फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Who dares BCCI hook

बीसीसीआई की नकेल कौन कसेगा

Sun, 19 Jul 2015 05:02 PM IST
धर्मेंद्र पाल सिंह
धर्मेंद्र पाल सिंह Updated Sun, 19 Jul 2015 05:02 PM IST
विज्ञापन
Who dares BCCI hook

लगता है, क्रिकेट में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सरकार सक्रिय हो गई है। जहां एक ओर सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत प्रधान न्यायाधीश आर एम लोढ़ा की रिपोर्ट आने के बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) और इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के खेमों में मातम छाया हुआ है, वहीं दूसरी तरफ संसद के मानसून सत्र में 'प्रिवेंशन ऑफ स्पोर्टिंग फ्रॉड बिल' और 'स्पोर्ट्स डेवलपमेंट बिल' लाने की तैयारी की जा रही है। पहला कानून सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है, जबकि दूसरा बिल खेल संगठनों में पारदर्शिता लाने और उनसे जुड़े पदाधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए बना है।

विज्ञापन


दो वर्ष पहले आईपीएल के एक मैच में राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ी फिक्सिंग तथा चेन्नई सुपर किंग के पदाधिकारी गुरुनाथ मय्यपन को सट्टेबाजी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। तब इस काले धंधे पर अंकुश लगाने के लिए एक अलग कानून लाने की जरूरत शिद्दत से महसूस हुई। सरकार ने न्यायाधीश मुकुल मुद्गल की सदारत में एक समिति बनाई, जिसने प्रिवेंशन ऑफ स्पोर्टिंग फ्रॉड बिल की रूपरेखा तैयार की है। विभिन्न मंत्रालयों से होकर यह बिल अब न्याय विभाग पहुंच चुका है। आशा है, कैबिनेट की मंजूरी के बाद इसे सदन के पटल पर रख दिया जाएगा। वैसे पंद्रह वर्ष पहले जब दक्षिण अफ्रीका के कप्तान हैंसी क्रोनिये पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगा था, तब 2001 में 'प्रिवेंशन ऑफ डिसऑनेस्टी इन स्पोर्ट्स बिल' तैयार किया गया था, किंतु कुछ दिन बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। नया बिल बहुत कुछ पुराने प्रस्तावित कानून की नींव पर खड़ा है।
विज्ञापन


यूरोप की तरह हमारे देश में खेलों पर सट्टा लगाने की अनुमति नहीं है। फिक्की द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार भारत में हर साल अकेले क्रिकेट पर तीन लाख करोड़ रुपये का सट्टा लगता है, जो देश में काले धन का सबसे बड़ा स्रोत है। अलग कानून न होने से सट्टेबाजों पर धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र की धाराओं के अंतर्गत मुकदमा चलाया जाता है। ऐसे में वे अक्सर बच जाते हैं या मामूली सजा पाकर छूट जाते हैं। प्रस्तावित प्रिवेंशन ऑफ स्पोर्टिंग फ्रॉड बिल में मैच फिक्सिंग या सट्टेबाजी का अपराध सिद्ध हो जाने पर पांच वर्ष के कारावास और 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। इसमें अपराध की सूचना देने वाले व्यक्ति को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने की व्यवस्था भी है। जिस तेज गति और बड़े पैमाने पर खेलों में मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी का कैंसर फैल रहा है, उसे देख यह कानून जल्दी से जल्दी पारित होना जरूरी हो गया है। देश भर के खेल संगठनों की जवाबदेही तय करने और उनके चुनाव निष्पक्ष कराने के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने स्पोर्ट्स डेवलपमेंट बिल पारित कराने का विफल प्रयास किया था। इस बिल में बीसीसीआई को सूचना के अधिकार के तहत लाने का प्रावधान भी था, जिसका तत्कालीन कैबिनेट के करीब आधा दर्जन मंत्रियों ने कड़ा विरोध किया था। ये सभी मंत्री सीधे-सीधे बीसीसीआई से जुड़े थे और किसी भी सूरत में देश के सबसे धनी खेल संगठन को जवाबदेही और पारदर्शिता की जद में लाने को राजी नहीं थे। अन्य बातों के अलावा इस बिल में खेल संगठनों के पदाधिकारियों की आयु सीमा और कार्यकाल भी तय कर दिया गया था। निरंतर घोटालों की चपेट में रहने और सुप्रीम कोर्ट की वक्र दृष्टि के चलते आज बीसीसीआई कमजोर पड़ चुका है।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह बात सिद्ध हो चुकी है कि क्रिकेट अब केवल एक खेल नहीं, मोटी कमाई का जरिया भी है। इससे वैध-अवैध, दोनों ढंग से बड़े पैमाने पर पैसा बनाया जा रहा है। इसके संचालन से जुड़े अनेक बड़े लोग काले धंधों में भी लिप्त हैं। आईपीएल की टीम चेन्नई सुपर किंग्स के गुरुनाथ मय्यपन और राजस्थान रॉयल्स के राज कुंद्रा को तो सट्टेबाजी का दोषी पाकर सजा भी सुनाई जा चुकी है, लेकिन केवल दो लोगों को दंड देने से क्रिकेट का कल्याण नहीं हो सकता। इसके लिए बड़े पैमाने पर सफाई की जरूरत है। उच्चतम न्यायालय ने यह काम लोढ़ा पैनल को सौंपा है। पैनल के जिम्मे अभी दो काम और बचे हैं। एक है आईपीएल के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (सीओओ) सुंदर रमन पर लगे आरोपों की जांच कर सजा सुनाना और दूसरा है बीसीसीआई के ढांचे और प्रशासन में सुधार संबंधी सुझाव देना। सुंदर रमन पर आरोप है कि उन्हें सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग से जुड़े कारनामों की जानकारी थी, फिर भी उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया।

लगता है करीब आठ दशक से मनमाने ढंग से क्रिकेट का कारोबार चला रही बीसीसीआई के दिन लद गए हैं। बीसीसीआई एक गैर मुनाफे वाली निजी संस्था के तौर पर रजिस्टर्ड है, जिसका संचालन गैर पेशेवर लोगों के हाथ में है। संस्था निजी है, फिर भी जो टीम चुनती है, वह भारतीय क्रिकेट टीम कहलाती है। हिंदुस्तान दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जिसके खिलाड़ी अपनी टोपी पर राष्ट्रीय चिह्न नहीं, बीसीसीआई का लोगो लगाते हैं। बोर्ड का मकसद मुनाफा कमाना नहीं है, फिर भी उसके खाते में अरबों रुपये हैं। वह हर साल अपनी इकाइयों को करोड़ों रुपये बांटता है, फिर भी उसकी दौलत बढ़ती जाती है।


दो-तीन माह बाद लोढ़ा पैनेल की रिपोर्ट आ जाएगी और यदि संसद के आगामी सत्र में प्रिवेंशन ऑफ स्पोर्टिंग फ्रॉड बिल और स्पोर्ट्स डेवलपमेंट बिल पारित हो गए, तब निश्चय ही भारत में क्रिकेट का कायाकल्प भी हो जाएगा। देश के सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट को अब कुछ लोगों की दया और सनक पर नहीं छोड़ा जा सकता।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed