रुपये पिछले वित्त वर्ष का बकाया देय है। इसका मतलब यह है कि इस योजना के तहत काम कर चुके संकटग्रस्त ग्रामीण लोगों को पिछले करीब छह महीने से मजदूरी नहीं मिली है। यह सरकार की विफलता का एक अन्य संकेत है, जो बताता है कि वह किस तरह सूखे से पीड़ित लोगों की बुनियादी जरूरतों को समझने में भी नाकाम रही है। इसे भी सरकार की विफलता का ही प्रतीक कहा जाएगा कि अप्रैल, 2016 की शुरुआत में ‘इंडिया वाटर वीक’ कार्यक्रम में सरकार ने सूखाग्रस्त लोगों की तकलीफों का जिक्र तक नहीं किया और न ही इस बात का खुलासा किया कि उसकी इस बारे में कार्ययोजना क्या है।

जाहिर तौर पर हमें अपनी जल संसाधन नीति, कार्यक्रमों, परियोजनाओं और गतिविधियों में कई तरह के मध्यम एवं दीर्घकालीन बदलाव करने की जरूरत है। इसी के साथ महत्वपूर्ण जीवनरेखा, यानी भूमिगत जल की उपलब्‍धता को बनाए रखने के लिए विशेष रूप से ध्यान देना होगा। टिकाऊ भूमिगत जल ही इस तरह के सूखे से निपटने में मदद कर सकता है, और जलवायु परिवर्तन के कारण इस तरह की विपदाओं की संख्या बढ़ सकती है। लेकिन इस दिशा में किसी ठोस पहल का संकेत अभी तक नहीं दिखाई पड़ता।

-लेखक साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स ऐंड पीपुल्स से जुड़े हैं
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