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छह सौ घंटों का हिसाब कहां है?
अनुराग दीक्षित
Updated Mon, 06 May 2013 11:07 PM IST
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संसद आखिर कब चलेगी? कब जनसरोकार से जुड़े विधेयक गंभीर चर्चा के बाद कानून की शक्ल में सामने आ सकेंगे? चर्चा के सर्वोच्च मंच के तौर पर संसद आखिर कब अपनी सार्थकता साबित कर सकेगी? जनप्रतिनिधि अपनी जवाबदेही कब सुनिश्चित कर पाएंगे? क्या चुनावी राजनीतिक मजबूरी संसदीय व्यवस्था पर ऐसे ही हावी होती रहेगी? इन बुनियादी सवालों के जवाब ढूंढना अब मुश्किल-सा लग रहा है।
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विगत 22 अप्रैल को जब बजट सत्र के इस दूसरे चरण की शुरुआत हुई, तो इसमें काफी विधायी कामकाज निपटाया जाना था, लेकिन भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोपों के बीच अब ऐसा हो पाना संभव नहीं दिखता। विरोध की शुरुआत 2जी स्पेक्ट्रम मामले पर बनी जेपीसी की रिपोर्ट के लीक होने और उसमें प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री को क्लीनचिट दिए जाने के बाद से हुई, जिसमें बाद में कोयला ब्लॉक आवंटन का मामला भी जुड़ा।
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और अब रेल मंत्रालय में प्रोन्नति के मामले में सीबीआई द्वारा रेल मंत्री के करीबी रिश्तेदार की गिरफ्तारी से कांग्रेस की साख फिर सवालों के घेरे में है। ऐसे में सत्ता पक्ष और विपक्ष में तनातनी स्वाभाविक ही थी। नतीजतन मौजूदा संवादहीनता से सत्र के भविष्य पर सवाल खड़ा हो गया है। विपक्ष नहीं चाहता कि सरकार अपने बहुप्रतीक्षित विधेयकों को पारित कर राजनीतिक श्रेय ले, जबकि सत्ता पक्ष किसी मंत्री का इस्तीफा लेकर विपक्ष को और हो-हल्ला करने का मौका देने के मूड में कतई नहीं दिखता।
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ऐसे में इस छोटे से सत्र में महत्वपूर्ण विधेयकों का भविष्य अंधकारमय लगता है। दशकों से लंबित लोकपाल विधेयक पर टीम अन्ना के आंदोलन के बाद सरकार पर दबाव बना था। इसी तरह नंदीग्राम, सिंगुर, भट्टा परसौल जैसी अनेक घटनाओं के बाद चर्चा में आए भूमि अधिग्रहण विधेयक पर सर्वदलीय बैठकों का दौर खत्म हो चुका था। प्रमुख विपक्षी दल के सुझाव माने जाने की बात की जा रही थी। इस विधेयक के भी पारित होने की आशा थी।
उधर, देश की 67 फीसदी आबादी को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने वाले बहुप्रतीक्षित खाद्य सुरक्षा विधेयक पर भी मुहर लगनी थी। हालांकि आनन-फानन में इसे संसद में पेश जरूर कर दिया गया है। इसी तरह भूमि अधिग्रहण भी इस सत्र में विधायी एजेंडे का हिस्सा बना, पर व्यवधान के चलते वह अब तक पारित नहीं हो सका। इनके अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण विधेयक भी पारित होने थे, लेकिन अफसोस अब ऐसा मुमकिन होता नहीं दिखता।
वर्तमान राजनीतिक संकट का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्तमान 15वीं लोकसभा में अब तक का सबसे कम काम हो सका है। केवल 70 फीसदी! 600 घंटे से ज्यादा का बहुमूल्य समय हंगामे की भेंट चढ़ चुका है। रचनात्मक सहयोग अब सिर्फ भाषणों में सिमट कर रह गया है। आपसी टकराव चरम पर है। काम नहीं तो वेतन नहीं, जैसी बातें भी अब बेमानी-सी लगती हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी संसद में नारे नहीं लगाए। उन्हें कभी प्रश्नकाल स्थगित नहीं करना पड़ा। किंतु अफसोस कि प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ही अपने आदर्श नेता की बातों को मानो भुला बैठा है! उधर यूपीए अध्यक्ष भी लोकतंत्र में चर्चा और जवाबदेही की प्रमुखता पर जोर देती रही हैं। किंतु कांग्रेस को शायद अब यह याद नहीं! संसद में व्यवधान के तमाम मुद्दों पर छोटे-बड़े राजनीतिक दल खबरिया चैनलों पर हर रोज बहस करने को तैयार हैं, पर संसद में नहीं! हर कोई स्वयं को संसदीय व्यवस्था के प्रति गंभीर बता रहा है। फिर आखिर कौन-सी अदृश्य शक्ति है, जो संसद को नहीं चलने दे रही?
जाहिर है, दोषी खुद राजनेता हैं, लेकिन जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं। सबको समझना होगा कि विधानसभा चुनावों में होने वाले नफा-नुकसान जैसे राजनीतिक स्वार्थ देश हित से ऊपर कतई नहीं हो सकते। ऐसे में संसद के प्रति जनप्रतिनिधियों को आत्मसमीक्षा की सख्त आवश्यकता है। समझना होगा कि सांसदों के प्रति जनता में अविश्वास का भाव तेजी से विकसित हो रहा है, जो लोकतंत्र के लिहाज से शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में भारतीय संसद में गंभीर चर्चा और जवाबदेही की सुनिश्चितता जरूरी है।