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सुरक्षा में चूक कहां हुई

Thu, 13 Jul 2017 12:48 PM IST
प्रशांत दीक्षित
प्रशांत दीक्षित Updated Thu, 13 Jul 2017 12:48 PM IST
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Where did the security go wrong
प्रशांत दीक्षित
कश्मीर के खानबल में अमरनाथ तीर्थयत्रियों के बस पर हमला न केवल मानवता को शर्मसार करने वाला है, बल्कि यह उस कश्मीरियत के भी खिलाफ है, जिसके तहत मेहमानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी मेजबानों पर होती है। हर साल अमरनाथ गुफा के दर्शन के लिए लाखों तीर्थयात्री पहुंचते हैं, जिनसे स्थानीय लोगों का वर्षों से भावनात्मक रिश्ता जुड़ा रहा है। आज भी स्थानीय  लोगों की रोजी-रोटी अमरनाथ यात्रियों से जुड़ी हुई है। तीर्थयात्रियों की खरीदारी से वहां के लोगों का जीवन यापन चलता है।
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ही वजह है कि इस हमले की कश्मीर सहित देश भर में व्यापक निंदा हो रही है। यहां तक कश्मीर के अलगाववादी नेताओं ने भी इस हमले की जमकर निंदा की है। पूरी कश्मीर घाटी में इस हमले को लेकर दुख और संवेदना की एक लहर देखी जा रही है। इसलिए यही वक्त है कि सरकार कश्मीरी लोगों के और करीब पहुंचने की कोशिश करे और घाटी में सक्रिय आतंकी संगठनों और आतंकियों के खिलाफ एक निर्णायक आक्रामक अभियान छेड़े। 
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इस वर्ष अमरनाथ यात्रा शुरू होने से पहले से ही खुफिया एजेंसियों ने आतंकी हमले की आशंका जताई थी, इसलिए पिछले वर्ष की तुलना में न केवल सुरक्षा व्यवस्था में ज्यादा जवानों को तैनात किया गया, बल्कि आधुनिक तकनीक का भी सहारा लिया गया।  सुरक्षा के तमाम बंदोबस्त के बावजूद अगर अमरनाथ तीर्थयात्रियों पर हमला हुआ, तो यह सुरक्षा में गंभीर चूक का संकेत करता है। सवाल उठता है कि जब शाम सात बजे के बाद हाईवे पर बसों के परिचालन का नियम ही नहीं है, तो फिर उस बस को हाईवे पर जाने कैसे दिया गया। इतनी सघन सुरक्षा व्यवस्था के बीच क्या कोई भी ऐसा जिम्मेदार व्यक्ति नहीं था, जो उस बस को नियत समय के बाद हाईवे पर चलने से रोकता? ऐसे में यह क्यों नहीं माना जाए कि कहीं न कहीं सुरक्षा बंदोबस्त के लिए जिम्मेदार लोगों ने लापरवाही बरती? सरकार को सुरक्षा व्यवस्था में चूक के लिए जिम्मेदार लोगों पर भी कठोर रुख अपनाना चाहिए और दोषी लोगों को दंडित करना चाहिए। 
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इस हमले के पीछे किसी साजिश से भी इन्कार नहीं किया जा सकता, क्योंकि किसी को यह पता नहीं था कि तीर्थयात्रियों से भरी एक बस सुरक्षा बंदोबस्त वाले काफिले से पीछे रह गई है। जाहिर है कि किसी ने तो जरूर आतंकवादियों को इस बारे में जानकारी दी होगी, बिना विश्वस्त सूचना के तो आतंकवादी बस पर हमले के लिए हाईवे पर नहीं पहुंचे होंगे। बताया जाता है कि अमरनाथ तीर्थयात्रियों की जिस बस पर हमला हुआ, वह पंक्चर होने के कारण पीछे रह गई थी। ऐसे में इस बात की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता कि जब वह बस पार्किंग में खड़ी थी, तभी किसी ने उसे पंक्चर कर दिया गया हो। जांच एजेंसियों को इन सब बारीक चीजों की गहनता से पड़ताल करनी चाहिए और इसका पता लगाना चाहिए कि किसने आतंकवादियों को इस बस के बारे में जानकारी दी कि वह सुरक्षा घेरे से बाहर तीर्थयात्रियों को लेकर जा रही है? 

यह हमला आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने की बरसी के ठीक बाद हुआ है। खुफिया एजेंसियों ने पहले ही आगाह किया था कि आतंकी संगठन इस मौके पर कश्मीर में और खासकर अमरनाथ यात्रा मार्ग में कहीं भी हमला कर सकते हैं। इसके मद्देनजर सुरक्षा के इंतजाम भी किए गए थे। बुरहान वानी की बरसी के मौके पर अलगाववादी हुर्रियत कांफ्रेंस ने विरोध प्रदर्शन के लिए अपील की थी और प्रवासी कश्मीरियों से भी कहा था कि वे कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों तक पहुंचाएं। लेकिन केंद्र सरकार की सक्रियता के चलते जहां ब्रिटेन में विरोध प्रदर्शन को रोक दिया गया, वहीं घरेलू स्तर पर भी विरोध प्रदर्शन को कश्मीर के लोगों ने उतनी तवज्जो नहीं दी।

एक तरफ जहां पाकिस्तान दुनिया भर में आतंकी संगठनों को मदद करने वाले देश के रूप में बदनाम हो चुका है, वहीं कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की साख भी कश्मीरियों की नजर में काफी गिर गई है। ऐसे में आतंकवादियों की हताशा समझी जा सकती है और बहुत संभव है कि यह हमला उसी की प्रतिक्रिया हो। कश्मीर के ज्यादातर लोग अमन पसंद हैं और विकास की मुख्यधारा में जुड़ना चाहते हैं। यह ताजा हमला सिर्फ तीर्थयात्रियों पर नहीं हुआ है, बल्कि स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी पर भी हुआ है। इसलिए कश्मीर के हर तबके के लोगों ने इसकी जमकर आलोचना की है।  केंद्र और राज्य सरकार घाटी में छिपे आतंकवादियों के सफाये के लिए इस अवसर का सफलतापूर्वक उपयोग कर सकती है। जब हम सीमा पार जाकर आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक कर सकते हैं, तो घाटी में छिपे आतंकियों के खात्मे में क्यों मुश्किल होनी चाहिए? 

अमरनाथ तीर्थयात्रियों को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराना जम्मू-कश्मीर सरकार की जिम्मेदारी है, इसलिए जम्मू-कश्मीर पुलिस को सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए और यह पता लगाना चाहिए कि उससे सुरक्षा व्यवस्था में कहां चूक हुई कि आतंकवादी अपने नापाक मंसूबे को अंजाम देने में सफल हो गए। जम्मू-कश्मीर पुलिस के पास स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) की सशक्त टीम है। एसओजी की टीम को जल्द से जल्द इस हमले के लिए जिम्मेदार आतंकवादियों को पकड़ कर सजा दिलवानी चाहिए।


हालांकि अब तक किसी आतंकी संगठन ने इस बर्बर हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन जम्मू-कश्मीर पुलिस के हवाले से बताया गया है कि इस हमले के पीछे पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का हाथ है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि लश्कर  ने हिज्बुल मुजाहिदीन के सहयोग से इस हमले को अंजाम दिया है। कश्मीरी आतंकी संगठन हिज्बुल अब तक अमरनाथ तीर्थयात्रियों पर हमले न करने की नीति पर चलता रहा है, लेकिन अगर अब उसने यह नीति छोड़ दी है, तो इससे चुनौती बढ़ने वाली ही है। इसलिए सरकार को घरेलू स्तर पर सक्रिय आतंकवादियों और उनकी मदद करने वालों के खिलाफ तो सख्त रुख अपनाना ही चाहिए, सीमा पार आतंकवाद को प्रश्रय देने के लिए पाकिस्तान को भी विभिन्न कूटनीतिक उपायों के जरिये सख्त संदेश देना चाहिए।
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