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कहां गए सब मजदूर!
मधुरेंद्र सिन्हा
Updated Wed, 15 May 2013 09:41 PM IST
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यह हैरानी की बात हो सकती है कि 121 करोड़ लोगों के देश में जहां बेरोजगारी की दर आठ प्रतिशत से कहीं ज्यादा है, शहरों में और देहातों में भी काम करने के लिए मजदूर आसानी से नहीं मिल रहे हैं। कंस्ट्रक्शन साइटों पर पहले जैसी चहल-पहल कम दिखती है और बड़ी-बड़ी मशीनें अब ज्यादा दिखने लगी हैं।
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रीयल एस्टेट इंडस्ट्री, जो देश की दूसरी सबसे बड़ी नियोक्ता है, इस समय मजदूरों की कमी का रोना रो रही है। कपड़ा मिलों में, जहां कुछ साल पहले बड़ी तादाद में मजदूरों की छंटनी हुई थी, अब फिर से उनकी जरूरत महसूस हो रही है। लेकिन मजदूर हैं कि मिल नहीं रहे हैं।
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हालत यह है कि दक्षिण भारत के सबसे बड़े रेडीमेड टेक्सटाइल केंद्र तिरपुर इंडस्ट्री में अब भी कम से कम 75,000 मजदूरों की कमी है। पंजाब के खेतों में बुआई से कटाई तक का सारा काम पूर्वांचल के मजदूर करते थे, लेकिन वहां भी मजदूरों की भारी कमी है और फसल उनके इंतजार में खेतों में पड़ी रह जाती है।
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कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में हालात ऐसे हो गए हैं कि वहां से यह आवाज उठने लगी है कि मजदूरों के कल्याण के लिए बनाई गई दुनिया की सबसे अनूठी रोजगार गारंटी योजना मनरेगा ही रद्द कर दी जाए!
यह मांग, जो सुनने में मजदूर विरोधी लगती है, अब काफी जोर-शोर से उठाई जा रही है। बड़े-बड़े बिजनेस चैम्बर सरकार से मांग कर रहे हैं कि वह इस बारे में सोचे या फिर मनरेगा के समय में बदलाव करे। यानी कि कुछ खास महीनों में यह लागू न हो। इससे मजदूरों की उपलब्धता बढ़ेगी।
इस बात में कितना दम है, यह तो कहना मुश्किल है, पर यह उतना ही सच है कि मनरेगा से मजदूरों के पास पैसा आना शुरू हुआ। जिन क्षेत्रों में मनरेगा पर ठीक से अमल हुआ, वहां मजदूरों को निश्चित अवधि की मजदूरी मिली, लेकिन जहां यह ठीक से लागू नहीं हुआ, वहां तो सब कुछ पहले जैसा ही है। इसका अर्थ हुआ कि सिर्फ मनरेगा ही मजदूरों की कमी के लिए जिम्मेदार नहीं है। इसके पीछे कई और कारण हैं।
90 के दशक में जब आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई थी, तो पाया गया कि भारत में कुशल श्रमिकों की भारी कमी है। इस कमी को भरने के प्रयास सरकारी और गैर सरकारी, दोनों ही स्रोतों से होने लगे। नए-नए तकनीकी कॉलेजों की शुरुआत हुई और हालात में सुधार हुए। लेकिन इस नई प्रवृति का कारण क्या है और उससे भी बढ़कर उसका समाधान क्या है, ये सवाल अब सबको तंग कर रहे हैं।
एक बड़ा कारण यह है कि हाल के वर्षों में औद्योगिकीकरण के पैटर्न में आए बदलाव से अपढ़ मजदूर भी अछूते नहीं रहे हैं। वे अब परंपरागत काम से हटकर नए तरह के रोजगार की ओर मुखातिब हो रहे हैं। मसलन, वे दफ्तरों में वॉचमैन, लिफ्टमैन, डोरमैन और यहां तक कि सफाई कर्मचारी की नौकरी पसंद करने लगे हैं, जिनमें कड़ी मेहनत नहीं होती है और पैसे भी अमूमन वक्त पर मिल जाते हैं।
बैंकिंग, आईटी, टेलीकॉम वगैरह जैसे आधुनिक उद्योगों में भी मजदूरों की अच्छी मांग है और इनमें वे ह्वाइट कॉलर मजदूर बन जाते हैं, जो उन्हें नियत समय पर पैसे के साथ आत्मतुष्टि देता है। इसके अलावा भारत में मोटर क्रांति के बावजूद हाथ रिक्शा की मांग बढ़ती ही जा रही है।
हर शहर में रिक्शे आपको मिलेंगे और ये रोजगार के बड़े साधन के रूप में उभरे हैं। एक और बड़ा कारण जो दिखता है, वह है बिहार में निर्माण कार्य। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हुए और हो रहे हैं। इससे देश के सबसे बड़े ‘लेबर सप्लायर’ राज्य से लोगों का रोजगार के लिए पलायन काफी कम हो गया है।
इन सबके कारण ही आज देश के कंस्ट्रक्शन और रीयल एस्टेट इंडस्ट्री में मजदूरों की 40 प्रतिशत की कमी है। समझा जा रहा है कि अगले दशक में यह बढ़कर 65 प्रतिशत हो जाएगी। जाहिर है कि इससे न केवल परियोजनाओं के पूरा होने में अनावश्यक विलंब होगा, बल्कि उनकी लागत भी बढ़ जाएगी। इसका खामियाजा सरकार से लेकर जनता तक को भुगतना पड़ेगा।
भारत की कंस्ट्रक्शन और रीयल एस्टेट इंडस्ट्री में अभी तकनीक और मशीनरी का उपयोग कम होता है, लेकिन आने वाले समय में हम उनका बढ़ता हुआ उपयोग देखेंगे, पर इसके दूरगामी परिणाम होंगे। ये उद्योग अगर ज्यादा मशीनों का इस्तेमाल करने लगेंगे, तो भविष्य में मजदूरों के लिए एक बड़ा रास्ता बंद हो जाएगा।
ऐसे प्रोजेक्ट बनाए जाने लगेंगे, जिनमें कम से कम मजदूरों की जरूरत होगी। इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे। वैसे भी भारत में मजदूरों की कार्य क्षमता यूरोप या अमेरिकी मजदूरों की तुलना में एक-दहाई है। यह निराशाजनक स्थिति है, क्योंकि इन सभी से निर्माण की लागत बढ़ती जा रही है।
ऐसे में सरकार की क्या भूमिका हो सकती है? सरकार बेशक मनरेगा पर कोई अंकुश न लगाए, लेकिन उसके तहत काम देने के महीनों को तो वह इस ढंग से तय कर सकती है कि मजदूर दूसरे उद्योगों में भी जाएं। मजदूरों के कल्याण की योजनाएं तुरंत लागू की जाए।
उनके लिए आवास की व्यवस्था थोड़ी बहुत ही सही, लेकिन जरूर हो। हैरानी की बात है कि 'लेबर सेस' के नाम पर सरकार ने लगभग 4,500 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम डेवलपरों से इकट्ठा कर रखी है, पर इसका कोई सदुपयोग नहीं हो रहा है। कंस्ट्रक्शन साइटों पर मजदूरों के बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाएं तक नहीं होती हैं। सरकार अगर इस दिशा में पहल करे, तो इससे भी फर्क पड़ सकता है।
यह देखते हुए कि लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा दिन नहीं बचे हैं, केंद्र या राज्य सरकारें भी ऐसा काम नहीं करना चाहेंगी, जिनसे उनके वोट बैंक पर असर पड़े। वोट की राजनीति ऐसे मामलों में जोर शोर से सामने आती है।