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बीस साल में कहां पहुंचा उत्तराखंड, विकास के पैमाने पर कितना आगे बढ़ा

Sun, 08 Nov 2020 04:31 AM IST
बद्री नारायण बद्री नारायण
बद्री नारायण Published by: बद्री नारायण Updated Sun, 08 Nov 2020 04:31 AM IST
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Where did Uttarakhand reach in twenty years, how far did it grow on the scale of development
uttarakhand assembly

उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड को नया राज्य बने 20 वर्ष हो रहे हैं। नौ नवंबर, 2000 को उत्तर प्रदेश के पर्वतीय अंचल जिनमें लगभग 93 प्रतिशत पर्वत एवं 64 प्रतिशत जंगल क्षेत्र पड़ता है, एक नए राज्य के रूप में संयोजित किए गए थे। त्वरित विकास एवं सक्षम प्रशासन के लिए ऐसा किया गया था। इस क्षेत्र के अविकास के विरुद्ध यहां की जनता की आकांक्षा को देखकर यह निर्णय लिया गया था। न केवल उत्तराखंड जिसे पहले उत्तरांचल नाम दिया गया था, बल्कि लगभग एक ही समय में छत्तीसगढ़ एवं झारखंड जैसे अन्य दो छोटे राज्य और बनाए गए थे। यह माना गया था कि छोटे राज्य बनने से इन क्षेत्रों में विकास की धीमी गति से निजात मिल सकती है। 


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इन नए राज्यों की जनता में एक ऐसे नेतृत्व पाने की आकांक्षा थी, जो उनका हो, उनको जान-समझ हो एवं उनके प्रति संवेदनशील हो। इन राज्यों को बने 20 वर्ष का एक लंबा कालखंड पूरा हो गया है। इन बीस वर्षों में विकास एवं राजनीति के संदर्भ में इन राज्यों के प्रदर्शन का मूल्यांकन किया ही जाना चाहिए। अगर गहराई से मूल्यांकन किया जाए, तो उत्तराखंड की विकास गति अन्य छोटे राज्यों की तुलना में बेहतर मानी जाएगी। उत्तराखंड की आर्थिक विकास दर राष्ट्रीय आर्थिक विकास दर से भी बेहतर मानी गई है। उत्तराखंड ने औसतन 10 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर का लक्ष्य प्राप्त किया है, जो छह-सात प्रतिशत की राष्ट्रीय विकास दर की तुलना में ज्यादा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, जन्म एवं मृत्यु दर जैसे अनेक सामाजिक मानकों के दृष्टिकोण से इस राज्य का प्रदर्शन अनेक राज्यों में बेहतर माना गया है।

ये तीनों छोटे राज्य जन एवं सामाजिक आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति से बने थे। इन्हें बनाने वाले जनांदोलनों में यह कामना साफ देखी जा सकती थी कि इन राज्यों का नेतृत्व जड़ों से जुड़े एवं यहां के समाज के प्रति संवेदना से ओत-प्रोत हो। ऐसा हुआ भी। अब तक पांच विधानसभा चुनाव देख चुके उत्तराखंड के आठ मुख्यमंत्रियों में प्रायः सभी यहां की जमीन से जुड़े रहे हैं। नारायण दत्त तिवारी हालांकि उत्तराखंड बनने के पूर्व से ही राष्ट्रीय नेता के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। उत्तराखंड बनने के बाद इसके विकास की आधारशिला इन्होंने ही रखी। विजय बहुगुणा जो हेमवतीनंदन बहुगुणा के सुपुत्र हैं, इलाहाबाद में पले-बढ़े हैं। इलाहाबाद में अपने लंबे प्रवास के बाद जब वह उत्तराखंड की राजनीति में आए, तो उन्होंने साबित किया कि वह यहां के सामाजिक अन्तर्विरोधों को गहराई से समझते हैं। उत्तराखंड के अन्य मुख्यमंत्रियों में भगत सिंह कोश्यारी, भुवनचंद्र खंडुरी, रमेश पोखरियाल निशंक, त्रिवेंद्र सिंह रावत भी इस क्षेत्र की जनआकांक्षाओं से गहराई से जुड़े रहे हैं। हरीश रावत की शिक्षा-दीक्षा हालांकि लखनऊ में हुई, परंतु उत्तराखंड की जमीन से उनका रिश्ता बना रहा है।

रमेश पोखरियाल निशंक उत्तराखंड के लोकप्रिय जननेता हैं। वह कांग्रेस के अत्यंत लोकप्रिय नेता शिवानन्द नौटियाल को, जो पांच बार से लगातार उस कर्ण प्रयाग क्षेत्र से जीत रहे थे, हराकर 1991 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे थे। 2009 से 2011 के बीच जब वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने हरिद्वार एवं उधमसिंह नगर का सफल विलय उत्तराखंड में करने का जटिल काम संपन्न किया। आज ये क्षेत्र उत्तराखंड के लिए खाद्य उत्पाद करने वाला महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में मौजूद है। हरीश रावत भी पहले एक सफल जननेता के रूप में उत्तराखंड में लोकप्रिय हुए, फिर वह राज्य के मुख्यमंत्री बने। त्रिवेंद्र सिंह रावत उत्तराखंड की जमीन में संघर्ष कर बड़े हुए हैं।

उत्तराखंड की राजनीति में दो दल कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी प्रभावी हैं। हर पांच साल में उनमें ही अदला-बदली चलती रहती है। उत्तराखंड क्रांति दल जैसे संगठन जो उत्तराखंड के निर्माण के समय काफी सक्रिय थे, राज्य की राजनीति में आज हाशिये पर हैं। अन्य कारणों के साथ इसका एक कारण यह भी है कि उत्तराखंड की जनता राज्य निर्माण के लिए जनसंघर्ष इसलिए कर रही थी, कि उसको अपना दीर्घकालिक विकास चाहिए था। जिन दलों के पास उत्तराखंड के निर्माण के साथ उसके भविष्य के जनतंत्र एवं विकास की टिकाऊ राजनीति की संभावना जनता ने देखी, उनसे जुड़ती गई। आज यों भी जनतंत्र की राजनीति मूलतः विकास की राजनीति में तब्दील होती जा रही है। जो उसे जितनी प्रतिबद्धता एवं ईमानदारी से करेगा, जनता उससे उतनी जुड़ती जाएगी। उत्तराखंड की जनता ने भी बीस वर्षों में दिखाया है कि वह एक विकासमान जनतंत्र चाहती है। वह अपनी आलोचनात्मक चेतना से राजनीति को नियंत्रित करती रहती है।

उत्तराखंड के इन पूर्व एवं वर्तमान मुख्यमंत्रियों ने राज्य को विकास के पथ पर आगे ले जाने की अपनी-अपनी तरह से कोशिशें की हैं। फिर भी उत्तराखंड में, जिसकी लगभग 66.6 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और जहां दुर्गम एवं दुरूह पर्वतीय एवं जंगल क्षेत्रों में लोगों का वास है, बिजली एवं सड़क गांव-गांव पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है। ‘इको-टूरिज्म’ की अनंत संभावनाएं उत्तराखंड में छिपी हुई हैं। उन्हें अभी पूर्ण रूप से विकसित होना बाकी है। दुरूह एवं दुर्गम क्षेत्रों के वासियों तक जनतंत्र एवं विकास को पूर्ण रूप से पहुंचना बाकी है। इसके लिए जरूरी है परिणाम देने वाली, जड़ों से जुड़ी एवं संवेदनशील राजनेताओं की, जो जनता की सामाजिक एवं विकासपरक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर सके।

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