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बहुजन आंदोलन आज कहां खड़ा है : मायावती ने शायद दीवार पर लिखा संदेश नहीं पढ़ा

महीपाल Updated Sun, 14 Jul 2019 03:47 AM IST
kanshi ram mayawati
kanshi ram mayawati - फोटो : सोशल मीडिया
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पिछड़ों यानी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) को मुख्यधारा में लाने के लिए विभिन्न सामाजिक चिंतकों और समाज सुधारको ने प्रयास किए। इनमें महात्मा फूले, शाहू छत्रपति महाराज, डॉ. भीमराव आंबेडकर और कांशीराम की भूमिका सबसे अधिक रही। साहु महाराज के प्रयास ज्यादा सटीक थे, क्योंकि उन्होंने पिछड़ों का पिछड़ापन दूर करने के दो तरीके अपनाए थे। 
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एक था भगवान एवं भक्त के बीच पुजारी को हटाना और दूसरा था कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में पिछड़ों की भागीदारी सुनिश्चित करना। उन्होंने 1902 में पिछड़ों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण शुरू किया था। इसलिए उन्हें देश में आरक्षण का जनक भी मानते हैं। कांशीराम ने पिछड़ों को लामबंद कर आंबेडकर और दूसरों के विचारों को राजनीतिक रूप में तबदील किया। यह प्रयोग उत्तर प्रदेश में लागू हुआ। इससे हाशिये पर रह रहे समाज में जागरूकता आई।

कांशीराम ने इन प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए 1973 में बुद्ध शोध सेंटर की स्थापना की, जो 1973 में बामसेफ में तबदील हुआ और 1978 में जिसका पहला अधिवेशन हुआ। बाद में भाईचारे पर आधारित दलित राजनीति का उदय हुआ। लेकिन कांशीराम की मृत्यु के बाद पिछड़ों के इस भाईचारे पर ग्रहण लगना शुरू हो गया। दलित राजनीति जाटव तक और जाटव से अब परिवार तक सीमित रह गई है, क्योंकि मायावती ने अपने भाई को बसपा का उपाध्यक्ष और भतीजे को राष्ट्रीय समन्वयक बना दिया है। 
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