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दंगे में कहां से आते हैं हथियार

Fri, 13 Mar 2020 07:14 PM IST
Raman Singh प्रशांत दीक्षित
प्रशांत दीक्षित Published by: Raman Singh Updated Fri, 13 Mar 2020 07:14 PM IST
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Where do weapons come from in the riots
दिल्ली दंगे - फोटो : a

हाल में हुए दिल्ली दंगे के दौरान मरने वालों की संख्या पचास से ज्यादा हो गई है। इनमें से आधे से अधिक संख्या उन लोगों की है, जिनकी गोली मारकर हत्या की गई। और मारे गए लोगों के अलावा 200 से ज्यादा लोगों को मुख्यतः बंदूक की गोली के कारण गंभीर चोटें लगी हैं। जाहिर है, इस दंगे के दौरान अवैध अग्नेयास्त्रों का इस्तेमाल जमकर किया गया। यह वास्तव में दुखद है, क्योंकि यह संकट विशेष रूप से देश में छोटे हथियारों के घरेलू उत्पादन के कारण पैदा हुआ है। इन हथियारों के प्रसार को खासतौर से उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से कानून व्यवस्था से जुड़ी प्रणाली की नाक के नीचे से बढ़ावा मिला है। यह बेहद अफसोस की बात है, जैसा कि मैंने अपने अध्ययन में पाया है कि यह अवैध धंधा औपनिवेशिक काल से चला आ रहा है और आजादी के बाद भी हमने इसे फलते-फूलते देखा है। तबसे देसी अग्नेयास्त्रों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।


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भारत में अवैध रूप से अग्नेयास्त्रों का उत्पादन हालांकि एक गंभीर मुद्दा है, लेकिन सरकार की ओर से इस पर उचित ध्यान नहीं दिया जाता है। देसी हथियार सस्ते दामों में मिलते हैं, हालांकि उनकी सटीकता की गारंटी नहीं दी जा सकती। वे अत्यधिक विनाशकारी होते हैं और बैलिस्टिक फिंगरप्रिंट का उपयोग करके इसका पता लगाना असंभव होता है। बताया जाता है कि भारत में बड़े पैमाने पर इसका निर्माण उत्तर प्रदेश और बिहार में होता है। उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर, रामपुर, शामली, मेरठ, एटा, फर्रुखाबाद, आजमगढ़, बुलंदशहर जैसे बड़े शहरी केंद्र और दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर लोनी के आसपास के इलाके को अवैध हथियारों के बड़े व्यापार केंद्रों के रूप में पहचाना गया है। ऐसी भी खबरें हैं कि वर्ष 2004 में लोनी के एक निर्माण केंद्र से हर महीने औसतन 30 अग्नेयास्त्र बेचे जाते थे और करीब 50 हजार रुपये कमाए जाते थे। मौजूदा मुद्रास्फीति के आंकड़ों के हिसाब से यह आंकड़ा आसानी से कम से कम दस लाख रुपये हो गया होगा।

फरवरी, 2004 के एक आधिकारिक अनुमान के मुताबिक, बिहार में उस समय 1,500 से ज्यादा अवैध हथियारों के निर्माण कारखाने थे। उनमें से ज्यादातर मुंगेर, बिहारशरीफ, नालंदा, लखीसराय, गया और शेखपुरा जिले में थे। यह इलाका गंगा नदी के दक्षिण में देश का सबसे सक्रिय औद्योगिक क्षेत्र है, जिसमें देश के सबसे बड़े खनन क्षेत्र भी शामिल हैं।

दिल्ली हमेशा से हथियारों की महत्वपूर्ण खरीदार रही है, क्योंकि मंगोलपुरी, सुल्तानपुरी, जाफराबाद, जहांगीरपुरी, सीलमपुर और पुरानी दिल्ली में देसी पिस्तौल आसानी से उपलब्ध हैं। ये शहर के भीड़भाड़ वाले क्षेत्र हैं, जो प्रारंभिक वर्षों में खराब शहरी नियोजन प्रक्रिया से उभरे हैं। इस बार मौजपुर, भजनपुरा, चांदबाग इत्यादि इलाकों में दंगे भड़के। ये जाफराबाद, जहांगीरपुरी, सीलमपुर से सटी आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की बस्तियां हैं।

रिपोर्टों से पता चलता है कि मुंगेर में बनी 7.65 मिमी के सेमी-ऑटोमैटिक पिस्तौल मुख्य हथियार थी, जिनका दंगों के दौरान इस्तेमाल किया गया। इसे समझा जा सकता है, क्योंकि अपराधियों के बीच फैक्टरी निर्मित हथियारों की धूम है, जिसे 'इंग्लिश' हथियार के रूप में एक जेनरिक नाम दिया गया था। ये बहुत महंगे हैं, इसलिए उनमें से ज्यादातर अपराधी कट्टे के परिष्कृत संस्करण का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें 'सिक्सर' कहा जाता है, क्योंकि उनमें देसी संस्करण के विपरीत एक ही समय में छह गोलियां भरी जा सकती हैं। सिक्सर फैक्टरी निर्मित हथियार की तरह दिखता है और कई बार अप्रशिक्षित लोगों के लिए सिक्सर और फैक्टरी निर्मित पिस्तौल में अंतर करना मुश्किल होता है। बिना लाइसेंस वाला यह हथियार इन इलाकों में प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया है। वर्ष 2009 में दिल्ली में तीन लाख गैर-लाइसेंसी हथियारों के होने का संदेह जताया गया था। यह इस शहर में इसके उत्पादन का एक संकेत देता है।

सबसे बड़ी चिंता की बात भारतीय राजनीति की बदलती रूपरेखा है। यह लोगों के भीतर संगठित हिंसा की घटना से प्रेरित है। बेशक बिहार की बंदूक फैक्टरियों ने शुरू में गैर लाइसेंसी छोटे हथियार मुहैया कराए थे, लेकिन अब एके-47 राइफल भी उपलब्ध हैं। ऐसी आशंका है कि हिंसक संघर्ष देश के अन्य राज्यों में भी हो सकते हैं, क्योंकि धार्मिक और जातिगत दुश्मनी को बढ़ावा दिया जाता है, जिसका जवाब भारत की लोकतांत्रिक ताकतों को तलाशना होगा। संघर्षरत समूह न तो राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक मुद्दों के प्रति कोई जिम्मेदारी दिखाते हैं और न ही भारतीय संघ के प्रति। आतंक और हिंसा का माहौल पारस्परिक अस्तित्व की भावना को नुकसान पहुंचाता है, जो नागरिक समाज की मूल ताकत है। बातचीत और संवाद की प्रक्रियाएं, जो एक लोकतांत्रिक आचरण का अभिन्न हिस्सा हैं, हथियारों की मौजूदगी के कारण पूरी तरह से विकृत हो गई हैं।

पिछले दस वर्षों में हथियार अधिनियम के उल्लंघन में करीब चालीस फीसदी की निरंतर वृद्धि देखी गई है। उत्तर प्रदेश में ऐसे मामलों में करीब सत्तर फीसदी की उच्चतम वृद्धि दर्ज की गई है। जाति, जमीन और बदले की भावना मुख्य मुद्दे हैं, जो हथियारों के जरिये निपटाए जाते हैं। वर्ष 2015 में देश में जब्त किए गए सभी अवैध हथियारों में से 45 फीसदी उत्तर प्रदेश के थे।

वर्ष 1961 से 1991 के बीच देश में हिंसक अपराधों में 341.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। छोटे हथियारों का खुलेआम इस्तेमाल और उत्तर प्रदेश व बिहार से भूमिहीन श्रमिकों का बड़े पैमाने पर देश के अन्य हिस्सों में पलायन के बीच सीधा संबंध है। इसने आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों का एक बड़ा समूह खड़ा किया है। दिल्ली दंगों के दौरान इस तरह के पलायन के दर्दनाक दृश्य स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे।

-लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं और इन्होंने समाज पर छोटे हथियारों के प्रभाव का गहन अध्ययन किया है।

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