'मी टू' अभियान से कौन डरता है
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भारत जैसे देश में 'मी टू' अभियान शुरू होगा, यह मैंने सोचा नहीं था। इसकी कई वजहें हैं। भारतीय समाज अब भी पुरुषवर्चस्ववादी है। यहां नारी विद्वेषियों की संख्या बहुत है। यहां खासकर जो पुरुष चर्चित, लोकप्रिय और प्रभावशाली हैं, वे लड़कियों की कोई शिकायत सुनना नहीं चाहते। कथित बदतमीज लड़कियों को किस तरह सबक सिखाया जा सकता है, यह वे बखूबी जानते हैं। लड़कियां डरती हैं, इसलिए वे मुंह छिपाकर रहती हैं। दिल्ली की बस में सामूहिक बलात्कार की शिकार लड़की का असली नाम छिपाकर रखा गया। पर इसी भारत में अब लड़कियां धीरे-धीरे अपनी जुबान खोल रही हैं। तनुश्री दत्ता नाम की एक अभिनेत्री ने चर्चित अभिनेता नाना पाटेकर पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया। लेकिन उनके खिलाफ मुकदमा करते हुए तनुश्री ने पाया कि नाना पाटेकर ने भी उन्हे लीगल नोटिस भेजा है।
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आज जो महिलाएं विख्यात पुरुषों पर यौन अत्याचार के आरोप लगा रही हैं, समाज में उन्हें गलत निगाहों से देखा जा रहा है। इसका कारण यह है कि चर्चित पुरुष अगर किसी महिला के साथ यौन दुर्व्यवहार करता है, तब भी जनमत उसके साथ खड़ा रहता है। पुरुषवर्चस्ववादी समाज ने यह मान ही लिया है कि महिलाओं के साथ गलत व्यवहार करने का जन्मसिद्ध अधिकार पुरुषों के पास है। समाज नहीं चाहता कि कोई महिला यौन अत्याचार की सच्चाई के बारे में मुंह खोले। और यौन दुर्व्यवहार की घटना के कई साल बाद अगर सच्चाई बताई, तो पूछिए ही मत। जब वह घटना घटी, तब क्यों नहीं बताया? जैसे कि वर्षों बाद इस बारे में बताने पर आरोप टिकता नहीं है। जैसे कि यौन दुर्व्यवहार की घटनाओं की भी एक्सपाइरी डेट होती है। लड़कियां जीवन में अगर कभी भी बलात्कार या यौन दुर्व्यवहार के हादसे से गुजरती हैं, तो पूरा जीवन उसका घाव लिए जीवित रहती हैं। यह घाव कभी नहीं भरता। जैसे एक दु;स्वप्न को पूरा जीवन ढोते हुए जीना पड़ता है। पच्चीस साल में महिलाएं बहुत कुछ भूल जाती हैं, लेकिन बलात्कार का कटु अनुभव भूलना संभव नहीं है। इस बारे में बताने की ताकत लड़कियों में हमेशा नहीं होती।
'मी टू' अभियान ने मामूली तौर पर सही, महिलाओं में अपने पुराने अनुभव साझा करने की ताकत दी है। प्रभावशाली पुरुषों के खिलाफ लड़ने की ताकत साधारण महिलाओं में नहीं है। हमारा समाज ऐसी किसी शिक्षा को भी मान्यता नहीं देता, जिसमें लड़कियों को ताकतवर बनाने का प्रावधान हो। जो महिलाएं खुद को आत्मनिर्भर कहती हैं, वे भी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता के बावजूद सामाजिक सुरक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हें अब भी पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता है। मातृसत्तात्मक व्यवस्था की तरह औरतों की आत्मनिर्भरता भी एक मिथक है।
हमारे समाज में नारी विद्वेष, नारी निर्यातन और बलात्कार इतना सहज स्वाभाविक है कि पुरुषों पर आरोप लगाने पर समाज औरतों को ही घृणा की दृष्टि से देखता है। कवि रुद्र मोहम्मद शहीदुल्ला से मैंने प्रेम विवाह किया था। नियमित तौर पर वेश्यालय जाने के कारण उन्हें यौन रोग हो गया था और उसका खतरा मुझे भी था। मैंने इस बारे में लिखा, तो बांग्लादेश के समाज ने रुद्र से नहीं, मुझसे घृणा की। बल्कि रुद्र की सच्चाई सामने आने के बाद भी उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। ऐसे ही जब मैंने बांग्लादेश के दिग्गज लेखक सैयद शमसुल हक की असलियत समाज के सामने रखी, तो उन्होंने मुझ पर मानहानि का मुकदमा दायर किया और मेरी किताब पर प्रतिबंध लगवा दिया। सैयद हक आज जीवित नहीं हैं, पर मेरी उस किताब पर प्रतिबंध आज भी है।
चर्चित लेखक सुनील गंगोपाध्याय, जिनकी असलियत सामने लाने के बाद वह इतने तिलमिला गए थे कि मेरी किताब द्विखंडितो पर प्रतिबंध लगाना चाहते थे, आज अगर जीवित होते, तो 'मी टू' अभियान पर क्या कहते? वह पश्चिम की साहसी महिलाओं की तो तारीफ करते, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप की कोई महिला अगर ऐसा करती, तो उसका मुंह बंद करने, उसे पश्चिम बंगाल से बाहर निकालने और उसे सबक सिखाने के लिए कुछ भी करते।
जब मैंने धार्मिक कट्टरवाद का विरोध किया, तो बांग्लादेश के उदार लोग मेरे साथ थे। लेकिन जब मैंने कुछ दिग्गज लेखकों की असलियत सबके सामने रखी, तो मेरे साथ खड़ा होने वाला कोई नहीं था। इसलिए मैं चाहती हूं कि 'मी टू' अभियान पूरी दुनिया में फैले, ताकि कमजोर लड़कियों और महिलाओं को मुंह खोलने की प्रेरणा और ताकत मिले।