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असहिष्णुता की बात करने वाले कहां हैं!
अवधेश कुमार
Updated Thu, 04 Feb 2016 07:54 PM IST
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हमारा देश विचित्र है। पाकिस्तान की ओर से जिस तरह अभिनेता अनुपम खेर को वीजा नहीं दिया गया, उस पर कई राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग की प्रतिक्रिया ऐसी है, मानो वे पाकिस्तान के इस रवैये को सही ठहरा रहे हों। होना तो यह चाहिए था कि अगर पाकिस्तान ने कराची साहित्य महोत्सव के लिए केवल अनुपम को छोड़कर जिन 17 लोगों को वीजा दिया, वे सारे एकजुट होकर इसके विरुद्ध खड़े होते और आयोजन का बहिष्कार करते। किंतु प्रकाशक अशोक चोपड़ा को छोड़कर किसी ने ऐसी हिम्मत नहीं दिखाई। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
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इसके विपरीत नंदिता दास ने खेर के कॉमन सेंस तक की बात कर दी! इसमें कॉमन सेंस की बात कहां से आ गई? अनुपम खेर ने तो आवेदन नहीं किया था कि मुझे महोत्सव में वक्ता बनाइए। जिसने आमंत्रित किया था, उनकी जिम्मेदारी थी कि उनके मेहमान को सही समय पर वीजा जारी किया जाए। कराची साहित्य महोत्सव की प्रवक्ता अमीना सैयद ने कहा कि 'उनको नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग की ओर से सलाह दी गई कि वह खेर से कहें कि वह वीजा का आवेदन नहीं करें, क्योंकि उनको वीजा जारी नहीं होगा।' अमीना के अनुसार, 'उन्होंने हमसे कहा कि शेष 17 मेहमानों को वीजा के लिए आवेदन करना चाहिए, क्योंकि उनको वीजा जारी किया जाएगा।' अमीना सैयद का यह बयान ही पाकिस्तान उच्चायोग की कलई खोल देता है।
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वीजा देना, न देना किसी देश का अधिकार है। किंतु इसके लिए मान्य नियम हैं। अगर आप वीजा किसी को नहीं देते हैं, तो आपको वाजिब कारण बताना होता है। अनुपम खेर कोई चरमपंथी नहीं हैं, उनका किसी तरह का आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, किसी तरह के सांप्रदायिक दंगे में वह आरोपी नहीं हैं, न उन पर किसी प्रकार के गबन आदि के आरोप हैं। इसके पहले भी खेर को पाकिस्तान ने वीजा नहीं दिया था। उन्हें लाहौर में एक एनजीओ के कार्यक्रम में शामिल होना था। जाहिर है, पाकिस्तान उच्चायोग एवं वहां के गृह मंत्रालय ने अपनी ओर से अनुपम खेर को अवांछित घोषित कर रखा है।
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सामान्य धारणा यह है कि अनुपम खेर ने हाल के दिनों में जिस तरह कश्मीरी पंडितों को लेकर अपनी आवाज मुखर की है, उससे पाकिस्तान उच्चायोग नाखुश है। एक ओर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ संबंध सामान्य करना चाहते हैं और दूसरी ओर वहां का उच्चायोग इस तरह की हरकत करता है। जाहिर है, इस विषय को सरकारी स्तर पर औपचारिक तौर से उठाया जाना चाहिए।
देश के अंदर किसी से हमारा वैचारिक मतभेद हो सकता है। सहिष्णुता-असहिष्णुता के मामले पर देश पूरी तरह दो भागों में विभक्त रहा है। उसमें अनुपम खेर एक पक्ष में खड़े हुए, यह उनका अधिकार है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन हमारे देश में ही असहिष्णुता बढ़ने का आरोप लगाने वाले इस मामले में भी प्रकारांतर से अनुपम खेर को ही कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि अनुपम खेर स्पष्ट राजनीतिक मत रखते हैं। संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक मत रखने में क्या समस्या है? वे भूल रहे हैं कि 17 लोगों में सलमान खुर्शीद भी हैं, जो कि कांग्रेस पार्टी के नेता हैं। क्या पाकिस्तान उच्चायोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन करने वाले या भाजपा का समर्थन करने वालों को वीजा न देने की नीति पर चल रहा था? अगर पाकिस्तान भारत से संबंध सुधारना चाहता है, तो उसे इस तरह की हरकत बंद करनी चाहिए।