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मनोरमा को कब मिलेगा इंसाफ
सुभाष गाताडे
Updated Mon, 24 Nov 2014 07:30 PM IST
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मणिपुर के ऐतिहासिक कांगला फोर्ट के सामने शहर की तीस अग्रणी महिलाओं द्वारा किया गया वह निर्वस्त्र प्रदर्शन आज कितने लोगों को याद है, जिन्होंने अपने हाथ में लिए बैनर पर लिखा था ‘इंडियन आर्मी, रेप अस।' उन दिनों समूचे मणिपुर में उठे उग्र जनांदोलन के चलते असम राइफल्स को कांगला फोर्ट से अपना मुख्यालय स्थानांतरित करना पड़ा था।
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32 वर्षीय थांगजाम मनोरमा की बलात्कार एवं हत्या की जिस घटना ने उस जनाक्रोश को जन्म दिया था, उस मामले में पिछले दिनों एक जांच रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय में पेश की गई। जांच आयोग ने इस मामले में असम राइफल्स पर गलत गिरफ्तारी, भयानक यातनाएं देने, बुनियादी प्रक्रियाओं एवं नियमों की अनदेखी के आरोप लगाए हैं। स्थानीय पुलिस को सूचित न करने या साथ में कोई महिला पुलिस अफसर न रखने के लिए आयोग ने असम राइफल्स के दोषी जवानों पर कार्रवाई का आदेश दिया है।
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चूंकि पिछले दिनों सेना ने जम्मू-कश्मीर के मच्छेल में 2010 में हुई फर्जी मुठभेड़ से जुड़े लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है, ऐसे में यह उम्मीद जगी है कि दोषियों को दंड देकर असम राइफल्स भी अपनी छवि बेहतर बनाने का प्रयास करेगी। 31 साल के दोरेन थांगजाम को वह घटना अब भी याद है, जब वह, उसकी मां और परिवार के अन्य सदस्य टीवी देख रहे थे, और अचानक असम राइफल्स की वर्दी में जवानों ने उनके घर में प्रवेश किया और उसकी दीदी मनोरमा देवी थांगजाम को ले गए। उनका आरोप था कि वह आतंकी संगठन की सदस्य है। दूसरे दिन जंगल में मनोरमा देवी की लाश मिली, जिसके निशानों से स्पष्ट था कि उसके साथ बलात्कार हुआ है।
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निर्भया मामले के बाद गठित जेएस वर्मा कमेटी ने बलात्कार कानूनों में संशोधनों को लेकर जो सुझाव पेश किए थे, उसमें इस बात की भी सिफारिश थी कि सैन्य बलों एवं वर्दी में रहनेवाले अधिकारियों द्वारा महिलाओं के साथ की जानेवाली यौन हिंसा को साधारण अपराध कानून के दायरे में लाना चाहिए। कमेटी ने आंतरिक संघर्षों में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम जैसे कानूनों की समीक्षा का प्रश्न भी उठाया था।
इस अधिनियम के तहत सरकार किसी क्षेत्र विशेष को अशांत क्षेत्र घोषित कर सकती है, अगर वह इस नतीजे तक पहुंचती है कि वह क्षेत्र या उसका एक हिस्सा ऐसी खतरनाक स्थिति में है कि नागरिक शासन की मदद के लिए फौजी बल का इस्तेमाल जरूरी है। अधिनियम की धारा चार के तहत कोई कमीशंड अफसर, वारंट अफसर या नॉन कमीशंड अफसर सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए गोली भी चला सकता है। धारा छह बताती है कि इस अधिनियम के तहत काम कर रहे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई केंद्र सरकार की अनुमति से ही मुमकिन है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि साधारण नागरिकों को अपने ऊपर हुए अत्याचार की जांच शुरू करवाने के लिए केंद्र सरकार से गुहार लगाना कितना लंबा, खर्चीला और पीड़ादायी अनुभव होता होगा।
विगत आधी सदी से इस अधिनियम ने वहां के लाखों लोगों को आज भी अघोषित आपातकाल की स्थिति में रहने के लिए मजबूर किया है। मच्छेल प्रसंग के बाद क्या थांगजाम मनोरमा प्रसंग के बहाने मणिपुर ही नहीं, बल्कि सभी उपद्रवग्रस्त इलाकों में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए नई जमीन तोड़ने की शुरुआत होगी?